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Updated: 22 जनवरी, 2022 08:28 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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उत्तर प्रदेश में अब तक सभी सर्वे सत्ताधारी बीजेपी के पक्ष में रिपोर्ट दे रहे हैं. हर सर्वे कह रहा है कि बीजेपी सत्ता में वापसी कर सकती है. बहुत पहले हुए सर्वे के आकलन एकतरफा लगते थे, लेकिन धीरे धीरे मुकाबला थोड़ा मुश्किल मालूम पड़ रहा है.

अब तो करीब करीब साफ हो चुका है कि यूपी की लड़ाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) और समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के बीच होने जा रही है, लेकिन फासला अब भी ज्यादा ही बताया जा रहा है.

नया समाचार ये है कि दो दावेदारों के बीच एक तीसरा मोर्चा भी मार्केट में लांच हो चुका है - भागीदारी परिवर्तन मोर्चा. ये मोर्चा खड़ा करने की कोशिशें काफी दिनों से चल रही थीं, लेकिन बार बार संभावित सदस्यों के कहीं और चले जाने से खड़ा होने से पहले ही लड़खड़ा जाता. AIMIM नेता शुरू से ही ये मोर्चा खड़ा करने की कोशिश में जुटे रहे और अब जाकर इसकी सार्वजनिक घोषणा भी की जा चुकी है.

नये मोर्चे की घोषणा भी काफी धमाकेदार हुई है. सत्ता में आने की सूरत में दो-दो मुख्यमंत्री और तीन डिप्टी सीएम बनाये जाने का ऐलान किया गया है. एक डिप्टी सीएम मुस्लिम भी होगा. मोर्चे में असदुद्दीन ओवैसी के अलावा मायावती के करीबी नेता रहे बाबू सिंह कुशवाहा और भारत मुक्ति मोर्चा के वामन मेश्राम भी शामिल हैं. कहने को तो भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर आजाद भी आधा दर्जन से ज्यादा राजनीतिक दलों को अपनी आजाद समाज पार्टी के साथ जोड़ने का दावा कर रहे हैं.

यूपी चुनाव (Up Election 2022) में राजनीतक दलों में तो बंटवारा साफ साफ नजर आने लगा है, लेकिन धर्म और जाति के बीच बंटा वोटर बहुत सारे भ्रम पाले हुए है - ऐसे बहुत लोग हैं जिनको कोई कंफ्यूजन नहीं है, लेकिन तमाम चुनावी वादों के बावजूद ऐसा कई तबके हैं जो तय नहीं कर पा रहे हैं कि किसे वोट वोट दें?

योगी बनाम अखिलेश तो क्लिअर है

बीजेपी ने पिछली बार की कामयाबी के हिसाब से सीटों का आंकड़ा 300 के पार लाने का लक्ष्य रखा है, लेकिन सर्वे में ये 250 के इर्द गिर्द ही नजर आता है. दूसरे नंबर पर शुरू से ही अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी जगह बनाये हुए हैं, लेकिन किसी भी सर्वे में वो दो सौ के करीब भी पहुंच रही हो, ऐसा नहीं पाया गया है.

एक ताजा सर्वे में यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से बीजेपी के हिस्से में 201-233 सीटें आने का अनुमान लगाया गया है, जबकि अखलेश यादव की झोली में 148-159 सीटें आ सकती हैं. पहले भाजपा और सपा के बाद बसपा का नंबर हुआ करता था और आखिरी पायदान पर कांग्रेस लेकिन प्रियंका गांधी के फील्ड वर्क से माहौल थोड़ा बदला हुआ लगता है. लिहाजा कांग्रेस को 9-15 और बीएसपी को 8-14 सीटें मिलने का आकलन किया गया है.

yogi adityanath, akhilesh yadavयूपी की लड़ाई में नेताओं ने वोटर को ही भ्रम में डाल दिया है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को देखते हुए बीजेपी की कोशिश है कि यूपी का चुनाव जैसे भी मुमकिन हो मोदी बनाम अखिलेश हो जाये, लेकिन समजवादी पार्टी और उसके अघोषित मित्रवत साथी लड़ाई को योगी बनाम अखिलेश ही बनाये रखने पर फोकस कर रहे हैं.

