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Updated: 12 सितम्बर, 2021 03:41 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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ऊपर से तो ऐसा ही लगता है जैसे तीन घंटे में ही सारा खेल हो गया - जब दुनिया भर में अमेरिका के 9/11 की बीसवीं बरसी को याद किया जा रहा था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 बजे वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अहमदाबाद में सरदार धाम भवन का उद्घाटन कर रहे थे. घंटा भर चले कार्यक्रम में विजय रूपानी भी शामिल थे, लेकिन जैसे ही तीन बजा वो भी मोदी-शाह की तरह ही सरप्राइज दे बैठे - राज्यपाल आचार्य देवव्रत को इस्तीफा सौंपने के साथ ही सार्वजनिक घोषणा भी कर दी.

विजय रूपानी (Vijay Rupani) बीजेपी शासित राज्यों से तीन महीने के भीतर इस्तीफा सौंपने वाले चौथे मुख्यमंत्री बन गये हैं - जिनमें दो त्रिवेंद्र सिंह रावत और तीरथ सिंह रावत को उत्तराखंड से ही हैं और एक कर्नाटक से बीएस येदियुरप्पा. कर्नाटक में नये निजाम बासवराज बोम्मई बने हैं और उत्तराखंड की कमान बीजेपी की तरफ से पुष्कर सिंह धामी को सौंपी गयी है.

जब बीजेपी नेतृत्व उत्तराखंड में कुछ ही महीनों के अंतराल पर दो-दो मुख्यमंत्री बदल सकता है, फिर तो बाकी राज्यों में एक सीएम बदला जाना तो जरूरी ही लगता है.

जरा सोचिये जयराम ठाकुर की हालत क्या हो रही होगी? हिमाचल प्रदेश में भी तो गुजरात के साथ ही 2022 के आखिर में ही चुनाव होने वाले हैं. अगर यूपी के साथ ही गुजरात में भी विधानसभा चुनाव कराये जाने की चर्चाओं को नजरअंदाज करें तो भी.

आज खुश तो योगी आदित्यनाथ बहुत हो रहे होंगे - अगर योगी आदित्यनाथ का अपना जनाधार नहीं होता. अगर योगी आदित्यनाथ के पास हिंदू युवा वाहिनी जैसा संगठन नहीं होता. अगर योगी आदित्यनाथ गोरक्षपीठ के महंत न होते. अगर योगी आदित्यनाथ गोरखपुर मंदिर के रास्ते राजनीति में नहीं आये होते - तो उत्तराखंड जैसा ही यूपी में भी नेतृत्व परिवर्तन हो चुका होता.

त्रिपुरा में तो बिप्लब देब के सिर पर पहले से ही तलवार लटक रही है. बीजेपी नेतृत्व अंदर ही अंदर जांच-पड़ताल और फीडबैक ले रहा है. जिस तरीके से ममता बनर्जी की पार्टी त्रिपुरा में एक्टिव है और जैसे प्रशांत किशोर की टीम के साथ बिप्लब देब के अफसर पेश आ रहे हैं, बवाल तो वैसे ही हो रहा है जैसे विवाद के चलते रविशंकर प्रसाद की मंत्री पद से छुट्टी हो गयी. नेतृत्व क्षमता के आकलन का आधार ये भी होता है कि कैसे कोई किसी मामले को हैंडल करता है.

अब 2022 के बारह महीने शिवराज सिंह चौहान शांति से गुजार लें तो किस्मतवाले ही माने जाएंगे - और हिसाब नहीं बैठ पाया वरना, नीतीश कुमार तो कब के ठिकाने लग चुके होते.

विजय रूपानी के इस्तीफे की खबर जान कर तो पहली नजर में ऐसा ही लगा - जैसे आये थे, गये भी वैसे ही - चुनावों से कुछ ही महीने पहले. अभी पिछले ही महीने तो विजय रूपानी को गुजरात के मुख्यमंत्री बने पूरे पांच साल हुए थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उत्तराधिकारी आनंदी बेन पटेल (Anandi Ben Patel) को भी ऐसे ही चुनावों से पहले हटा दिये जाने के बाद 7 अगस्त 2016 को विजय रूपानी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे. आनंदी बेन पटेल फिलहाल यूपी की राज्यपाल हैं जहां बीजेपी अगले साल की शुरुआत में विधानसभा के चुनावों (Assembly Election 2022) की तैयारी में जुटी हुई है.

ठीक 5 साल पहले...

ठीक पांच साल पहले गुजरात में भी कुछ कुछ वैसा ही हुआ था जैसा नजारा 2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी के चुनाव जीत जाने के बाद देखने को मिला था. गुजरात में जो नितिन पटेल के साथ हुआ था, वैसा ही आगे चल कर उत्तर प्रदेश में मनोज सिन्हा के साथ हुआ. नितिन पटेल गुजरात के डिप्टी सीएम हैं और मनोज सिन्हा जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गरवर्नर.

vijay rupani, anandi ben patelठीक पांच साल बाद विजय रूपानी के साथ भी वैसा ही व्यवहार हुआ है जैसा 2016 में आनंदीबेन पटेल के साथ हुआ था.

अगस्त, 2016 में आनंदी बेन पटेल के इस्तीफा देते ही नितिन पटेल को बधाइयां मिलने लगी थीं - और वो खुशी खुशी स्वीकार भी करने लगे थे. तभी अचानक जैसे कालांतर में मनोज सिन्हा को मालूम पड़ा कि वो नहीं बल्कि योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनने वाले हैं, नितिन पटेल को भी बता दिया गया कि वो नहीं विजय रूपानी ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेंगे.

