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Updated: 03 मार्च, 2021 08:09 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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पता नहीं अब इसे कल्चरल एक्सचेंज कहा जाएगा या कॉपी करने और अपने को दूसरे से ज्यादा प्रभावशाली दिखाने वाली भारतीयता. हालिया दिनों में विवाह आयोजनों के मद्देनजर मुस्लिम समाज में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं. किसी और समाज की तरह मुस्लिम समाज अब केवल शादी की बिरयानी और कबाब तथा कबूल कबूल है तक सीमित नहीं रहा है. हिंदू, सिख या ईसाई समुदाय की तरह अब मुस्लिमों में शादियों को एक भव्य आयोजन माना जा रहा है. शादी बिग फैटइंडियन वेडिंग दिख सके इसलिए चाहे वो प्री और पोस्ट वेडिंग फोटोशूट हों या फिर डीजे, डांस, आतिशबाजी और बुफे सिस्टम. हमें मुस्लिम समाज में हर वो चीज दिखाई दे रही है जिन्हें हम अन्य समुदायों में देखते थे. लोग भले ही इन चीजों से खुश हों लेकिन इन चीजों ने मुस्लिम समाज की शादी के सबसे अहम पहलू यानी काजियों को आहत कर दिया है. बिग फैट इंडियन वेडिंग से आहत काजियों ने इसे इस्लाम और उसकी शिक्षाओं के खिलाफ बताते हुए एक फरमान जारी किया है. जिसपर अलीगढ़ स्थित जमीयत उलेमा हिंद और दीगर संगठनों ने अपनी मोहर लगा दी है. बात भले ही मुस्लिम समाज की शादियों को तड़क भड़क से दूर रखने कि की गई है, लेकिन शादियों की भव्यता पर अड़ंगा डालने वाले काजी उन जरूरी बातों पर फोकस करना भूल गए जिनकी शिक्षा मुल्ला का इस्लाम नहीं बल्कि अल्लाह का इस्लाम देता है.

Muslim, Marraige, Songs, Nikaah, Dance, Qazi, Cleric, Educationजिन बातों ने मुस्लिम काजियों और मौलानाओं को आहत किया है वो पूर्ण रूप से अतार्किक हैं

हम काजी और मौलानाओं के विरोध में नहीं है. इस्लामिक नजरिये से ये बात भी बिल्कुल सही है कि मौसिकी (गाने, संगीत) और डीजे की इजाजत इस्लाम नहीं देता. साथ ही इस्लाम में अतिरिक्त व्यय की भी मनाही है. वहीं बात खड़े होकर खाने की करें तो इस्लाम और विज्ञान दोनों के मद्देनजर खड़े होकर खाना पाचन क्रिया को प्रभावित करता है इसलिए खड़े होकर खाने से इंसान को बचना चाहिए. मगर क्या केवल यही वो शिक्षाएं हैं जिनकी बात मुल्ला/ काजियों ने की है?

आइये पहले मामला समझ लें. दरअसल मध्य प्रदेश के छतरपुर की अंजुमन इस्लामिया कमेटी के अध्यक्ष ने अपने एक फरमान में कहा है कि जहां डीजे, डांस, आतिशबाजी होगी या खड़े होकर खाने का इंतजाम होगा, वहां कोई काजी निकाह पढ़ने नहीं जाएगा. कमेटी ने इस संबंध में मुस्लिम समाज के नाम एक पत्र भी जारी किया है. कमेटी के फैसले के समर्थन में अलीगढ़ स्थित जामिया उलेमा संगठन भी सामने आया है.

मामले के मद्देनजर संस्था के उपाध्यक्ष मुफ़्ती मोहम्मद अकबर कासमी ने कहा है कि अगर हमारे मौलाना और काजी ये पक्का कर लें कि वे ऐसी जगह नहीं जाएंगे जहां डीजे, नाच गाने या बेपर्दगी हो, तो बहुत जल्द ही ऐसी चीजें रुक जाएंगी. वहीं एक अन्य मौलाना जैनुल आब्दीन ने कहा है कि वे खुद भी इस तरह के निकाह नहीं कराएंगे, जहां नाच गाना, आतिशबाजी, बेपर्दगी या सुन्नत में खिलाफ कुछ हो रहा हो. मौलाना ने कहा है कि अब वो वक़्त आ गया है जब इन तमाम कुरीतियों के खिलाफ मुहिम चलाई जाए.

जिक्र कुरीतियों का हुआ है. मुहिम का हुआ है और साथ ही सुन्नत पर बात हुई है. जैसा कि हम ऊपर ही बता चुके हैं इस मामले में मुल्ला और काजी सबसे अहम बातों को तो गोल कर गए और उन बातों को मुद्दा बनाया जो सिर्फ और सिर्फ कट्टरपंथी सोच और रूढ़िवादिता की आग में ईंधन का काम कर रही है. आइये नजर डालते हैं कुछ ऐसे बिंदुओं पर जिनको ध्यान में रखकर यदि मौलाना और काजियों ने निकाह छोड़ दिया होता तो वाक़ई आज इस्लाम की दुर्गति न होती और न ही मुसलमान यूं हंसी, ठिठोली का पात्र बनता.

