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Updated: 09 जनवरी, 2018 04:42 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujkumarmaurya87
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लहराता तिरंगा, भारतीय सेना और बजता हुआ राष्ट्रगान... शायद ही कोई ऐसा भारतीय हो जिसके दिल में इन सबसे राष्ट्रभक्ति न जागती हो. लेकिन इस राष्ट्रभक्ति को किसी पर थोपना कहां तक जायज है? यह किसने कहा कि जब तक आप राष्ट्रभक्ति का प्रमाण नहीं देंगे, आपको राष्ट्रभक्त नहीं माना जाएगा. इसी बात पर अमल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसले को बदल दिया है. अब किसी भी सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं होगा. सबसे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2016 में यह आदेश दिया था कि हर सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य है. 30 नवंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि किसी भी फिल्म से पहले राष्ट्रगान को बिना किसी ड्रामे के चलाना होगा और स्क्रीन पर सिर्फ तिरंगा दिखाई देना चाहिए.

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खड़े होना जरूरी या नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रगान चलाने की अनिवार्यता को खत्म करते हुए एक और बड़े सवाल का सीधा जवाब दे दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि किसी भी सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाए जाते समय खड़े होना अनिवार्य नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार जो लोग राष्ट्रगान के समय खड़े नहीं होते हैं, उन्हें इस आधार पर यह नहीं कहा जा सका कि वह देशभक्त नहीं हैं. आपको बता दें कि इससे पहले सभी को खड़े होने की अनिवार्यता थी, सिर्फ विकलांग लोगों को छूट दी गई थी. उस फैसले की वजह से बहुत सी जगहों पर राष्ट्रगान पर खड़े न होने को लेकर मारपीट के मामले सामने आए, जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खूब आलोचना हुई.

अभी सुलझा नहीं है मामला

केंद्र सरकार ने सोमवार को कोर्ट में हलफनामा दायर किया था कि इस मुद्दे पर एक इंटर मिनिस्ट्रियल कमेटी का गठन किया गया है, जो नई गाइडलाइंस तैयार करेगी. ऐसे में सलाह थी कि सुप्रीम कोर्ट को अपना आदेश बदलना चाहिए. हमें यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ राष्ट्रगान की अनिवार्यता खत्म की है, न कि राष्ट्रगान बजाने पर रोक लगाई है. यानी अगर सिनेमाहॉल चाहे तो वह राष्ट्रगान बजा सकता है. यूं तो राष्ट्रगान के दौरान खड़े होने की अनिवार्यता को भी सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दिया है, लेकिन क्या वे लोग इस बात को मानेंगे जो आए दिन लोगों को देशभक्ति के सर्टिफिकेट देते फिरते हैं? क्या जो लोग सिनेमाहॉल में खड़े न होने वालों से मारपीट करते थे वह देशभक्त हैं? नहीं... वे सब सिर्फ बवाल करने वाले लोग हैं, जिन्हें देशभक्ति से कुछ लेना-देना नहीं है. वे सब सिर्फ देशभक्ति का नाम लेकर मार-पीट किया करते थे. ऐसे में अगर सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाते समय कोई खड़ा नहीं हुआ तो क्या अब उसे देशद्रोही करार देने वाली भीड़ पैदा नहीं होगी? साथ ही नई गाइडलाइंस बनने के बाद कहीं नियम बदल गए तो?

तो फिर उपाय क्या है?

मेरा व्यक्तिगत रूप से यह मानना है कि सुप्रीम कोर्ट को सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजाने की मनाही कर देनी चाहिए. दरअसल, किसी फिल्म के शुरू होने से पहले राष्ट्रगान चलाने का क्या मतलब? खास कर ऐसी फिल्म जिसका देशभक्ति से कोई लेना-देना ही नहीं. क्या राष्ट्रगान को जहां-तहां चला देना सही है? क्या इससे राष्ट्रगान का महत्व कम होता नहीं लग रहा है? क्या राष्ट्रगान चलते वक्त खड़े नहीं होने वाले शख्स को वहां मौजूद अन्य लोगों की आलोचना या गालियां नहीं झेलनी होंगी? हो सकता है उनमें से कुछ हाथापाई पर भी उतर आएं. खैर, अभी तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, यह देखना दिलचस्प होगा कि खुद को देशभक्त कहकर लोगों को देशद्रोही बताने वाले लोग इस फैसले का कितना आदर करते हैं?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर क्या है आपकी राय, नीचे कमेंट बॉक्स में बताना ना भूलें...

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