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Updated: 16 सितम्बर, 2018 12:01 PM
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शीत युद्ध के बाद रूस ने अब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास लांच किया है, जिसमें रुसी सेना के लगभग 3 लाख जवान शामिल हो रहे हैं. हाल के दिनों में अमेरिका और यूरोप से बिगड़ते रिश्तों के कारण रूस के इस युद्धाभ्यास को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अमेरिका और यूरोप से रूस के संबंध द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही बिगड़ने शुरू हो गए थे. सोवियत रूस के विघटन के बाद रूस 13 देशों में विभाजित हो गया और अमेरिका ने विश्व शक्ति होने का तमगा हमेशा के लिए रिज़र्व कर लिया. अमेरिका और यूरोप के देशों के साझा सैनिक संगठन नाटो ने भी इस युद्धभ्यास पर अपनी टिप्पणी की है और मॉनिटरिंग की बात कही है. इसमें कोई शक नहीं है कि रूस और चीन के साझा युद्धाभ्यास ने अमेरिका की नींद उड़ा दी है.

रूस, चीन, युद्धाभ्यास, अमेरिका रूस और चीन का युद्धाभ्यास अमेरिका को चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है.

रूस और चीन की बढ़ती नजदीकियां

रूस और चीन परंपरागत दोस्त रहे हैं. 1962 के भारत-चीन युद्ध में रूस ने भारत की सहायता से ये कहते हुए इंकार कर दिया था कि भारत अगर उसका दोस्त है तो चीन उसका भाई है. उसके बाद जैसे-जैसे अमेरिका ने रूस के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर को आगे बढ़ाया चीन और रूस की नजदीकियां बढ़ती चली गईं. 1979 में उसुरी नदी के तट पर चीन और रूस के बीच एक छोटा सा युद्ध भी हुआ जिसमें रूस ने चीन को परमाणु हमले की धमकी तक दे डाली थी. अगर इस घटना को छोड़ दिया जाये तो रूस और चीन के रिश्ते ऐतिहासिक रहे हैं. दोनों देशों में सामंतवाद के खिलाफ आंदोलन हुए और वामपंथी सरकारों का गठन हुआ. 2014 में रूस और चीन के बीच तेल और ऊर्जा के क्षेत्र में 400 अरब डॉलर का ऐतिहासिक समझौता हुआ जिसे ऊर्जा क्षेत्र में हाल के वर्षों में सबसे बड़ा डील माना जाता है.

पिछले कुछ वर्षों में चीन ने रूस में निवेश को बड़े पैमाने पर बढ़ाया है जिसका असर दोनों देशों के रिश्तों पर भी पड़ा है. अमेरिका के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए चीन और रूस ने साझा सामरिक हितों के तहत अपने रिश्तों को गुप्त रूप से आगे बढ़ाया है. 2017 में रूस में चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 72% की बढ़ोतरी दर्ज की गई. दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते दबदबे को लेकर रूस हमेशा खामोश रहा है वहीँ यूक्रेन में रूस के सामरिक हितों का ख्याल चीन ने भी बखूबी रखा है. हाल के वर्षों में रूस ने भारत की चिंताओं को नजरअंदाज करते हुए चीन से अपनी नजदीकी बढ़ाया है.

रूस का मानना है कि अगर भारत अपने हितों के लिए अमेरिका और इजराइल के पास जा सकता है तो रूस चीन और पाकिस्तान के साथ क्यों नहीं. चीन रुसी हथियारों का भी बड़ा खरीदार रहा है. भारत ने हाल ही में रूस के साथ S-400 एंटी मिसाइल डिफेन्स सिस्टम की डील की है, चीन पहले ही इस डील को मूर्त रूप दे चुका है. चीन और अमेरिका के बढ़ते ट्रेड वॉर के बीच रूस और चीन का साझा युद्धाभ्यास अमेरिका को संकेत देने के लिए काफी है जिसका असर विश्व राजनीति पर आने वाले दिनों में दिख सकता है.

रूस और नाटो के बीच में यूक्रेन की दीवार

ऐसे तो रूस और नाटो देशों के बीच संबंध हमेशा नाजुक हालत में ही रहे हैं लेकिन वर्ष 2014 में जिस तरह से यूक्रेन में रूस ने अपने आर्थिक हितों को देखते हुए आक्रमण किया उसने रूस को नाटो देशों के बीच विध्वंसक देश के रूप में खड़ा कर दिया. उसके बाद से रूस और अमेरिका के संबंध बिगड़ते चले गए. रूस की अर्थव्यवस्था अमेरिका के सामने भले कहीं नहीं टिकती तो लेकिन मिलिट्री पावर के मामले में रूस अमेरिका के ऊपर भारी पड़ सकता है. रूस के इस युद्धाभ्यास में 3,00,000 सैनिक, 36,000 सैन्य वाहन, 1,000 विमान और 80 नौसैनिक जहाज हिस्सा ले रहे हैं. इसमें टी-80 और टी-90 टैंक, परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम इस्कंदर मिसाइल, सुखोई-34 और सुखोई-35 जैसे अतिअाधुनिक लड़ाकू विमान भी शामिल हो रहे हैं.

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अमेरिका और चीन के बिगड़ते रिश्ते, रूस और चीन की दोस्ती को और प्रगाढ़ करने का काम करेंगे. जिस तरह अमेरिका चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ गठबंधन बना रहा है उसी तरह चीन भी अमेरिकी मनमानियों का जवाब देने के लिए रूस के साथ अपने रिश्तों को नया आयाम दे रहा है. चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है वही रूस और चीन की सेना का गठबंधन हो जाये तो नाटो देशों की सेनाओं का मुकाबला आसानी से किया जा सकता है. नाटो ने इसे भविष्य की बड़ी लड़ाई की तैयारी बताया है, नाटो का बयान मौजूदा परिवेश में बिलकुल सटीक लगता है. ट्रेड वॉर के बाद युद्ध नहीं होने की कोई गारंटी नहीं है.

कंटेंट- विकास कुमार (इंटर्न- आईचौक)

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