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Updated: 09 दिसम्बर, 2021 12:57 PM
रमेश ठाकुर
रमेश ठाकुर
  @ramesh.thakur.7399
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रूस के साथ हमारे द्विपक्षीय संबंध हमेशा से कसौटी पर खरे उतरे हैं. चाहें रक्षा क्षेत्र में किए करार हो, सामरिक साझेदारियां रही हों, आतंकवाद से लड़ने में सहयोग आदि क्षेत्रों के परिणामोन्मुखी निकले हैं. संबंध अब नए सिरे से और आगे बढ़ने आरंभ हुए, जिनको पुतिन की यात्रा ने पंख लगाए हैं. पुतिन बेशक कुछ ही घंटों के लिए हिंदुस्तान आए, पर खुराफाती देशों के लिए खलबली मचा गए. हिंदुस्तान धीरे-धीरे संप्रभु ताकत बन रहा है, यही वजह है दुनिया अपने आप खिंचती आ रही है. जहां तक दोस्ती की बात है तो सिर्फ रूस-भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया इस बात को अच्छे से जानती है कि दोनों की दोस्ती अन्य मुल्कों के मुकाबले सबसे भरोसेमंद रही है. आगे भी रहेगी, क्योंकि इसकी तस्दीक रूसी राष्टृपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने की है.

पुतिन का करीब डेढ़-दो वर्षां बाद हिंदुस्तान आना हुआ. कुछ समय के लिए ही आए, लेकिन इस दम्यान उन्होंने रिश्तों में जो प्रगाढ़ता बढ़ाई वह काबिलेतारीफ रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनका दिल खोलकर गर्मजोशी से स्वागत-सम्मान किया. वैसे, दोनों नेताओं की दोस्ती तो पहले से प्रचलित है. राजनीतिक रिश्तों के इतर भी दोनों अपने आपसी संबंधों को तवज्जो देते हैं. भारत-रूस के मध्य दोस्ती की निरंतरता यूं ही बनी रहे, इसकी परिकल्पना सभी करते हैं.

India, Russia, Narendra Modi, Prime Minister, President, Vladmitir Putin, Defence, Rajnath Singhभारत रूस संबंधों को एक देश के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जा रहा है

दरअसल, यूपी के अमेठी जिले में राइफल बनाने के लिए खुल रही आयुध फैक्ट्री में रूस की मदद बहुत जरूरी है. एके-203 राइफल बनाने में रूस माहिर है, इस लिहाज से उनका सहयोग अत्यंत जरूरी है.क्योंकि भारत सरकार ने पूर्व में ही रूस से लंबी दूरी के जमीन से आसमान में मारक क्षमता वाली एयर-मिसाइल डिफेंस सिस्टम एम-400 की खरीद के उनसे करार किया हुआ है. पहली खेप मिल भी चुकी है, अगले साल तक और मिल जाएगी.

इस करार से भारत ने अपनी क्षमता का परिचय उन देशों को दिया है, जो खुद को आधुनिक हथियारों में अग्रणी समझते हैं. विशेषकर अमेरिका और चीन. चीन-पाक को रूस के साथ हमारे इस करार ने असहज किया है.गौरतलब है कि विभिन्न तरह की मुसिबतें और समस्याएं आईं, पर भारत-रूस की दोस्ती पर कभी असर नहीं पड़ा, क्योंकि आज से नहीं, बल्कि दशकों से रूस-भारत के द्विपक्षीय संबंध कस़ौटी पर रखरे हुए हैं, जिसे अब रूसी राष्टृपति की यात्रा ने और मजबूती प्रदान की है.

उनकी यात्रा पर चीन-पाकिस्तान की भी नजरें हैं, उनको पता है अगर दोनों देश मजबूती से साथ आ गए तो अफगानिस्तान में खेला हुआ उनका खेल बिगड़ जाएगा. अफगानिस्तान के मौजूदा हालात पर भी दोनों नेताओं के बीच लंबी बातचीत हुई. इस संबंध में रूस-भारत के विदेश मंत्रियों के मध्य हुई टू-प्लस-टू वार्ता में कई मसलों पर मंथन हुआ है जिसका असर आने वाले दिनों में दिखाई भी देगा.

