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Updated: 02 मई, 2021 06:58 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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धार्मिक आधार पर मतों का ध्रुवीकरण कई बार नुकसानदेह साबित हो जाता है. क्योंकि ये हमेशा एकतरफा नहीं होता. अगर कोई पार्टी धार्मिक पहचान पर राजनीति करती है तो दूसरा तबका किसी और पक्ष में एकमुश्त जा सकता है. हाल के विधानसभा चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल से भाजपा को ऐसा ही सबक मिलता दिख रहा है. ममता बनर्जी से अलग होकर लेफ्ट-कांग्रेस के धड़े में 'फुरफुरा शरीफ' के शामिल होने के बाद बीजेपी को उम्मीद थी कि मुसलमान मतों में बिखराव के बीच बंगाल में "हिंदू पहचान" के सहारे वो टीएमसी के 10 साल के राज का अंत कर देगी. पर ऐसा हुआ नहीं.

रुझान और उसमें लेफ्ट-कांग्रेस के साथ पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की मौजूदगी साफ बता रहे हैं कि बीजेपी को रोकने के लिए समूचे बंगाल में मुसलमानों ने एकजुट होकर ममता बनर्जी के पक्ष में जमकर वोट डाले. दूसरी ओर भाजपा हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने में नाकाम रही. हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा को भी हिंदुओं के बहुतायत वोट मिले हैं. मगर धार्मिक ध्रुवीकरण के गंदे खेल में सीधे-सीधे ममता बनर्जी को फायदा मिला. मुसलमानों के एकतरफा ध्रुवीकरण से सत्ता हासिल कर लेने का बीजेपी का मंसूबा फेल हो गया.

पश्चिम बंगाल में करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है. राज्य की 70 से 100 विधानसभा सीटों पर मुसलमान सीधे-सीधे निर्णायक हैं. एक दशक पहले तक राज्य में हिंदीभाषी प्त्रभाव वाले शहरी इलाके को छोड़कर हिंदुत्व की राजनीति का कभी कोई जोर नहीं था. वोट पैटर्न के लिहाज से मुसलमान लेफ्ट, कांग्रेस और तृणमूल के बीच बंटे हुए थे. फुरफुरा शरीफ का भी मुसलमानों पर हमेशा से असर रहा.

ममता की पिछली बड़ी कामयाबियों में फुरफुरा शरीफ के योगदान से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन पिछले कुछ सालों में नरेंद्र मोदी के साथ जैसे-जैसे भाजपा राज्य में मजबूत होने लगी, मुसलमानों का वोटपैटर्न भी बदलने लगा. जैसे कि देश के दूसरे हिस्सों में नजर आता है.

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बंगाल के मुसलमान बीजेपी को हराने के लिए वोट करने लगे. इस बार फुरफुरा शरीफ के लेफ्ट कांग्रेस में चले जाने के बाद काफी हद तक आशंका थी कि ममता के मुस्लिम मतों में सेंध लगेगी. मगर मुसलमानों ने 'फुरफुरा शरीफ' के संदेश को भी दरकिनार किया.

मुसलमानों ने तो पीरजादा अब्बास सिद्दीकी को ये तक संदेश दिया कि वो अपनी सक्रियता "दरगाह" तक ही सीमित रखें. सोशल मीडिया पर मुसलमानों के ओपिनियन मेकर्स की प्रतिक्रियाओं में इसे साफ़ देखा जा सकता है. बीजेपी के खिलाफ असम में कांग्रेस के साथ, बंगाल में ममता के साथ, तमिलनाडु-पुद्दुचेरी में डीएमके और केरल में कुछ सीटों के अलावा ऐसे पैटर्न की जरूरत ही नहीं थी.

शुरू-शुरू में उम्मीद से भरे पीरजादा अब्बास की बॉडी लैंग्वेज ममता के खिलाफ आक्रामक और बेहतर नजर आ रही थी. चुनावी जमीन पर उतरने के साथ ये लगातार बदलती गई. जाहिर सी बात है कि उन्हें मुसलमानों का लगातार फीडबैक (नकारात्मक) मिल रहा था. हालांकि अब्बास, हुबली से बाहर बहुत ज्यादा असर डालने की स्थिति में ही नहीं थे जितना कि उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था. ऐसा सिर्फ राज्य में मुसलमानों के सहारे लेफ्ट-कांग्रेस की उम्मीदों के लिए था. असदुद्दीन ओवैसी भी बंगाल के रण में बहुत सीमित थे. उन्होंने सिर्फ सात सीटों पर उम्मीदवार उतारे. मुस्लिम मतों में बड़े पैमाने पर बिखराव की रही-सही गुंजाइश ख़त्म हो गई. पिछले 10 सालों में लेफ्ट-कांग्रेस का जनाधार वैसा रहा नहीं कि वो बीजेपी या तृणमूल के सामने सीधे चुनौती पेश कर सके.

