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Updated: 27 फरवरी, 2018 01:02 PM
एंथॉनी खटचटुरियन
एंथॉनी खटचटुरियन
  @anthony.khatchaturian
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पिछले कुछ हफ्तों से कल्पना से भी परे हटकर कुछ आंकड़ों की बात की जा रही है. जो है 11,400 करोड़ रुपए. आम जनता के लिए यह कोई आम आंकड़ा नहीं है. अगर एक आम आदमी की बात की जाए तो एक कार लोन या मोटरसाइकिल लोन लेने के लिए भी उसे ढेर सारी कागजी जरूरतें पूरी करनी होती हैं और साथ में सबूत भी पेश करने होते हैं. ऐसे मामूली लोन लेने के लिए भी पैन, आधार, वोटर आई, एंप्लॉयमेंट कॉन्ट्रैक्ट और 6 महीने का बैंक स्टेटमेंट देना पड़ता है. इन सबको और अधिक मुश्किल बनाने के लिए कोलकाता के बैंक का उदाहरण ले सकते हैं. कोलकाता का एक बैंक ऐसे आधार, पैन या वोटर आईडी को भी स्वीकार नहीं करता है, जो पश्चिम बंगाल के बाहर रजिस्टर हो, जैसे कि देश के बाकी राज्य विदेश में हों. अगर आपने ये सभी बाधाएं पार भी कर लीं तो बैंक आपसे कहेगा कि आप उस ब्रांच से लोन के लिए आवेदन करिए, जहां आपने अकाउंट खुलवाया है. अगर आपने अकाउंट मुंबई में खुलवाया है और अब आप दिल्ली में नौकरी करते हैं, तो आपको कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपनी किस्मत आजमाने के लिए मुंबई अपनी होम ब्रांच में जाना होगा.

बैंक फ्रॉड, भ्रष्टाचार, नीरव मोदी, पीएनबी घोटाला

इसिलए यह कल्पना से भी परे है कि कोई शख्स हजारों करोड़ रुपयों का कर्ज ले सकता है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले ही एक न्यूज एजेंसी ने सभी पब्लिक सेक्टर बैंकों में आरटीआई डाली थी. इसके अनुसार पंजाब नेशनल बैंक में कुल 389 फ्रॉड केस थे, जिनकी कुल कीमत 6,560 करोड़ रुपए थी, बैंक ऑफ बड़ौदा में 4470 करोड़ रुपए के कुल 389 केस थे और बैंक ऑफ इंडिया में 4070 करोड़ रुपए के कुल 231 केस थे और सभी सिर्फ 5 साल के अंदर हुए थे. वहीं दूसरी ओर, इसी दौरान भारतीय स्टेट बैंक में कुल 1069 फ्रॉड केस थे, लेकिन बैंक ने इनकी कुल कीमत का खुलासा करने से मना कर दिया. यह सिर्फ 20 पब्लिक सेक्टर बैंकों के आंकड़े हैं और इसमें उन फ्रॉड को नहीं गिना गया है जो 1 लाख या उससे कम के हैं, जो अधिकतर बैंकों ने अभी तक गिने ही नहीं हैं. नीरव मोदी की छानबीन में पाया गया कि उसने 11,400 करोड़ रुपए एक ही बैंक की सिर्फ एक ही ब्रांच से ले लिए. ऊपर बताए गए आंकड़ों में कोई भी निजी बैंक का नहीं है. फ्रॉड लोन की कुल कीमत कितनी है, यह अभी तक पता नहीं है. बैंकिंग पॉलिसी के गुरू इसे नॉन परफॉर्मिंग असेट्स कहते हैं. इन सब की जिम्मेदारी किसी ने भी नहीं ली है, किसी को भी बर्खास्त या ट्रांसफर नहीं किया गया है ना ही किसी ने इस्तीफा दिया है.

