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Updated: 29 अक्टूबर, 2019 05:31 PM
पारुल चंद्रा
पारुल चंद्रा
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जब से फिल्म थिएटर में फिल्म शुरू होने से पहले राषट्रगान बजना शुरू हुआ है तब से गाहे-बहागे इसपर कोई न कोई बहस होती आई है. ताजा मामला बेंगलुरु के एक सिनेमा हॉल से आया है जहां राष्ट्रगान के लिए खड़े नहीं होने पर एक परिवार के साथ जमकर बहस की जा रही है. और बहस करने वाले हैं कन्नड़ अभिनेत्री बीवी ऐश्वर्या और एक्टर अरुण गौड़ा. ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है जिसमें देखा जा सकता है कि किस तरह ये लोग उस परिवार को राष्ट्रगान के लिए खड़ा न होने पर उलझ रहे हैं.

viral videoये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है

राष्ट्रगान पर खड़े होना, न होना मर्जी हो सकती है लेकिन अंजाम अच्छा नहीं होता

ये लोग जो खड़े नहीं हुए उसमें दो महिलाएं प्रमुखता दे दिखाई दे रही हैं, उनका कहना है कि राष्ट्रगान पर खड़े हों न हों ये उनकी मर्जी है. तब उन्हें जवाब मिलता है कि उन्हें शर्म आनी चाहिए. साथ ही ये भी पूछा गया कि क्या वो पाकिस्तानी हैं? भारत माता की जय के नारे लगे. उन्हें कहा गया कि आप 52 सेकंड के लिए राष्ट्रगान के लिए खड़े नहीं हो सकते और 3 घंटे की फिल्म देख सकते हैं. 150 रुपए का टिकट खरीद सकते हैं 52 सेकंड के लिए खड़े नहीं हो सकते ??

भीड़ का कहना था कि अगर आप खड़े नहीं हो सकते, तो यहां से चले जाओ. और आखिरकार वो लोग थिएटर छोड़कर चले गए. गनीमत इसी में थी कि वो थिएटर से चले गए नहीं तो ऐसे मामलों में तो हाथ-पाई तक की नौबत आ जाती है.

खैर वीडियो के बाद से देशप्रेमी ऐश्वर्या और अरुण गौड़ा की तारीफों कर रहे हैं कि देश के प्रति सम्मान न रखने वाले के साथ उन्होंने अच्छा ही किया.

देशभक्ति में जब आया पीरियड वाला ट्विस्ट

लेकिन इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब एक महिला पत्रकार ज्योति यादव ने राष्ट्रीय गान पर खड़े न होने वाली महिला का पक्ष लेते हुए एक ट्वीट किया. उन्होंने लिखा कि- केरल में एक महिला पीरियड की वजह से राष्ट्रगान के लिए खड़ी नहीं हुई. और टीवी के कुछ सो कॉल्ड एक्टर्स ने उन्हें परेशान किया. लोग देशभक्ति के नाम पर इस bullying को सराह रहे हैं.क्या इन लोगों को पीरियड के दर्द का अहसास भी है?

जैसे ही ज्योति यादव ने एक महिला के न खड़े होने का कारण पीरियड को बताया. वो लोगों के निशाने पर तो आईं ही साथ ही बहुत सी महिलाओं ने भी ज्योति यादव को खूब सुनाया. क्योंकि उन्होंने पीरियड का नाम लेकर उस महिला का पक्ष लिया था. माना कि हर महिला को पीरियड में परेशानी होती है, लेकिन हर महिला अपने अपने हिसाब से उससे डील करती है. लेकिन पीरियड का नाम लेकर 52 सेकंड के लिए खड़े न हो सकने की दलील देना किसी के भी गले से नहीं उतरा.

ज्योति यादव की बातों पर जो सवाल खड़े हुए वो कुछ इस तरह से थे. एक महिला ने पूछा- 'क्या उसे थिएटर के अंदर आते ही पीरियड आए? अगर नहीं, तो सोच रही हूं कि कोई घर से थिएटर तक आ सकता है और मल्टीप्लेक्स में आने के लिए कुछ कदम पैदल भी चल सकता है और अचानक 52 सेकंड्स के लिए वो खड़ी भी न हो सकती?'

सवालों का उठना लाजिमी है कि अगर महिला को खड़े होने में इतनी परेशानी थी तो फिर वो थिएटर तक आई कैसे?

महिलाओं का गुस्सा इस बात पर ज्यादा था कि पीरियड को एक बहाने के रूप में इस्तेमाल किया गया. एक महिला का कहना था कि- हजारों महिलाएं बॉर्डर पर पीरियड के दिनों में गर्मी, बारिश और ठंड में घंटो खड़ी रहती हैं, हमारे देश की रक्षा और मेरी और आपकी सुरक्षा के लिए. वो पीरियड के दर्द का बहना बनाकर कभी अपने काम के लिए मना नहीं करतीं. इसलिए ऐसे लोगों का बचाव मत करो जिनका बचाव न हो सके.

एक महिला का कहना था कि पीरियड एक महिला की कमजोरी नहीं होते. यहां फीमेल कार्ड खेलने की कोशिश न की जाए. मुझे कभी पीरियड होने की शर्मिंदगी नहीं होती. दर्द हो तो मैं फिल्म देखने जाने के बजाए घर पर रहूंगी. और राष्ट्रगान के लिए मैं दर्द में, खुशी में गम में भी खड़ी रहूंगी.

अब बात जब देशभक्ति से पीरियड की तरफ मुड़ ही गई तो सबरीमाला का जिक्र तो आना ही था. बात तो उठेगी ही कि मंदिर में प्रवेश को लेकर पीरियड मायने नहीं रखते, लेकिन राष्ट्रगान पर खड़े न होने के लिए पीरियड बहुत बड़ी चीज हो गया.

साथ ही यहां ज्योति यादव को एक बात और याद दिलाई गई कि ये मामला केरल का नहीं बल्कि बैंगलुरू को है. और कन्नड़ करनाटक की भाषा है. यहां उन्हें ये बताने की कोशिश की गई कि किसी भी मामले पर बोलने से पहले ये भी जान लेना चाहिए कि आखिर मामला है कहां का.

मॉरल ऑफ द स्टोरी ये है कि पारियड वास्तव में इतनी बड़ी चीज नहीं है कि उसे किसी भी मामले में excuse बनाकर पेश किया जाए. देशभक्ति अपनी जगह है, राष्ट्रगान पर खड़े होना या न खड़े होना किसी की भी मर्जी हो सकती है और इससे ये भी साबित नहीं होता कि वो शख्स सच्चा देशभक्त नहीं है, या कि वो हिंदुस्तानी नहीं है. जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया था कि किसी भी सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाए जाते समय खड़े होना अनिवार्य नहीं है. लेकिन खड़े न होने के लिए पीरियड का बहाना तो बिल्कुल ही अस्वीकार्य है. कोई भी कितना ही फेमिनिस्ट या कितना भी बड़ा पत्रकार क्यों न हो लेकिन कौन सी बात कहां कहनी है ये सोचना जरूरी है.

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लेखक

पारुल चंद्रा पारुल चंद्रा @parulchandraa

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं

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