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Updated: 03 मई, 2019 02:33 PM
युसुफ बेग
युसुफ बेग
 
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सोमवार को पश्चिम बंगाल में चौथे चरण के चुनाव में हुई हिंसा ने बहुत सारे लोगों को हैरान कर दिया. ऐसी बहुत सी वजहें हैं, जिनके चलते बंगाली लोगों को सबसे अधिक संस्कारों वाली कम्युनिटी के तौर पर देखा जाता है. वहीं उत्तर भारत के लोगों को बुरे काम में लगे होने वाला समझा जाता है. लेकिन सोमवार के चुनाव के दौरान बंगाल में जो हुआ, उसने दिखा दिया कि बंगाल के लोग भी हत्या तक करने को आमादा हो सकते हैं.

जहां एक ओर पूरा देश पश्चिम बंगाल की सोमवार की हिंसा से हैरान है, वहीं दूसरी ओर बंगाल में रहने वाले लोगों के चेहरे पर ऐसा कोई भाव नहीं दिखेगा. बंगाली लोगों के चेहरे से सज्जनता का जो भाव झलकता है, वो महज दिखावा भर है. इसे जरा सा स्क्रैच करिए और एक गुंडा बंगाली खुशी से बाहर आ जाएगा.

सोमवार को हुई हिंसा दशकों से बंगाल की राजनीति के डीएनए का ही एक हिस्सा जैसी है. संसद, विधानसभा और नगर पालिका के चुनावों को तो भूल ही जाइए. हमारे तो कॉलेज/यूनिवर्सिटी के चुनावों में भी हिंसा होती है. एक वो भी वक्त था जब स्टूडेंट्स के चुनावों में भी देसी बम के धमाके सुनाई दिया करते थे. कोलकाता यूनिवर्सिटी से जाधवपुर यनिवर्सिटी गया मेरा एक दोस्त चुनाव वाले दिन कॉलेज में चाकू लेकर आया. हमें उसे समझाना पड़ा कि हम सिर्फ लोहे की रॉड और लाठियों का इस्तेमाल करते हैं. और हां, कभी-कभी देसी बम का भी.

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चुनाव के दिनों में कोलकाता के कॉलेज की गलियां युद्ध का मैदान बन जाती हैं. सोडे की बोलतें उछलती हैं, पत्थरबाजी होती है, पुलिस इतनी उदारवादी है कि सिर्फ लाठीचार्ज करती है. पिछले कुछ सालों में भले ही स्टूडेंट्स के मामले में हिंसा की घटनाओं में कुछ कमी आई हो, लेकिन अन्य चुनावों में बांस की लाठियां, भाले, बम और पाइप गन का स्टॉक रखा जाता है. बंगाल में राजनीतिक हिंसा का एक लंबा इतिहास है.

बंकिम चंद्र चटोपाध्या अपने निबंधों और नॉवेल आनंदमठ (1882) में एक स्थापित लड़ाके रहे हैं. इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी बंकिम का जन्मदिन मनाना चाहती है. एक ओर आनंदमठ कल्पना पर आधारित उपन्यास है, लेकिन वास्तविक जीवन में बंगाल में संन्यासी और फकीर के रूप में भी विद्रोही रहे हैं, जिन्हें बंगाली में ‘संन्यासी बिद्रोहा’ कहा जाता है.

गांधी जी के अहिंसा और सत्याग्रह से उलट, बंगाल में अनुशीलन समिति (20वीं सदी की शुरुआत में) थी. ये समति देश को अंग्रेजों से आजाद करने के लिए क्रांतिकारी हिंसा में भरोसा रखती थी. हमारे हीरो हैं खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, बाघा जतिन, बेनाय बसु, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता. आखिरी तीनों का नाम एक साथ लिया जाता है और उन्हें बेनॉय-बादल-दिनेश कहा जाता है, कोलकाता के बीबीडी. पहले जिसे डलहौजी स्क्वायर के नाम से जाना जाता था, उसका नाम बदल कर बीबीडी बाग कर दिया गया है. इन सभी ने ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करने की कोशिश की और कोशिश करते-करते ही मर गए. और उसके बाद यहां मास्टर-दा (सूर्य सेन) हैं और चित्तागोंग हथियार-गृह पर उनका हमला है.

आजादी के लड़ाई में हुई हिंसा के अलावा भी कई दशक हिंसा से जुड़े रहे हैं. इन्हीं में से एक है 1960 के दशक की नक्सलबाड़ी. उस दौरान हिंसा रोजाना की बात हो गई थी. 70 के दशक की शुरुआत की बात है, जनवरी महीन की एक सुबह हम अपनी दादी के घर थे. वह एक स्कूल की प्रिंसिपल थीं और स्कूल परिसर में ही रहती थीं. वो गणतंत्र दिवस का दिन था, तिरंगा लहरा रहा था, राष्ट्रगीत गाया जा रहा था, बच्चों में मिठाई बांटी जा रही थी... बिल्कुल उसी तरह जैसे हर गणतंत्र दिवस को होता था.

तभी तीन युवा आए, तिरंगे को खींचकर नीचे कर दिया, अपना लाल झंडा लहरा दिया- काफी हद कर सीपीआई (एमएल) से मिलता जुलता- और कुछ ने ‘नक्सलबाड़ी जिंदाबाद’ के नारे लगाए. कुछ ने चीनेर चेयरमैन, अमादेर चेयरमैन (चीन का चेयरमैन ही हमारा चेयरमैन है) के नारे लगाए और कुछ देसी बम के धमाके कर के चले गए. मेरी दादी ने स्कूल के गार्ड की ओर देखा और कहा कि तिरंगे को उठाओ और लाल झंडे को नीचे करो. पूरे समय वह अपनी चाय की चुस्की लेती रहीं. हम बच्चे भी थोड़ी देर बाद अपना खेलने में लग गए.

उन दिनों हिंसा का डर हर समय माहौल में समाया रहता था और कभी-कभी स्थिति बेहद भयावह हो जाती थी. जैसा 30 अप्रैल 1982 को हुआ. दक्षिण कोलकाता में 17 आनंदा मार्गिस को उनकी कार से घसीटकर बाहर निकाला गया, पीटा गया और जिंदा जला दिया गया. इस पूरे समय लोग अपने काम पर जा रहे थे, ऑफिस जाने वाले बसों की खिड़कियों से देख रहे थे और स्कूल जा रहे बच्चों ने भी ये सब देखा...

हिंसा तो बंगाल के लोगों की जिंदगी के हिस्से जैसा बन गया है. पश्चिम बंगाल विधानसभा के एक जवाब के मुताबिक 1977 से 2007 तक (लेफ्ट फ्रंट की सत्ता) 28,000 राजनीतिक हत्याएं हुई थीं. सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन भी हिंसा का एक नमूना है.

लेकिन बहुत सारी घटनाएं तो ऐसी होती हैं, जो रिपोर्ट ही नहीं हो पातीं. जो लोग बंगाल में कभी नहीं रहे हैं, उन्हें बंगाली सोसाएटी में होने वाली खूनी हिंसा का भी कुछ पता नहीं होगा. मुनमुन सेन कहती हैं कि वह देर से उठीं, क्योंकि उन्हें बेड टी देर से मिली, ये उतना ही सच है, जितना चुनाव के दिन महिलाओं द्वारा पुलिस से भिड़ने की तस्वीरें सच हैं.

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लेखक

युसुफ बेग युसुफ बेग

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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