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Updated: 25 अप्रिल, 2022 08:52 PM
सरिता निर्झरा
सरिता निर्झरा
  @sarita.shukla.37
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साल 2020 में दुनिया एक नए बदलाव की ओर चल पड़ी. एक ऐसा बदलाव जिसके लिए ये दुनिया पूरी तरह से तैयार भी नहीं थी. जी नहीं, ये केवल महामारी के आगमन का साल नहीं था बल्कि जीवन को पूरी तरह टेक्नोलॉजी के आधार पर जीने का भी था. घरों में कैद हर किसी ने टेक्नोलॉजी और इंटरनेट के भरोसे अपनी ज़िन्दगी को पटरी पर लाने की कोशिश की. शिक्षा से ले कर नौकरी, और अपनों से जुड़े रहने से ले कर मनोरंजन तक इंटरनेट के हवाले हो गया. छोटे बच्चो के पहले शब्द अगर 'अलेक्सा' और 'सीरी' हो तो आश्चर्य नहीं.

दो साल पहले जिस दुनिया में हम 'अंडर कंट्रोल्ड एनवायरनमेंट' में रहते थे, अचानक उसी दुनिया ने हमे चौबीसों घंटे के लिए घेर लिया. ये कुछ ऐसा था की मकड़ी के जाल में हम खुद फंस जाये और अंजाम से बेखबर उसकी जाल बीनने की कारीगिरी देखे.

Internet, Children, Online, Education, Parenting, Mother, Father, Crimeपढ़ाई की मजबूरी कहें या आदत बच्चे दिन भर इंटरनेट के आगे बैठने को मजबूर हैं

मकड़जाल

पिछले दो सालों में इंटरनेट ने जिस तेज़ी से हमारे घरों ज़िन्दगी और दिमाग में जगह बनाई है उसका असर नज़र आने लगा है. हालिया एक घटना सामने आई जहां मात्र ११ बरस का लड़का साथ खेलने वाली बच्चियों के साथ आपत्तिजनक व्यवहार करता हुआ एक डे केयर के कैमरे में कैद हुआ. टी.वी सीरियल, फिल्म यहां तक की बच्चो के कार्टून भी कुछ ऐसे बातें दिखा जाते हैं जो बच्चो की मासिकता के साथ खिवाद कर जाते हैं.

घटना के पता चलने पर दोनों ही परिवार से अभिवावकों को बुलवाया गया. ये घटना जहां दोनों के लिए एक झटका था, वहीं डे-केयर वालो के लिए एक दूसरी परेशानी सामने लाई.

क्या इतने छोटे बच्चों पर भी अब ऐसी नज़र रखनी होगी ?

अमूमन 10 -12 साल तक के बच्चों की सुरक्षा - उनके खेल में लापरवाही या शारीरिक चोट अथवा किसी बाहरी बड़ी उम्र के इंसान से उन्हें किसी नुकसान की सम्भावना की परिधि में ही देखा जाता है, किन्तु इस घटना ने सुरक्षा के मायनो पर सवाल उठा दिया. यहां शरीर को जानने की स्वाभाविक उत्सुकता को एक कारण माना जा सकता है, जो कि प्राकृतिक है. इसीलिए आज के दौर में बच्चो को उनकी शारीरिक संरचना को छोटी उम्र में समझा देने की कवायद होती है.

अनजान को जानने की उत्कंठा कभी कभी बच्चो को उस ओर ले जाता है जहां जाना उस उम्र के नुकसानदायक है. इंटरनेट की खुली दुनिया जहां - 'हाऊ टू' टाइप करते ही इतने झरोखे खुलते हैं कि देखने वाले का भटक जाना स्वाभाविक है. साल 2021 की शुरुआत में ही बिहार से एक ऐसी ही घटना की खबर सामने आई.

यहां एक तीन साल की नन्ही सी बच्ची के साथ बलात्कार की खबर आई और इस अपराध को करने वाले स्वयं मात्र ग्यारह साल के बच्चे थे. इस अपराध ने संस्कारी सामाजिक ताने बाने की धज्जियां उड़ा दीं. क्या मानसिकता रही होगी जो बच्चे इस उम्र में ऐसे अपराध में लिप्त हुए? क्या उन्हें स्वयं पता है की अपराध हुआ है ?

गलती कहां हुई, किसकी है इस पर बहस से पहले हम सभी को स्वीकारना होगा कि एक समाज के तौर पर हम असफल हुए है. यकीनन अपने आसपास ऐसा बहुत कुछ इन्होने देखा या समझा होगा जिसने इनकी मानसिकता को कुंठित किया .

कानून की कसौटी

हमारा कानून भी इस तरह के अपराध के लिए तैयार नहीं था शायद इसीलिए कानून की सभी धाराएं 12 वर्ष की कम आयु के अपराधी को किसी भी सज़ा कार्यवाही से दूर रखती है. कानून सात साल से कम उम्र के बच्चे को 'डोली इनकैपैक्स' मानता है. डोली इनकैपैक्स एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है 'बुराई करने में असमर्थ'.