ऐसा कैसे हो सकता है जबकि बैंक एंट्रेस एग्जाम तो बहुत ही कठिन लेते हैं, आवेदन करने वाले को एग्जाम देने से पहले ही सब कुछ आना चाहिए? सभी जांच एजेंसियां कहां हैं? इतने बड़े पैमाने के फ्रॉड मामलों में भारतीय रिजर्व बैंक सहयोगी है या विरोधी? जवाब है ऐसे मामलों की जांच नहीं होना और हर स्तर तक भ्रष्टाचार का व्याप्त होना.

एक सामान्य बैंकर को पैन, आधार और वोटर आईडी जैसे टूल्स की जरूरत होती है. एक बड़ा बैंक फ्रॉड करने के उद्देश्य से अपने आप को तैयार करने के लिए सिर्फ 10 लाख रुपए का छोटा सा निवेश करना होगा. इस फ्रॉड के लिए सबसे जरूरी है एक बहुत अच्छा चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए), फाइनेंशियल वर्ल्ड में जमा खर्चा कहे जाने वाली चीज का एक एक्सपर्ट, जिसमें कभी ना हुए ट्रांजेक्शन को भी दिखाने की काबिलियत हो, जिसे हिंदी में 'इधर का पैसा उधर, उधर का पैसा इधर' कहते हैं. एक सीए सबसे पहले बहुत सारी कंपनियों को कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय में रजिस्टर करना शुरू कर देगा (नीरव मोदी के मामले में ईडी नीरव से जुड़ी करीब 200 कंपनियों की जांच कर रही है), जो सारा काम बिना किसी शख्स से सवाल जवाब किए आसानी से ऑनलाइन ही हो सकता है. अगर आपको बहुत जल्दी है तो सीए जादू से एक शेल्फ कंपनी पैदा कर देगा- वह कंपनी जो सीए ने पहले से ही रजिस्टर की हुई है, जिसके डायरेक्टर, ऑर्टिकल ऑफ एसोसिएशन, बैंक खाते, पैन, प्रोफेशनल टैक्स रजिस्ट्रेशन सब कुछ मौजूद होगा, जिनका इस्तेमाल करके आप कुछ ही हफ्तों में फर्जी ट्रेडिंग शुरू कर सकते हैं.

इसकी शुरुआत डायरेक्टर के नंबर या DIN, हाई टेक डिजिटल सिग्नेचर और फिर आपकी मर्जी के फ्रॉड की कंपनी रजिस्टर करवाने से होगी, जिसके बारे में सीए आपको सलाह भी देगा. एक शेल्फ कंपनी का काम शुरू होता है DIN लेने से. इसके बाद बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को ज्वाइन करने के लिए अप्लाई किया जाता है, इसके बाद सभी डायरेक्टर इस्तीफा दे देते हैं और फिर पूरा कंट्रोल नए डायरेक्टर के हाथ में आ जाता है. नया डायरेक्टर आर्टिकल्स को दोबारा लिखता है, सभी बैंक खातों पर कंट्रोल कर लेता है और मंत्रालय को भी ऑनलाइन पोर्टल के जरिए सूचना दे दी जाती है. इस नई कंपनी का दूसरा पहलू ये है कि इसका कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं है. एक शेल्फ कंपनी में कुछ सपोर्टिंग फाइनेंशियल एक्टिविटी होती रहती हैं- आप जितने पैसे खर्च करना चाहें उतने पैसों के ट्रांजेक्शन होते हैं, यह सब कुछ हजार रुपए सालाना से लेकर लाखों रुपयों तक हो सकता है. यहां यह बात ध्यान देने की है कि यह सब पूरी तरह से कानूनी है.

अगले चरण में एक ऐसे इंसान को ढूंढ़ना होता है, जिस पर आपको पूरा भरोसा हो- पत्नी या रिश्तेदार इसमें पहली पसंद होते हैं. अगर वह नहीं जुड़ पाते तो किसी ऐसे को ढूंढ़ना होता है जो कोई सवाल ना करे, जैसे घर में काम करने वाले नौकर, ड्राइवर, गार्ड आदि. इसके बाद सीए उनके जरिए एक और कंपनी की शुरुआत करता है, जो शेल्फ कंपनी हो सकती है या फिर नई कंपनी भी हो सकती है. इस चरण को एक के बाद एक कई बार दोहराया जा सकता है, जब तक कि आप उतनी कंपनियां ना बना लें, जितनी कंपनियां आपको अपना काम करने के लिए जरूरी हैं.

