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Updated: 19 जून, 2017 11:31 PM
सुशोभित सक्तावत
सुशोभित सक्तावत
  @sushobhit.saktawat
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'आतिशबाज़ी हो रही है. ऐसा लग रहा है, जैसे ईद वक़्त से पहले ही आ गई हो. मुबारक़बाद, पाकिस्तान.'

यह बात मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने कही है. नहीं, वे पाकिस्तानी नहीं हैं, वे हिंदुस्तानी हैं. वे कश्मीर के अलगाववादी नेता हैं और आपको यह जानकर अचरज होगा कि मीरवाइज़ 'हुर्रियत' का सबसे उदारवादी चेहरा हैं. जैसे ही मैंने यह कथन पढ़ा, एक सवाल मेरे ज़ेहन में गूंजा और मेरा मानना है कि वह हर हिंदुस्तानी के ज़ेहन में गूंजना चाहिए.

वो सवाल है : '1947 में भारत को तोड़कर पाकिस्तान बनाया गया, लेकिन पाकिस्तान के निर्माण से किसको फ़ायदा हुआ?' मैं दिमाग़ पर ज़ोर डालकर सोच रहा हूं, लेकिन मैं किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा हूं. शायद, कोई बुद्धिमान आकर मुझे बता सके कि पाकिस्तान के निर्माण से यह लाभ हुआ है.

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मैं कुछ विकल्प सुझाता हूं...

1) क्या पाकिस्तान के बनने से ख़ुद पाकिस्तान को लाभ हुआ? यानी अगर वह इलाक़ा आज भारत के अधीन होता तो क्या वहां हालात आज से बदतर होते या बेहतर होते?

2) क्या पाकिस्तान बनने से मुसलमानों को कोई फ़ायदा हुआ, बशर्ते एक पूर्ण इस्लामिक कट्टरपंथी मुल्क मिल जाने को ही वे अपना फ़ायदा ना मानें और अपने सर्वांगीण विकास के बारे में विचार करें?

3) क्या पाकिस्तान बनने से दुनिया को कोई फ़ायदा हुआ? या इसके उलट कहीं दुनिया को ही तो आतंकवाद का एक ऐसा कारख़ाना नहीं मिल गया, जिसने आज समूची मनुष्यता के भविष्य को अपहृत कर लिया है?

4) क्या इससे सांप्रदायिक सौहार्द क़ायम हुआ? क्या इससे हिंदू-मुस्ल‍िम वैमनस्य घटा? या क्या इससे चरमपंथ पर रोक लगाई जा सकी?

5) और सबसे ज़रूरी सवाल यह कि क्या इससे भारत को ही कोई लाभ हुआ, क्योंकि क़ुर्बानी भारत ने दी थी, बंटवारा भारत ने सहा था, अपने हिस्से की ज़मीन पाकिस्तान को भारत ने दी थी?

दक्षिणपंथी कह सकते हैं कि इससे मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा भारत से दूर हो गया और यह कुल-मिलाकर अच्छा ही है. नहीं ऐसा नहीं है. क्योंकि अव्वल तो इस्लाम के लिए आबादी कोई समस्या नहीं होती है और विभाजन के बाद भारत में मुस्ल‍िमों की आबादी तेज़ी से बढ़ी ही है.

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दूसरे, मुस्ल‍िमों की महज़ 15 प्रतिशत आबादी भी किसी भी देश के लोकप्रिय विमर्श को 'हाईजैक' और 'डॉमिनेट' कर सकती है. जैसे कि यही कि 'चैंपियंस ट्रॉफ़ी' में पाकिस्तान की जीत के बाद कश्मीर सहित भारत के कई इलाक़ों में पटाखे फोड़े गए और शेष भारतवासी ना केवल असहाय से अपना यह अपमान देखते रहे, बल्कि हिंदुओं का ही एक बड़ा सेकुलर वर्ग मुस्लिमों के बचाव में भी पूरी सेवाभावना से जुटा रहा.

बंटवारे का तर्क क्या होता है? बंटवारे की नौबत कब आती है? ये निहायत बुनियादी सवाल हैं. बंटवारे की नौबत तब आती है, जब दो पक्ष यह मान लें कि अब एक साथ रहना उनके लिए संभव नहीं रह गया है, इसलिए अलग हो जाने में ही भलाई है. ध्यान दीजिए, यहां पर बुनियादी मसला है : 'एक साथ रहना अब संभव नहीं रह जाना.'

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जब 1947 में ही हिंदुओं और मुसलमानों का एक साथ अमन चैन से रहना संभव नहीं रह गया था और बंटवारे की नौबत आ गई थी, तो आज 'गंगा जमुनी तहज़ीब' और सांप्रदायिक सौहाद्र का हवाला भारत में किस मुंह से दिया जाता है?