कानून में, डोली इनकैपैक्स का उपयोग उस व्यक्ति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जो आपराधिक इरादे या द्वेष रखने में असमर्थ है; जिसके पास सही और गलत के बीच अंतर करने के लिए पर्याप्त विवेक या बुद्धि का अभाव है.

आईपीसी, 1860 की धारा 82 के अनुसार, " सात साल से कम उम्र के बच्चे द्वारा किया हुआ कुछ भी अपराध नहीं माना जाता है ." तो बचपन की स्वाभाविक मासूमियत को ध्यान में रखते हुए यह कानून बने थे किन्तु आज उस सरलता का पूर्णतया अभाव है.

सज़ा का न मिलना अलग बहस खड़ी करता है. बच्चे का 80% प्रतिशत दिमाग और सोच, पांच साल की उम्र तक बन चूका होता है ऐसे में, उसे इस कुंठित मानसिकता से दूर ले जाना नामुमकिन तो नहीं किन्तु कठिन अवश्य है.

हल ढूढ़ने की कवायद

गत दो वर्षों में घरों में कैद रहते हुए बच्चों ने इंटरनेट की दुनिया में बेरोक-टोक कदम रखा जिसका नतीजा भयावह है. पिछले दो वर्षों में भारत में अडल्ट वेबसाइट की स्ट्रीमिंग 95 % बढ़ी है.शिक्षा की कमी, माहौल में अनैतिकता, घर के बड़ों का व्यवहार आदि कई कारण है जो इस समस्या को जटिल करते हैं. 2018 में शारीरिक नुकसान करने वाले अपराधों में 37 % अपराध किसी नाबालिग द्वारा किये थे जिसमे 13% बलात्कार एवं 12 % किसी स्त्री की अस्मिता के साथ खिलवाड़ के अपराध भी थे.

ये परेशान करने वाले आंकड़े हैं

ये जानते हुए की हम इंटरनेट को पूरी तरह से रोक नहीं सकते किन्तु आगे आने वाली पीढ़ी के बेहतर भविष्य के लिए कुछ कदम उठाने ज़रूरी है. समझना ज़रूरी है कि इस समस्या को केवल शिक्षा के ज़रिये ही हल किया जा सकता है.

बच्चो में उम्र के अनुसार 'सेक्सुअल एजुकेशन', इस समय की मांग है. इससे बच्चो में उत्सुकता शांत होगी और प्रश्नो के हल मिलेंगे. बढ़ती उम्र के साथ बच्चो के शारीरिक बदलाव के बारे में बात करें. मनुष्य की शारीरिक संरचना को मात्र एक संरचना मान कर बच्चों को समझाये ताकि उत्सुकता खत्म हो सके.

बच्चों को 'गुड टच बैड टच' के बारे में बहुत छोटी उम्र से बताना हर माता पिता की ज़िम्मेदारी है वहीं शारीरिक एवं मानसिक तौर पर एक दूसरे का सम्मान भी सिखाना ज़रूरी है. ये जेंडर से इतर मुद्दा है. लड़का लड़की दोनों में ये समझदारी होनी चाहिए. ये मात्र बोल कर नहीं अपितु उनके सामने जी कर ही सिखाया जा सकता है.

बच्चो को बताना अति आवश्यक है कि किसी भी हालत में वह मातापिता से सच सकते है ! ये एक बच्चे की बड़ी ताकत होती है.बिना बड़ो की देखरेख में इंटरनेट सर्फिंग न करने दे. किसी न किसी बड़े का साथ होना एक उम्र तक इसीलिए अनिवार्य माना जाता है ताकि बच्चे को सही गलत का भेद समझाया जा सकें. कॉन्ट्रोलड एंड गाइडेड यूज़ - यही समय की मांग है.

चाइल्ड फ्रेंडली - यू ट्यूब किड्स को डाऊनलोड करें. पढ़ाई, खेल, आदि से संबंधित सभी जानकारी मिलेगी और इसे आप बेफिक्री से बच्चो को दे सकते हैं. सोशल मिडिया पर उनकी परिधि को समय समय पर देखा करें और उन्हें सही गलत सबूत समेत समझाया करें.

ऑनलाइन या ऑफ़ लाइन खेले जाने वाले गेम किस तरह के हैं इसका पता आपको अवश्य होना चाहिए. हो सके तो खरीदने से पहले ही जाँच लें. उसके ग्राफ़िक और कहानी, किरदार, शहर काल्पनिक है इसे बच्चे को ज़रूर समझाएं. इस दुनिया को फ़िलहाल बदलना नामुमकिन लग रहा है इसलिए हमे आपने वाली पीढ़ी को ही सजग सफल बनाना होगा. जिस मासूमियत को मद्दे नज़र रखते हुए कानून भी बच्चो को आपराधिक सज़ा से दूर रखता है बचपन की उस मासूमियत को बचाने की जिम्म्मेदारी हम सबकी है.

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लेखक

सरिता निर्झरा सरिता निर्झरा @sarita.shukla.37

लेखिका महिला / सामाजिक मुद्दों पर लिखती हैं.

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