लड़की की शिक्षा के लिए कब मुहिम चलेगी मौलाना साहब!

सिर्फ 1400 साल पहले आए इस्लाम का शुमार उन धर्मों में है जो नया है. बात पैगंबर मोहम्मद की हो तो स्त्रियों के मद्देनजर उनकी कई हदीसें हैं जिनमें उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा की हिमायत की है. ऐसे में सवाल ये है कि मुल्लाओं और काजियों ने इस बात को कैसे गोल कर दिया. काश के ऐसा होता कि मुल्ला या काजी ये कहते कि वो तब तक निकाह नहीं करेंगे जब तक लड़की ग्रेजुएट नहीं हो जाती. बात दोतरफा तब होती जब इन मुल्लाओं और काजियों की तरफ से शिक्षा और इसमें भी लड़की की शिक्षा के लिए मुहिम चलाई गई होती.

पिता की संपत्ति में बेटी का हक़ कहां है मौलाना साहब

मध्य प्रदेश के अलावा अलीगढ़ तक शादी में डीजे, गाना, आतिशबाजी मुद्दा बन गया और मुद्दा नहीं बनी वो बात जो सबसे ज्यादा जरूरी है. जिसको यदि अमली जामा पहना दिया गया तो कई मुल्ला, मौलवियों और काजियों की दुकानें बंद हो जाएंगी. सवाल ये है कि क्या आजतक कोई ऐसा मुल्ला या मौलवी सामने आया जिसने इस बात की पैरोकारी की हो कि पिता की संपत्ति में बेटी को भी उसका हिस्सा मिलना चाहिए? क्या आजतक निकाह पढ़ने से पहले किसी मौलाना ने 'दुखतरी' नाम की इस पहल का समर्थन किया?

बताते चलें कि कि इस बिंदु पर बात करने वाले 1 या 2 प्रतिशत ही मौलाना हुए हैं जिनमें से ज्यादातर अब इस दुनिया में नहीं हैं और जो गिने चुने बचे हैं वो गुमनामी में या मदरसों में बच्चों को कुरान पढ़ाकर अपना जीवन काट रहे हैं. अतः हम यही कहेंगे कि निकाह वेक दिन पिता की प्रॉपर्टी में बेटी के हक़ पर भी बात होनी चाहिए मौलाना साहब.

मेहर की रकम पर भी कुछ प्रकाश डालें मौलवी साहब

बताते चलें कि शिया, सुन्ना, देवबंदी, बरेलवी समेत मुस्लिम धर्म 73 फिरकों में विभाजित है और जो एक बात इन सभी वर्गों को या फिरकों को जोड़ती है वो है मेहर की रकम. कितने मौलाना हैं ऐसे जिन्होंने निकाह पढ़ने से पहले लड़के के बाप से लड़की के बाप को मेहर की रकम अदा करने और न दिए जाने पर निकाह न पढ़ने की धमकी दी है. चूंकि मौलाना, मौलवी इस्लामिक शिक्षा का खेल खेल रहे हैं तो ये तो सबसे अहम शिक्षा थी आखिर कैसे चूक गए मौलाना साहब?

सब्जी में नमक कम होने या दाल में ज्यादा पानी होने पर तलाक नहीं दिया जाता.

इस्लाम धर्म की जिस बात मो लेकर सबसे ज्यादा आलोचना होती है वो तलाक है. हालात कुछ ऐसे हैं कि कहीं अगर सब्जी में नमक तेज ही गया या किसी महिला ने दाल में पानी ज्यादा डाल दिया तो पुरुषों द्वारा बड़ी आसानी के साथ तीन बार तलाक कहकर काम तमाम कर दिया जाता था. अब सवाल ये है कि आखिर कितने मौलाना आजतक इस प्रथा के खंडन के लिए सामने आए? आजतक कितनी मुस्लिम शादियां ऐसी हुई हैं जिसमें निकाह के वक्त मुल्ला मौलवियों ने लोगों को इस बात से अवगत कराया.

दहेज की इजाजत नहीं देता इस्लाम फिर भी दिया ही जाता है.

धर्म चाहे कोई भी हो दहेज हमारे समाज की एक बहुत बड़ी कुरीति है. हर रोज तमाम महिलाएं दहेज के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठती हैं. बात वर्तमान की हो तो गुजरात स्थित अहमदाबाद की आएशा की आत्महत्या का मामला ज़ोरों पर है. साबरमती रिवर फ्रंट पर कूदने से पहले आएशा ने एक वीडियो बनाया था जिसमें उसने दहेज और डॉमेस्टिक वायलेंस की बात की थी. इस जवांकारी के बाद सवाल ये है कि आखिर कितने मौलाना ऐसे हैं जिन्होंने तब निकाह छोड़ा जब उन्होंने दहेज में दी जाने वाली बाइक, टीवी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन देखी. दहेज इस्लाम में हराम है मगर फिर भी मौलाना लोगों ने निकाह पड़े और एक धर्म के रूप में जानबूझकर इस्लाम की तौहीन की.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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