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 |  5-मिनट में पढ़ें  |   11-02-2019
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
  @parulchandraa
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अवैध शराब, कच्ची शराब या जहरीली शराब कुछ भी कह लीजिए. ये तब तक खतरनाक नहीं लगती जब तक मरने वालों की संख्या दो अंकों में न हो. पर इस बार जहरीली शराब का जहर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के 109 लोगों को निगल गया है. लिहाजा अवैध शराब इस वक्त एक गंभीर मामला बन गया है.  

सहारनपुर, रुड़की और कुशीनगर में मरने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. किसी ने पति खोया तो किसी ने पिता, एक ही परिवार से कई-कई अर्थियां उठ रही हैं. हर तरफ विलाप है. लेकिन शराब पीकर मरने वालों की मौतों पर तो लोग प्रतिक्रिया भी वैसी नहीं देते जैसी किसी दुर्घटना के वक्त दी जाती है. क्योंकि शराब बुरी है.. बहुतों ने ये भी कहा होगा 'और पियो...' 'इन शराबियों के साथ यही होना था'.

कच्ची शराब हमेशा से जानलेवा रही है. लेकिन इसपर सरकारें कभी गंभीर नहीं हुईं. इनकी नींद तब खुली जब मौतों की संख्या 100 के पार हो गई. तब जगह-जगह छापेमारी की जा रही है सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका हैं, हजारों लीटर शराब जब्त की जा चुकी है. योगी सरकार ने इस मामले में SIT जांच कराने का फैसला किया है. लेकिन इस वक्त सरकार का एक्शन किसी भी रूप में तारीफ के काबिल तो नहीं ही लगता. क्योंकि इससे वो अपनी नाकामी नहीं छिपा सकते. अवैध शराब का धंधा खूब चलता है, पुलिस से लेकर प्रशासन तक सब जानते हैं कि सस्ता नशा पाने के लिए लोग किस तरह कच्ची शराब का सेवन करते हैं. और इसीलिए इस अवैध कारोबार को चलते रहने देने के लिए पुलिस वालों की जेबें भी गर्म की जाती रही हैं.

liquor मरनेवालों की संख्या लगातार बढ़ रही है

क्या बैन किया जाए?

मुझे याद आता है किस तरह योगी आदित्यनाथ ने यूपी की सत्ता संभालते ही बीफ बैन करके हर तरफ हंगामा बरपा दिया था. लेकिन अवैध शराब पीकर मरने वाले लोगों के परिवारों को विलाप करते देखकर यूं लग रहा है जैसे योगी जी अगर बीफ की जगह शराब पर प्रतिबंध लगाते तो आज इतनी मौतें न हुई होतीं.

लोग सदियों से शराब पीते आ रहे हैं, और हमेशा पीते रहेंगे. लिहाजा इसपर बैन लगाने और न लगाने के पीछे बहस भी होती ही रहेंगी. क्योंकि गुजरात में 2009 में अवैध शराब से 139 लोगों की मौत हुई थी. ये वो राज्य था जहां शराब पर प्रतिबंध है. लेकिन उस वक्त इन मौतों का जिम्मेदार शराब प्रतिबंधित होना ही बताया गया था.

विसंगति ये है कि जब शराब पर प्रतिबंध की बात आती है तो लोग उसकी आलोचना करते हैं, उसे पॉलिटिकल स्टंट बताया जाता है. उदाहरण के लिए बिहार सरकार के नीतीश कुमार को ली ले लें. जब उन्होंने बिहार में शराब बैन की तब उनकी आलोचना की गई. सस्ती शराब पीने वाले अनपढ़ और गरीब लोग नहीं बल्कि सो कॉल्ड प्रोग्रेसिव लोग इसे अलग कारण से गलत बताते हैं, वहीं अर्थशास्त्रियों के भी कारण अलग हैं. लेकिन जब शराब से इस तरह के हादसे होते हैं तो यही प्रोग्रेसिव लोग प्रतिबंध की मांग करते हैं. इस विसंगति का फायदा वो प्रशासन और भ्रष्ट लोग उठाते हैं, जिनपर अवैध शराब की बिक्री रोकने की जिम्मेदारी होती है.

liquorएक ही परिवार के कई-कई लोग जहरीली शराब पीने से मारे गए हैं

आखिर कैसे हो जाती है शराब जहरीली

देश के अलग-अलग हिस्सों में कच्ची शराब उसी तरह बनाई जाती है, जिस तरह खाने पीने का अन्य सामान. खासकर जनजाति, आदिवासी और पिछड़े तबके वाले इलाकों में ऐसी अवैध भट्टियां खूब हैं. शादियों या त्योहारों के सीजन में शराब की मांग बढ़ जाती है. ऐसे में मुनाफा कमाने के चक्कर में कच्ची शराब बनाने वाले शराब में टिंचर व ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में इनकी मात्रा ज्यादा होने पर यह जहर जैसी हो जाती है.

कच्ची शराब को अधिक नशीला बनाने के चक्कर में भी शराब जहरीली हो जाती है. कच्ची शराब बनाने के लिए गुड़ में ईस्ट और यूरिया मिलाकर लहन उठने के लिए इसे मिट्टी में गाड़ दिया जाता है. इसके अलावा सड़े संतरे, उसके छिलके और सड़े गले अंगूर से भी लहन तैयार किया जाता है. लहन को सड़ाने के लिए ऑक्सीटोसिन, नौसादर और यूरिया जैसे खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो जानलेवा होते हैं. इन केमिकल पदार्थों से शराब में मिथाइल एल्कोल्हल बन जाता है. इसकी वजह से ही लोगों की मौत हो जाती है.

जागरुकता अभियान कितने कारगर

लेकिन पीने वालों को तो शराब से मतलब होता है जो सस्ते में मिल रही हो. अब इतनी मौतों के बाद शराब की भट्टियां तोड़ी जा रही है. लोग जागरुकता अभियान चला रहे हैं. लेकिन ये अभियान और तोड़फोड़ किसी काम के नजर नहीं आते. अभी तोड़ेंगे कल फिर जम जाएंगे. कच्ची शराब पीने वाले लोग समाज के ऐसे तबके से आते हैं जिनपर जागरूकता कार्यक्रमों और अभियानों का कोई असर ही नहीं होता. 'शराबी के दो ठिकाने, ठेके जाए या थाने' या 'शराब करे जीवन ख़राब' जैसे नारों से अब परे देखने की जरूरत है.

कच्ची शराब को महज हल्के और सस्ते नशे के रूप में लेंगे तो समस्या का हल नहीं निकलेगा. इसपर उसी गंभीरता से नजर रखने की जरूरत है जिस तरह ड्रग्स को देखा जाता है. उत्तरप्रदेश की बात करें तो यहां तो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण गाय हैं. ड्रग्स भले ही उतनी गंभीर न हों जितना बीफ है. तो ऐसा ही समझ लीजिए कि शराब बैन भी बीफ बैन से कम जरूरी नहीं है. बीफ बैन से भले ही गाय सुरक्षित हो गई हों लेकिन शराब बैन से इंसान सुरक्षित हो सकते हैं. शराब बैन करने के फायदे और नुकसान पर बहस तो होती ही रहेगी. लेकिन अब समय है इस समस्या से निपटने के सार्थक और व्यवाहारिक प्रयास करने का. 

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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