दूसरे, बंटवारे का तर्क यह होता है कि अब जब हम अलग हो रहे हैं तो हम आशा करते हैं कि आप अपने घर में ख़ुश रहेंगे और हम अपने घर में ख़ुश रहेंगे. लेकिन क्या ऐसा हुआ? अव्वल तो यही कि क्या बंटवारा भी ठीक से हुआ था? कहीं ऐसा तो नहीं कि बंटवारा भी हो गया हो और झगड़े की जड़ भी अपनी जगह पर रह गई हो? लाठी भी टूटी और सांप भी नहीं मरा!

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सईद नक़वी ने एक किताब लिखी है : 'बीइंग द अदर : द मुस्ल‍िम्स इन इंडिया' मैं सईद नक़वी को हमेशा इसलिए ध्यान से पढ़ता हूं ताकि मुस्ल‍िम बुद्धि‍जीवियों के सोचने की प्रक्रिया को समझ सकूं. नक़वी ने अपनी किताब में कहा है कि भारत के हिंदुओं के दिमाग़ में यह रह गया है कि मुसलमानों ने अलग देश भी ले लिया और यहां भी रह गए. सईद नक़वी से पूछा जाना चाहिए कि अगर भारत के हिंदू ऐसा सोचते हैं, तो इसमें ग़लत क्या है?

पंजाब-सिंध की मुस्ल‍िम बहुल आबादी ने 'पाकिस्तान' अलग ले लिया, बंगाल की मुस्ल‍िम बहुल आबादी ने पूर्वी पाकिस्तान यानी 'बांग्लादेश' अलग ले लिया. ये दोनों मुल्क पूर्ण मुस्ल‍िम राष्ट्र की तरह विकसित हुए. इसके बावजूद भारत में 'मुस्ल‍िम समस्या' का अंत होने के कोई आसार नज़र नहीं आते. 'ढाक के तीन पात' वाली स्थि‍ति है. सन् सैंतालीस जैसे हालात आज भी क़ायम है, जिससे सवाल उठता है कि आखि‍र भारत-विभाजन का तर्क क्या था और उससे हासिल क्या हुआ?

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पाकिस्तान भारत का दुश्मन है. बांग्लादेश भारत से नफ़रत करता है. कश्मीर भारत से अलग होना चाहता है. कश्मीरी भारत पर पत्थर फेंकते हैं और भारत की हार का जश्न मनाते हैं. देश में जहां-जहां मुस्लिम बस्त‍ियां हैं, वहां-वहां छोटे पाकिस्तान और कश्मीर बने हुए हैं. जहां-जहां मुस्ल‍िम बहुसंख्या है, वहां अलगाव या आक्रामकता के स्वर हैं. जहां मुस्लि‍म अल्पसंख्या में है, वहां राजनीतिक समीकरणों को वे प्रभावित कर रहे हैं. भारतीय गणराज्य के मुंह पर सरेआम थूका जा रहा है. दोनों हाथ में लड्डू किसके रहे?

1947 में मुस्ल‍िमों को एक अलग मुल्क दे देना ना केवल भारत और दक्षिण एशि‍या बल्क‍ि पूरी दुनिया के लिए एक आत्मघाती त्रासदी थी. इसके दुष्प्रभाव दिन-ब-दिन आपको और नज़र आते रहेंगे. यह गुनहगारों को गुनाह करने के लिए भरपूर मोहलत देने की तरह था. संभवत: दुनिया के किसी भी राजनेता द्वारा की गई सबसे बड़ी भूल.

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माया मिली ना राम. आपने पाकिस्तान दे दिया, इससे उन लोगों के हौसले बुलंद ही हुए. अब जेएनयू वाले आमादा हैं कि कश्मीर भी मुसलमानों को दे दिया जाए. लेकिन क्या इससे भी अमन क़ायम हो जाएगा? अमन बड़ी चीज़ है और अब वही सबसे नामुमकिन होता जा रहा है.

जिस अंदाज़ में भारतीय मुसलमानों ने पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाया है या वे इससे मन ही मन मुतमईन नज़र आए हैं, उससे सांप्रदायिकता के घावों पर मरहम नहीं लगने वाला है. इससे कट्टर राष्ट्रवाद को बढ़ावा ही मिलेगा. जब कोई मुल्क अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने को तत्पर हो तो उसे भला कौन बचा सकता है. पाकिस्तान नाम के राक्षस को जन्म देने के लिए मनुष्यता का इतिहास भारत के राजनीतिक-तंत्र को कभी माफ़ नहीं करेगा.

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लेखक

सुशोभित सक्तावत सुशोभित सक्तावत @sushobhit.saktawat

लेखक इंदौर में पत्रकार एवं अनुवादक हैं.

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