इंडिया टुडे और सी वोटर के मूड ऑफ द नेशन सर्वे के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन को लेकर करीब 49 फीसदी लोग संतोष जता रहे हैं. करीब 17 फीसदी लोग ऐसे भी हैं जो योगी सरकार के कामकाज से थोड़े असंतुष्ट बताये जा रहे हैं - लेकिन 34 फीसदी लोगों ने खुल कर योगी आदित्यनाथ के कामकाज को लेकर असंतोष जाहिर किया है.

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो अब एक्टिव हुए हैं, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा तो आम चुनाव के बाद से लगातार योगी आदित्यनाथ के खिलाफ हमलावर रही हैं, लेकिन बीएसपी नेता मायावती की खामोशी पर अब भी सवाल खड़े हो रहे हैं.

अखिलेश यादव तो नहीं लेकिन प्रियंका गांधी के साथ साथ बीजेपी नेता अमित शाह भी मायावती की खामोशी पर सवाल उठाते रहे हैं. अपने ताजा हमले में प्रियंका गांधी ने मायावती पर बीजेपी के दबाव में होने का अंदेशा जताया है.

सर्वे में चुनावी मुद्दों को लेकर भी लोगों से सवाल पूछे गये हैं. सर्वे में शामिल 35 फीसदी लोगों ने बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा माना है. बेरोजगारी के मुद्दे पर तो विपक्ष बीजेपी सरकार पर सवाल लगातार उठाता रहा है, लेकिन तरीका बहुत प्रभावी नहीं लगा है.

सर्वे में भाग लेने वाले 23 फीसदी लोगों की नजर में महंगाई, तो 10 फीसदी को कोरोना महामारी, 7 फीसदी को भ्रष्टाचार और 2 फीसदी लोगों आर्थिक हालात भी चुनावी मुद्दा लगा है.

बीजेपी तो नये चुनावी वादों से पहले योगी आदित्यनाथ सरकार के कामकाज को सामने रख रही है, लेकिन अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी में नौकरियों को लेकर वादों की अलग से होड़ चल रही है. प्रियंका गांधी ने 20 लाख सरकारी नौकरियों का वादा किया है तो अखिलेश यादव आईटी सेक्टर में ही 22 लाख नौकरियों का वादा कर रहे हैं.

ये तो हुई मुख्य मुकाबले की बातें - और हो सकता बहुतों ने किसी न किसी आधार पर अपनी पार्टी और अपना उम्मीदवार चुन भी लिया हो, लेकिन अभी ऐसे कई तबके हैं जिनकी पसंद और नापसंद का पैमाना ऐसा है कि फैसला ले पाना मुश्किल हो रहा है.

जातिवाद, धर्म और राष्ट्रवाद

मूड ऑफ द नेशन सर्वे के जरिये एक खास बात जो सामने आयी है, वो ये है कि अब बीजेपी के धर्म और राष्ट्रवाद का एजेंडा ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला है. कम से कम जिस तरीके से अब तक बीजेपी पेश करती आ रही है, वो काफी हद तक अप्रासंगिक हो चुका है.

1. राम मंदिर का मुद्दा: ये सुन कर बीजेपी के रणनीतिकारों को काफी मायूसी हुई होगी कि सर्वे में शामिल सिर्फ 15.7 फीसदी लोग ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं.

ध्यान रहे 2019 के आम चुनाव में बीजेपी ने संघ और वीएचपी की सलाह से होल्ड कर लिया था. जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या केस में फैसला सुनाया तब झारखंड विधानसभा के चुनाव हो रहे थे. उसके बाद दिल्ली चुनाव हुए, लेकिन कहीं कामयाबी नहीं मिली. झारखंड में तो बीजेपी को सत्ता भी गवां देनी पड़ी थी.