यहां एक कड़वा सच यह है कि ऊपर जो भी स्टेप्स और एक्टिविटीज की गई हैं वह सब कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की देख-रेख में होते हैं. हर बार सभी दस्तावेज ऑनलाइन दिए जाते हैं और किसी की भी बहुत बारीकी से जांच नहीं होती है.

आखिरी चरण है एक भरोसमंद बैंकर ढूंढ़ना. उस बैंकर को दिए गए एडवांस और कितना कमीशन मिलेगा, इस आधार पर वह बैंकर आपकी लोन एप्लिकेशन पर साइन करता है और कानून से भी आगे बढ़कर आपकी मदद करता है. नीरव मोदी के मामले में सीबीआई सूत्रों से यह पता चला है कि उसके स्टाफ को पीएनबी के सॉफ्टवेयर सिस्टम तक की एक्सेस थी. बैंकर को आपके लोन के लिए कोटेशन्स की जरूरत होती है और यहां आपकी पत्नी या रिश्तेदार के नाम पर बनाई गई कंपनी की जरूरत होती है, जैसे अगर आप कोई अपार्टमेंट बनाना चाहते हैं तो आपको सीमेंट, रेत, खिड़की, टाइल्स आदि की कंपनियों की जरूरत होगी. इन सबकी कोटेशन आपकी पत्नी के नाम वाली कंपनी से भारी दामों में मुहैया कराई जाएगी. ऐसे फ्रॉड के मामलों में हर कंपनी से अधिक से अधिक कीमत वाली कोटेशन दी जाती हैं, ताकि आप अधिक से अधिक मार्जिन कमा सकें.

एक आवेदक को सामान्यतया अपने लोन की कीमत का 10 फीसदी डिपॉजिट करना होता है, तो आप अभी भी अपने 10 लाख के बजट में अंदर ही हैं. चिंता मत करिए, यहां कोई जांच नहीं होगी, फ्री ट्रेड के कानून को धन्यवाद, हर कंपनी अपने प्रोडक्ट को उस कीमत पर बेच सकती है, जिस पर वह बेचना चाहती है और कानूनी रूप से वह ऐसा करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है. अगर एक किलो रेत की कीमत 20 रुपए है और आपकी पत्नी वाली कंपनी ने उसकी कीमत 200 रुपए भी लगाई है तो कोई आपसे सवाल नहीं पूछेगा. हमारा बैंकिंग सिस्टम भी लालची लोगों का पता लगाने में काफी कमजोर है. अगर कहीं गलती से आपके किसी रिश्तेदार वाली कंपनी के बारे में रिश्तेदार को पता चल गया कि आप उसके नाम से ढेरों पैसे कमा रहे हैं और वह आपसे पैसे मांगे तो भी आपका बैंकर ये सब संभाल सकता है- उसकी कंपनी के कोटेशन रेट्स को रिवाइज कर दिया जाएगा.

सीए यह बात पक्की करेगा कि आने वाला भुगतान समान रूप से बंट रहा है. आपकी कंपनी को रेत बेचने के बाद आपकी पत्नी की उस कंपनी के खाते में भविष्य में एक नया फ्रॉड करने के लिए पर्याप्त पैसा होगा. काफी कम समय में ही रेत वाली कंपनी का मालिक भी वही कार खरीद सकता है जो आप इस्तेमाल कर रहे हैं. इतना ही नहीं, आपकी पत्नी के नाम वाली कंपनी आपको क्रेडिट कार्ड दे सकती है, जिसके बिल वह एक बिजनेस के खर्चे की तरह दिखाएगी. इस तरह जिस शख्स की कमाई आयकर के पहले स्लैब में भी नहीं आती है वह एक नई BMW में अपनी रेत की कंपनी के डायरेक्टर (पत्नी) के साथ घूमेगा. अगर गलती से आपके सीए ने कैल्कुलेशन में कुछ गड़बड़ कर दी और आपका कैश फ्लो तेजी से बढ़ने लगा तो इसका कुछ हिस्सा अपनी पत्नी को दे दीजिए- टैक्स फ्री- जो आपकी ही एक कंपनी की डायरेक्टर हैं, तो डरने की कोई बात नहीं है. हमारा फाइनेंशियल रेगुलेशन सिस्टम इतना स्मार्ट नहीं है ना ही उसमें इतने लोग है कि वह कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए आप तक पहुंच सकें.

