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Updated: 29 फरवरी, 2020 03:50 PM
अबयज़ खान
अबयज़ खान
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अशफ़ाक हुसैन (Ashfaq Hussain) की माँ को सुना है आपने? 14 फ़रवरी को उसकी शादी हुई थी. 5 गोलियां मारी गईं उसके सीने में. अभी उसकी दुल्हन के हाथों की मेहंदी भी नहीं सूखी है. उसकी बीवी की सूरत देख लेंगे तो आपका कलेजा फट जाएगा. सिर्फ 11 दिन की शादी - और वो लड़की विधवा बना दी गई. अंकित शर्मा (Ankit Sharma) की माँ की चीखें सुनी हैं आपने. 400 चाकुओं के वार करने के बाद उस लाल की लाश को नाले में फेंक दिया गया. उस माँ को क्या जवाब देंगे जिसने अपने जिगर के टुकड़े को अफसर बनाने के लिए अपनी जिंदगी झोंक दी. 85 साल की अकबरी, 9 महीने की मासूम बच्ची और उसकी मां को घर के अंदर ही जिंदा फूंक दिया.

अरे कौन से हैवान थे तुम? रतन लाल (Ratan Lal) का क्या कसूर था? आप लोगों की जान बचाने के लिए उसने अपनी जान की बाज़ी लगा दी. क्या जवाब है रतन लाल के बच्चों के लिए आपके पास? एक करोड़ रुपये से रतन लाल वापस आ जायेंगे? राम सुमरत के आंसू देखे हैं. रिक्शा चला कर परिवार का पेट पालने वाला अभागा बाप अब अपने 15 साल के बेटे की लाश के लिए तड़प रहा है. शिव विहार का राहुल सोलंकी घर से दूध लेने गया था. गया का दीपक. ब्रिजपुरी का महताब. क्या कसूर था इनका? मुदस्सर के बेटे का चेहरा देखा है आपने? 10 साल का मासूम है. पापा से हर फ़रमाइश के लिए लड़ता था, लेकिन उसके पापा उसके पास कफ़न में लिपट कर पहुंचे थे.

delhi violenceआगे से ध्यान रहे - इंसानों के बीच हैवान न घुसने पायें!

मैंने अपने पापा को 8 साल पहले खो दिया था, लेकिन उनकी कमी आज भी नहीं भूल पाता हूं. जब उन्हें याद करता हूं तो आँसुओं से जार जार रोता हूं. कोई उनकी कमी पूरी नहीं कर सकता. सोचिये मुदस्सर के बेटे पर क्या बीत रही होगी. खजूरी में एक बीएसएफ जवान का घर फूंक दिया गया. किसने देखा उसका राष्ट्रवाद. बस मजहब देखा और फूंक डाला. पीटते रहे लोग देशभक्ति का ढोल. क्या मिला?

जो लोग कपड़ों से पहचान लेते हैं उनके लिए जीटीबी अस्पताल में लाशों की पहचान करना भी मुश्किल था. वहां न कोई हिंदू था, न मुस्लिम था. वहां सिर्फ इंसानों की लाशों की ढेर लगी थी. जीटीबी अस्पताल ने मरने वालों की लिस्ट जारी की है. उसमें पता है लोग क्या ढूँढ़ रहे थे. कोई अपनी माँ, कोई अपना बाप. कोई अपना बेटा. कोई अपना भाई. कोई भी हिंदू मुसलमान नहीं ढूंढ रहा था.

न उसमें कोई बीजेपी का नेता था, न उसमें कोई आप का नेता था और न उसमें कोई कांग्रेसी था.

पता है उसमें कौन था?

आप और मैं!

जो अपने घरों से दूर अपने बच्चों के सपनों में रंग भरने आये थे. जो अपनी बीवियों के ख्वाबों को पंख लगाने आये थे. जो अपने माँ-बाप की लाठी बनने आये थे - और बदले में क्या मिला? हमने उन सब सपनों को एक साथ अपाहिज बना दिया और जिनके लिए हमारे अपने कट गए वो पता है क्या कर रहे थे. लाशें गिन रहे थे. लाशें. हिसाब लगा रहे थे. हमारे कपड़ों से हमें पहचान रहे थे. ताकि हमें मुआवजा देकर हमारे अपनों की लाशों का बही खाता तैयार कर लें. उन्होंने 10 लाख में आपकी लाशों का हिसाब कर दिया, जिनके लिए आप हिंदू-मुसलमान हुए जा रहे थे.

मैं पत्रकार हूं. 16 साल से ऐसी तस्वीरें देख रहा हूं. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है. जब कलेजा फट पड़ा है. आंखों से वो खौफ़नाक मंजर देखने की हिम्मत नहीं है. कानों से वो चीखें सुनी नहीं जा रही हैं. जब फ़ेसबुक और ट्विटर पर ऐसे वीडियो दिखते हैं तो रूह कांप जाती है. कोई माँ बिलख रही है. किसी की बीवी गश खाकर गिर जा रही है. किसी का भाई दहाड़ें मार मार कर रो रहा है. किसी बहन के आंसू सूख नहीं रहे हैं. किसी का बाप अंदर से रोते हुए खुद को बाहर से मजबूत साबित करने में लगा है. मगर आंसू किसी के कैसे छिप सकते हैं.

आजकल न्यूज चैनल नहीं देख रहा हूं. वैसी ही तस्वीरें. वैसी ही नफ़रत. दिल डर रहा है. हाथ कांप रहे हैं. बड़ी हिम्मत करके कई दिन बाद लिखने की कोशिश की है. जब खुद को उनकी जगह रख कर देखता हूं तो हर तरफ धुआं ही धुआं नज़र आता है. दिल किसी अनजान डर से सहम जाता है.

और हां, मंदिर-मस्जिद सब धर्म के अंधों ने पैरों तले रौंद डाले और आप समझ रहे थे वो आपके भगवान, आपके खुदा के लिए लड़ रहे थे.

तो सुनो तुम अब भी बेवकूफ़ हो. भगवान, अल्लाह के लिए तुम्हारी इबादत ही काफी है. उसे गली के गुंडों की ज़रूरत नहीं है.

आखिरी बात. जब कभी तुम मुसीबत में फंसे होगे तो सबसे पहले यही हिंदू और मुसलमान पड़ोसी ही तुम्हारे काम आयेंगे. बाकी जिनको वोट देने के लिए तुम मर मिटे थे. उन्हें अगले 5 साल तक अब तुम्हारी कोई ज़रूरत नहीं है. अगर जरूरत होती तो पहले दिन ही वो सड़क पर आ जाते और आज आपके घर में मातम नहीं होता. आपके गुनहगार हैं आपके नेता. जिनके लिए आप अपनों के खून के प्यासे हो जाते हैं. जिम्मेदार है आपका सिस्टम. जिसके हाथ नेताओं ने बांध रखे हैं. आप मरते रहिए उनके लिए. उनका दिल नहीं पसीजेगा. उनका तो जन्म ही चिकनी मिट्टी से हुआ है.

हाँ, आपको मुआवजा लेना है तो काग़ज़ के लिए वो तुमको फिर कतार में लगा देंगे. बाकी हिंदू-मुसलमान बन कर देख चुके हो, तो एक बार इंसान बनकर भी देख लीजिए!

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लेखक

अबयज़ खान अबयज़ खान @abyaz.khan

लेखक पत्रकार हैं

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