21वें वार्षिक शिखर सम्मेलन में कुछ कूटनीतियों निर्णयों में ऐसा फैसला लिया जाएगा जिससे पाक-चीन की नापाक हरकतें एक्सपोज होंगी. इसमें भारत-रूस के साथ और भी कुछ देश साथ आएंगे. इसके लिए नए सिरे से रणनीति बनाई जा रही है. अमेठी में करीब पांच लाख राइफलों का निर्माण जाएगा, जिससे भारत की रक्षा क्षमता बढेगी, जिसमें हर तरह से सहयोग करने का वादा रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगुए ने भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के समक्ष किया है.

वहीं, विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूसी विदेश मंत्री लावरोव के मध्य एस-400 को लेकर हुई डील भी भारत की रक्षा क्षमता को और बढ़ाएगी. किसी भी मुल्क की सेना के पास अगर एके-203 जैसी लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली राइफलें होंगी, तो उससे दुश्मन मुकाबला करने के लिए सौ बार सोचेगा. करेगा तो सौ फीसदी मुंह की खायेगा. इस बात की भनक दोनों खुराफाती पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान को लग चुकी है.

भारत ने रूस से अधिक सैन्य तकनीकी सहयोग की गुजारिश की है जिसे उन्हें स्वीकार भी किया है. वहीं, भारत इस क्षेत्र में खुद से उन्नत अनुसंधानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है. रूस इस बात को जान रहा है कि भारत अपनी मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और अपने लोगों की अतंनिर्हित क्षमता के साथ तमाम चुनौतियों पर काबू पाकर निरंतर आगे बढ़ रहा है.

पुतिन का दौरा पहले भी होता रहा है. पर, पहले के मुकाबले पुतिन ने इस बार बदलते भारत की नई तस्वीर को देखा है. उन्हें इच्छाशक्ति और आत्मनिभर्रता का मजबूत गठजोड़ दिखाई दिया. एक वक्त था जब दूसरे देशों के साथ सैन्य समझौतों में भारत हिचकता था, अविश्वास की कमी दिखती थी. वह इसलिए भारत के साथ कई मर्तबा धोखे भी हुए, जो करार हुआ उसका पालन नहीं किया गया.

हथियारों की समय से खेप नहीं मिली. यहां उन देशों का नाम लेना उचित नहीं जिन्होंने भारत के साथ छल किया था. खैर, बीते दौर की बातों को भुलाकर भारत आगे बढ़ा है और वह भी मजबूती के साथ. उन्हें अब विश्वसनीय नेताओं और देशों का सहयोग मिला है. एक जमाना वो भी था जब अमेरिका का सिंकजा हुआ करता था.

कोई भी देश जब किसी मुल्क से सैन्य करार करता था, तो वह अडंगा अड़ाता था. जो वो चाहता था, वैसा होता था. लेकिन अब वक्त बदल चुका है. सभी मुल्क स्वतंत्र हैं, कुछ भी करने को. अमेरिका कभी नहीं चाहता था सैन्य ताकत में उनसे आगे कोई दूसरा देश निकले, लेकिन अब निकलने को आगे बढ़ चुके हैं. यही अमेरिका की सबसे बड़ी हार है.

रूस-भारत जिस बेखौफियत से सैन्य करार को लेकर आगे बढ़े हैं, वह काबिलेगौर हैं. भारत, रूस एकाध और मुल्क हैं जो निकट भविष्य में अमेरिका का डटकर मुकाबला करेंगे, लेकिन उससे पहले चुगली और खुजली करने वाले चीन-पाक से निपटना होगा. ये ऐसे देश हैं जो प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं करते, लेकिन दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर वार करते हैं.

ये अब तालिबानियों को बेजा इस्तेमाल करने में लगे हैं. उनकी सरकार को मान्यता देने के पीछे ऐसे ही कुछ राज छिपे हैं. पीछे रहकर दूसरों से लड़ाना चाहते हैं. लेकिन उनकी नापाक हरकतों से भारत-रूस जैसे देश वाकिफ हैं. भारत-रूस के बीच होते सैन्य समझौते इन्हीं नापाक हरकतों को कुचलने के लिए हैं. सैन्य, सामरिक, व्यापारिक, शिक्षा, शांति आदि क्षेत्रों में जिस तरह से दोनों देश आगे बढ़ते दिख रहे हैं, उससे कईयों को परेशानियां होंगी.

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