हाल के महीनों में बंगाल से लेकर दिल्ली तक मोदी के खिलाफ ममता बनर्जी की आक्रामक राजनीति से मुसलमानों का भरोसा लगातार मजबूत हुआ है. उन्हें लगा कि फुरफुरा शरीफ के बहाने लेफ्ट और कांग्रेस के मोर्चे में जाने का मतलब है एक तरह से बीजेपी के हाथों सत्ता सौंप देना. मौजूदा चुनाव में मुसलमानों की गोलबंदी की एक और बड़ी वजह वो चर्चाएं भी रहीं जो रह-रहकर लगातार सामने आईं. लेफ्ट और कांग्रेस के संभावित हश्र से वाकिफ तमाम कार्यकर्ता, टीएमसी को हराने के लिए अंदर ही अंदर बीजेपी के लिए काम करने लगे. बंगाल चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके बीजेपी के एक बड़े नेता ने भी नंदीग्राम विधानसभा के आधार पर इन पंक्तियों के लेखक से पुष्टि की. दरअसल, टीएमसी ने लेफ्ट के खंडहर पर ही अपनी इमारत खड़ी की थी. वाम राजनीति के लिहाज से उसकी हार के मायने थे.

बंगाल के जनादेश से दो बड़ी चीजें निकल कर आ रही हैं. पहला यह कि 'सवर्ण हिंदुओं' के वोट बड़े पैमाने पर पोलिंग बूथ तक पहुंचे ही नहीं. इंडिया टुडे/आजतक पर कुछ एक्सपर्ट्स ने भी बताया कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर के बाद बंगाल में आख़िरी तीन फेज के चुनावों पर सीधा असर पड़ा. भाजपा के ज्यादा वोट नहीं निकले और जो बाहर आए उनपर महामारी की तस्वीरों का असर हावी हो गया. संभवत: आखिरी वक्त में उनका मन बदला.

ममता बनर्जी ने कुछ लास्ट फेज में महामारी के बहाने सीधे मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला. बीजेपी नेताओं की सभाओं, जुलूसों, बाहर से आए बीजेपी कार्यकर्ताओं और अन्य (अर्ध सैनिक बाल) के बहाने राज्य में महामारी फैलाने का आरोप लगाया.

महामारी पर यह ममता का राजनीतिक पैंतरा ही था कि उन्होंने आमजन में संक्रमण के मामलों, ऑक्सीजन संकट, मौतों आदि पर चर्चा शुरू कर दी. अपनी फिजिकल सभाओं को रद्द कर दिया. नरेंद्र मोदी ने भी ऐसा किया, मगर राहुल गांधी और ममता बनर्जी के बाद. ये वो दौर था जब हरिद्वार में कुंभ के धार्मिक आयोजन और चुनावी जलसों को लेकर मोदी सरकार देसी-विदेशी मीडिया के निशाने पर आने लगी. ममता एक-एक कर बीजेपी की हर चाल को मात देती नजर आ रही थीं. इससे पहले उन्होंने हिंदुत्व कार्ड भी खेला. चंडी पाठ, खुद को ब्राह्मण बताने और मंदिरों में पूजा के जरिए हिंदुओं (ज्यादातर सवर्ण) वोट को अपने साथ जोड़े रखा.

ममता की कामयाबी में दिख रहा है कि मुसलमानों के एकतरफा वोट के साथ उन्हें हिंदू मतदाता ने भी उन्हें वोट दिया. भाजपा के लिए ध्रुवीकरण का दांव बंगाल में उल्टा पड़ गया. कमजोर कांग्रेस की मौजूदगी के बीच दूसरे राज्यों में क्षेत्रीय ताकतों से लड़ने का सबक शायद मोदी को बंगाल से मिल रहा होगा.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल से जुड़े हैं.

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