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Updated: 26 फरवरी, 2021 10:48 PM
नवीन चौधरी
नवीन चौधरी
  @choudharynaveen
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बेटे और बेटी पर डिबेट लंबे समय से होती चली आ रही है. इसी के मद्देनजर राजस्थान चर्चा में है. कारण है एक ऐसी वारदात जिसने इंसानियत और न्यू इंडिया की बड़ी बड़ी बातों के मुंह पर झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ा है. हुआ कुछ यूं है कि सीकर जिले में हनुमान सैनी नामक व्यक्ति ने पूरे परिवार जिसमें पत्नी और 2 बेटियां थी, उनके साथ आत्महत्या कर ली. वजह थी 18 वर्षीय बेटे की मृत्यु का दुख. बेटा पुलिस में भर्ती होने की तैयारी कर रहा था, जिसे स्टेडियम में दौड़ते हुए हृदयाघात हुआ, और उसकी मौत हो गई. हनुमान सैनी ने नोट में लिखा है कि जमीन है, दुकानें हैं, घर है, पैसा है लेकिन बेटा ही नहीं रहा तो वह कैसे जी पाएगा?

खबर पढ़ना हृदयविदारक था. उनकी दोनों बेटियां 25 और 22 साल की थी जिसमें से एक बीएड कर रही थी और एक ग्रेजुएशन. यक़ीनन बेटे की मृत्यु असहनीय ही होगी लेकिन इतनी कि उसके लिये इंसान दो और बच्चों की हत्या (आत्महत्या करवाना हत्या ही है) कर के खुद का जीवन दे दे? मामले के बाद जो सबसे पहला या फिर अंतिम सवाल दिमाग में आता है वो ये कि बेटे का होना इतना महत्वपूर्ण क्यों है अब भी हमारे और हमारे समाज के लिए ?

ऐसी कैसी कंडीशनिंग है कि दो वयस्क और शिक्षित बेटियां भी माता-पिता के ऐसे जघन्य अपराध के बारे में नहीं बोल पाई और जान दे दी. मुझे लगता था कि शिक्षा से सोच प्रभावित होगी मगर शायद वह काफी नहीं. सामाजिक तौर पर हर स्तर पर सोच बदलनी जरूरी है.

हमने जो बेटे बेटियों के लिए सामाजिक नियम तय कर रखा है उन्हें तोड़ना आवश्यक है. इसकी शुरुआत शहरों से नहीं गांवों से करनी शुरू हो तभी बड़े स्तर पर सोच बदलेगी. शहरी लोग वहीं गांव वाले हैं जो ऊपरी तौर पर थोड़ा सॉफिस्टिकेटेड दिखने का प्रयास करते हैं पर अंदर कहीं न कहीं उसी मानसिकता के साथ हैं. कुल मिलाकर उपरोक्त बातों का सार बीएस इतना है कि गांवों से सोच बदलेगी तो देश की सोच बदलेगी और एक देश के रूप में भारत तरक्की करेगा. 

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लेखक

नवीन चौधरी नवीन चौधरी @choudharynaveen

लेखक मार्केटिंग प्रोफेशनल हैं और 'जनता स्टोर' नाम की किताब के ऑथर हैं

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