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 |  5-मिनट में पढ़ें  |   12-01-2018
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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इन दिनों, मेन स्ट्रीम मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, लोगों के बीच मदरसे चर्चा में हैं. प्रायः ये देखा गया है कि, कभी पीएम की फोटो न लगाने पर, कभी वंदे मातरम न कहने पर या फिर 15 अगस्त और 26 जनवरी को खड़े होकर राष्ट्रगान न गाने पर, मदरसे आम लोगों की आलोचना का शिकार हो जाते हैं. मौजूदा दौर में ये कहना भी बिल्कुल गलत न होगा कि लोगों का तर्क और भारतीय मदरसों की कार्यप्रणाली हमेशा ही एक दूसरे के विपरीत रही हैं.

हो सकता है कि, मदरसों की वर्तमान कार्यप्रणाली और हठधर्मियता के ही मद्देनजर शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमेन वसीम रिज़वी को अपने सभी काम धंधे छोड़कर मदरसों के सन्दर्भ में बयान देना पड़ा हो. अपने बयान के बाद से वसीम लगातार लोगों की आलोचना का शिकार हो रहे हैं. वसीम के आलोचकों का तर्क है कि वो ये सब जानबूझकर कर रहे हैं ताकि वो योगी आदित्यनाथ के अलावा भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजरों में आ जाएं और उनके पिछले पाप धूल जाएं.

मदरसा, भारत, पाकिस्तान, मुसलमान, शिक्षा     काफी लम्बे समय से भारतीय मदरसों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने की बात चल रही है

ध्यान रहे कि, अभी कुछ दिनों पहले देश के मदरसों को लेकर वसीम ने एक बड़ा बयान दिया था. मदरसों कीशिक्षा पद्धति पर सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि मदरसों की तालीम से बच्चे आतंकवादी बन रहे हैं. वसीम रिज़वी की मानें तो मदरसों से पढ़कर कोई इंजीनियर, डॉक्टर और आईएएस नहीं बनता बल्कि बच्चे आतंकवादी जरूर बन जाते हैं. रिज़वी मानते हैं कि आजकल मदरसों में बच्चों को सिर्फ बम बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है. रिज़वी ने पीएम मोदी,यूपी के सीएम को चिट्ठी लिखकर मदरसों को सीबीएसई, ईसीसीई और राज्य शिक्षा बोर्ड से जोड़ने की मांग की है.

वसीम के इस हैरत में डालने वाले बयान के बाद लाजमी था कि उनपर लोगों की प्रतिक्रियाएं आएं. मोदी सरकार में मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने वसीम रिज़वी से सवाल करते हुए पूछा है कि," मैं मदरसे में पढ़ा हूं तो क्या मैं आतंकवादी हूं?" इसके अलावा एआईएमआईएम सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने उन्हें सबसे बड़ा जोकर करार दे दिया है. ओवैसी के अनुसार वसीम रिजवी सबसे बड़े मौकापरस्त हैं और जिन्होंने अपनी आत्मा आरएसएस को बेच दी है.

अब मदरसों के खिलाफ दिए गए इस बयान को वसीम की मौकपरस्ती कहा जाए या सरकार की नजर में आने और फायदा हासिल करने का माध्यम. मगर मदरसों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़ने के मामले में पाकिस्तान ने हम भारतीयों को पछाड़ दिया है और वो हमसे कहीं आगे हैं. जी हां बिल्कुल सही सुन रहे हैं आप. एक ऐसे वक़्त में जब हिंदुस्तान इसी बहस में उलझा है कि मदरसे के मौलवी और छात्र राष्ट्रगान खड़े होकर गाएं, वंदे मातरम का उद्घोष करें, प्रधानमंत्री की फोटो लगाएं, भारत का ध्वज फहराएं, हिन्दुस्तान जिंदाबाद के नारे लगाएं, दीन की किताबों और हदीस के अलावा मैथ्स के न्यूमेरिकल और केमिस्ट्री की इक्वेशन और अंग्रेजी भी पढ़ें. उस वक़्त सुदूर पाकिस्तान के खैबर पख्तुनख्वा के किसी मदरसे में पढ़ने वाले किसी बच्चे ने ये सब कर लिया होगा. वो बच्चा मैथ्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री और अंग्रेजी भी पूरे तन्मयता से पढ़ रहा है और दीनी किताबों पर भी उसे उम्दा पकड़ हासिल है.

मदरसा, भारत, पाकिस्तान, मुसलमान, शिक्षा     पाकिस्तान का अपने मदरसों को मुख्य शिक्षा से जोड़ना एक सकारात्मक कदम है जिसका प्रोत्साहन होना चाहिए

ये बात किसी को भी डालने के लिए काफी है कि जब हम मदरसों को मुख्यधारा से जोड़े जाने या इससे मिलती जुलती बातों पर आहत हो रहे हैं उधर पाकिस्तान में ये सब बदस्तूर और पूरी सहूलियत से चल रहा है. न सिर्फ इस मुहीम को लोगों का समर्थन प्राप्त है बल्कि मदरसे और उससे जुड़े लोग भी इस मुहिम को हाथों हाथ ले रहे हैं.

अब तक हम पाकिस्तान को एक ऐसे देश के रूप में देखते थे. जहां कट्टरपंथ और चरमपंथ हावी था. एक ऐसा देश जहां इस्लामी शिक्षा के नाम पर समाज के लोगों को आधुनिक शिक्षा और समाज की मुख्यधारा से अलग किया जा रहा था. एक ऐसा देश जो अपने बच्चों को पोलियो की दवा सिर्फ इसलिए नहीं पीने देता क्योंकी उसे लगता है कि इसके जरिये पश्चिमी देश आम पाकिस्तानी मुस्लिम बच्चों को मार देंगे. एक ऐसा देश जहां आज भी अकेली महिला का घर से बाहर निकलना या पढ़ने के लिए स्कूल जाना एक बड़ी बात है. अगर ऐसा देश सुधर रहा है और अपने मदरसों को मेन स्ट्रीम एजुकेशन से जोड़ रहा है तो ये वाकई एक पिछड़े देश के लिए खास है और दुनिया भर को इसकी तारीफ करनी चाहिए.

अंत में हम ये कहते हुए अपनी बात खत्म करेंगे कि सरकार के अलावा खुद भारतीय मुस्लिमों को ये देखना चाहिए और इस बात का अवलोकन करना चाहिए कि जब पाकिस्तान का मुसलमान मदरसों को समाज और शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयासरत और इस मुहीम के लिए गंभीर है तो फिर उसे भी ऐसा किये जाने पर कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए. साथ ही अगर भारत का मुसलमान खुद आगे आता है और कहता है कि, उनके मदरसों को मुख्य शिक्षा से जोड़ा जाए तो ये बात खुद में वसीम रिज़वी जैसे लोगों के मुंह पर करारा तमाचा होगी जो ये सोचते हैं कि मदरसों के बच्चे इंजीनियर, डॉक्टर और आईएएस नहीं बनते और वहां सिर्फ और सिर्फ बम बनाने और बाधने की ट्रेनिंग दी जाती है.

कहा जा सकता है कि अगर भविष्य में भारतीय मदरसे शिक्षा की मुख्य धारा से जुड़ गए तो ये कई मायनों में अपने आप में देश के मुसलमान के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम होगा.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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