पश्चिम बंगाल चुनाव की समीक्षा में बीजेपी नेतृत्व का आकलन रहा कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के चलते पार्टी को शिकस्त झेलनी पड़ी थी - और उसी से लगा कि यूपी चुनाव में भी हिंदू-मुस्लिम होना है.

हाल फिलहाल चित्रकूट से लेकर हरिद्वार तक कई ऐसे कार्यक्रम हुए हैं जिनमें घर वापसी से लेकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ नफरत भरे बयानों को लेकर पुलिस में शिकायत और गिरफ्तारी तक हुई है, लेकिन लगता है लोग अब इन सब चीजों से ऊबने लगे हैं. हां, पार्टियों के आईटी सेल भी थक चुके हों, अभी ऐसा नहीं लगा है.

2. धारा 370 भी अब मुद्दा नहीं: सर्वे में सिर्फ 12 फीसदी लोगों ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 खत्म करने को मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शुमार किया है - लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में हुए चुनावों में ये महसूस किया जा चुका है कि बीजेपी को ये मुद्दा उछालने का कोई फायदा नहीं हुआ था.

बीजेपी धारा 370 जैसे मुद्दों का जिक्र कर अपने राष्ट्रवाद के एजेंडे में विपक्ष को नंगा करने की कोशिश करती है और मौका देखकर पाकिस्तान परस्त साबित करने लगती है.

3. : कुछ बातें सर्वे से बाहर भी आपसी बातचीत में समझ में आती हैं - और उसमें काफी लोग कन्फ्यूज नजर आते हैं. खास कर जातीय आधार पर वोट देने को लेकर.

कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद कई विपक्षी दलों ने ब्राह्मण समुदाय को लुभाने की तरह तरह से कोशिश की थी - और खुशी दुबे के नाम पर तो बीएसपी महासचिव सतीशचंद्र मिश्रा अक्सर ही सहानुभूति लेने की कोशिश करते हैं.

बीजेपी की भी चिंता ब्राह्मण वोटों के लेकर दिखी है. वरना, लखीमपुर खीरी हिंसा के बाद से निशाने पर आये केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी को लेकर बीजेपी को लगातार बैकफुट पर बने रहने की क्या जरूरत थी.

मायावती एक बार फिर से दलितों के साथ ब्राह्मण वोट हासिल कर सत्ता में वापसी का दावा कर रही हैं, लेकिन जो लोग बीजेपी से नाराज हैं वे भी बीएसपी के साथ जाने को तैयार नहीं लगते - न ही वे अखिलेश यादव के सपोर्ट के मूड में लगते हैं.

और सिर्फ ब्राह्मण ही क्यों, करीब करीब पूरा सवर्ण तबका ऐसी ही बातें कर रहा है. ये भी देखने को मिला है कि 'ठाकुरों की सरकार' कहने वाले राधामोहन दास अग्रवाल का ही टिकट कट चुका है. गोरखपुर सदर सीट से योगी आदित्यनाथ को ही बीजेपी ने उम्मीदवार बना दिया है. ऐसे में सिर्फ गोरखपुर ही क्यों यूपी के ज्यादातर हिस्सों में अगर स्थानीय उम्मीदवार के साथ कोई निजी जुड़ाव नहीं है तो उसकी पंसद बीजेपी ही है.

सवर्ण वोटर कई मामलों में बीजेपी से नाराज भी है. खासकर कोरोना वायरस की दूसरी लहर की बदइंतजामी को लेकर, जब लोग न अपने इंतजाम कर पा रहे थे और न ही दूसरों की मदद कर पा रहे थे - लेकिन उनका सवाल है कि विकल्प कहां है?

चूंकि जातिवादी राजनीति के सवर्ण तबके खांचे में अखिलेश यादव और मायावती मिसफिट हैं, इसलिए लोग टीना फैक्टर की तरफ इशारा करने लगते हैं - विकल्प कहां है? अगर ऐसी बातचीत में विकल्प के तौर पर कांग्रेस का नाम सुझाया जाता है तो कहते हैं - वो तो ठीक है लेकिन अभी वोट कौन बर्बाद करे.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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