एक इंपोर्ट/एक्सपोर्ट स्कैम, जिसकी वजह से 11,400 करोड़ रुपए का नुकसान हो, उसके लिए इंटरनेशनल फंड ट्रांसफर के मैकेनिज्म ‘SWIFT’ के साथ छेड़छाड़ करनी होगी. आपको बता दें कि ‘SWIFT’ में हाई सिक्योरिटी वाले कोडेड मैसेज सिस्टम का इस्तेमाल होता है. यहां ‘SWIFT’ पर आरोप मढ़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि यहां हमारे बैंकिंग सिस्टम की स्वतंत्रता पर सवाल उठता है. देखा जाए तो एक भ्रष्ट बैंक मैनेजर ‘SWIFT’ के जरिए उस पैसे को भी ट्रांसफर करने की अनुमति दे सकता है, जो दरअसल आपके बैंक खाते में है ही नहीं. भारतीय रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को 'कोर बैंकिंग सॉल्यूशन' से जुड़ने के लिए कहा, ताकि इस अंतर को खत्म किया जा सके और इसके जरिए ‘SWIFT’ के साथ इंटर-लिंक्ड सभी अकाउंट पर नजर रखी जा सके, जिससे गलत ट्रांसफर नामुमकिन हो जाते और बैंकों को सूचना मिल जाती. बैंकों द्वारा सीबीएस से जुड़ने में नाकाम रहना इसमें भारतीय रिजर्व बैंक की सहभागिता को दिखाता है और इससे भी अधिक, ऐसे घोटालों पर आंखें बंद कर लेने जैसा है- इसे अनिवार्य क्यों नहीं किया गया?

इसी तरह की बहुत सारी कंपनियां और सिस्टम सरकारी टेंडरों, एजुकेशन, एनजीओ आदि के लिए भी बनी हुई हैं. नीरव मोदी की छानबीन में इंपोर्ट/एक्सपोर्ट बिजनेस में भी ऐसा ही देखा गया. कमजोर सरकारी जांच, स्टाफ की कमी और कम सैलरी वाली टैक्स अधिकारी और भ्रष्टाचार की वजह से भारत के घरेलू काले बाजार में मनी लॉन्डरिंग के जरिए लाखों करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है. अगर इन सबकी सख्त निगरानी होती तो नतीजों के चलते लोगों में भगदड़ मच जाती, ग्राहक और निवेशक अपने पैसे निकालने लगते, जिससे बैंक धराशायी हो जाता या फिर हो सकता है कि पूरा बैंकिंग सिस्टम ही धराशायी हो जाता. भारतीय बैंकों में भ्रष्टाचार काफी अधिक बढ़ चुका है, जिससे जांच की क्षमता से समझौता हो रहा है. जो विदेशी कंपनियां भारत में और भारतीयों के साथ बिजनेस करना चाहती हैं, उन्हें अपने अकाउंट में ‘facilitation funds’ नाम का एक फंड बनाना होता है, क्योंकि भारत में बिजनेस करने के लिए घूस तो देनी ही होगी.

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लेखक

एंथॉनी खटचटुरियन एंथॉनी खटचटुरियन @anthony.khatchaturian

लेखक कोलकाता के मूल निवासी हैं और लंदन में रहकर स्‍कॉटलैंड यार्ड पुलिस को सेवाएं दे रहे हैं.

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