2014 में आम चुनाव के नतीजे आने के बाद जब साफ हो गया कि नरेंद्र मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे तभी से गुजरात में उनके उत्तराधिकारी दावेदारों में होड़ शुरू हो गयी थी. मोदी के लिए यूपी में रह कर दिल्ली के रास्ते को सियासी तौर पर ग्रीन कॉरिडोर बनाने के बाद गुजरात के सीएम की कुर्सी पर नजर तो अमित शाह की भी टिकी थी - अगर अपने लिए न सही तो किसी अपने के लिए.

लेकिन प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने अमित शाह के लिए कुछ और ही सोच रखा था. साथ ही, वो शिद्दत से पाले पोसे अपने गुजरात मॉडल को भी किन्हीं बहुत ही सुरक्षित हाथों में सौंपना चाहते थे - जब नजर दौड़ायी तो डूब रही अपनी छात्रों के लिए पानी में सीधे छलांग लगा देने वाली आनंदी बेन पटेल का ही चेहरा बार बार सामने आ रहा था. मोदी को पक्का यकीन हो गया कि आनंदी बेन से बेहतर गुजरात मॉडल की देखभाल और ख्याल कोई और नहीं रख सकता. फिर मोदी ने आनंदी बेन को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया.

अमित शाह को ये सब फूटी आंख भी कहां सुहाने वाला था. वो तो भला हो हार्दिक पटेल का जो पाटीदारों को आरक्षण दिलाने के लिए ऐसा आंदोलन किये कि आनंदी बेन पटेल की नेतृत्व क्षमता पर उंगलियां उठने लगीं और आखिरकार कुर्सी लेकर ही दम लिये. एक चर्चा तो ये भी रही है कि हार्दिक पटेल के आंदोलन को हवा देने वाले भी वही लोग रहे जो अमित शाह के मन की बात भांप लेते थे.

पाटीदारों के प्रभाव के चलते कुर्सी गंवाने के बाद भी आनंदी बेन पटेल चाहती थीं कि उनके बाद मोदी की विरासत नितिन पटेल संभालें. ऐसा हो जाये, इसके लिए पैरवी भी कीं, लेकिन कहां अमित शाह और कहां आनंदी बेन पटेल. आनंदी बेन पटेल को दोबारा हथियार डालने पड़े.

ये भी तभी खबर आयी थी कि अमित शाह ने विजय रूपानी को गुजरात चुनाव में बीजेपी की सत्ता में वापसी करा पाने के काबिल बताया था - और खुद उनकी गारंटी ली थी तब जाकर ही मोदी की मंजूरी मिल सकी.

जब चुनाव काल आया तो मोदी को भी मालूम हो गया कि अमित शाह ने तो जो गारंटी ली थी, वो उनके नाम पर ही रही. जब कांग्रेस का 'विकास गांडो थायो छे' बीजेपी पर कहर बन कर टूट पड़ा तो अमित शाह ने खुद तो डेरा डाला ही, मोर्चे पर मोदी को भी उतार दिया - 'हूं छूं गुजरात, हूं छू विकास'. गुजरात गौरव यात्रा के समापन पर प्रधानमंत्री मोदी के मुंह से ये निकलते ही पूरा माहौल बदल गया. कांग्रेस को अपना कैंपेन वापस लेने को मजबूर होना पड़ा.

फिर भी विजय रूपानी के नेतृत्व में कांग्रेस गुजरात में सीटों की संख्या 100 का आंकड़ा नहीं ही छू पायी. राहुल गांधी के साथ हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और कल्पेश ठाकोर की तिकड़ी ने पहले ही बीजेपी को भरपूर डैमेज कर रखा था.

और अब तो बीजेपी नेतृत्व को लग भी नहीं रहा था कि विजय रूपानी गुजरात में सत्ता में वापसी करा पाएंगे - क्योंकि वो जातीय समीकरणों में तो मिसफिट रहे ही, नीतीश कुमार जैसी कोई अलग छवि भी नहीं बना पाये. कोरोना काल में तो जो हुआ वो बताने की जरूरत है नहीं.

तभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब तूफान प्रभावित गुजरात के दौरे पर गये थे तो वहां वाराणसी मॉडल का जोर देकर जिक्र कर रहे थे. प्रधानमंत्री मोदी ने अहमदाबाद में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी, उनके मंत्रियों और सीनियर अफसरों से तूफान और कोरोना को लेकर मीटिंग - और उसी दौरान बताया कि वाराणसी मॉडल कोरोना से निबटने में कितना सक्षम है और उससे सीखने की जरूरत है. उसके ठीक बाद जब प्रधानमंत्री मोदी बनारस के फ्रंट वर्कर्स से संवाद कर रहे थे तो अचानक इमोशनल भी हो गये थे - ये कहते हुए कि कोरोना संकट में हमने बहुत सारे अपनों को खोया.

मालूम नहीं विजय रूपानी समझ पाये या नहीं, लेकिन वाराणसी मॉडल से सीखने की सलाह नहीं बल्कि मोदी ने येलो कार्ड दिखाया था - क्योंकि आगे अमित शाह ने सिग्नल रेड कर रखा था.

बाकी सब तो निमित्त मात्र हैं

विजय रूपानी ने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपने के बाद मीडिया के सामने आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गुजरात के लोगों के प्रति सेवा का मौका देने के लिए आभार जताया और अपने सरकार की तमाम उपलब्धियां भी गिनाते गये.

तभी मीडिया की तरफ से सवाल उठा कि जब सब कुछ अच्छे से चल ही रहा था तो इस्तीफा देने की नौबत क्यों आ गयी?

बाकी बातें तो लिख कर पढ़े जा रहे थे, लेकिन विजय रूपानी ने ये जवाब यूं ही दिया. हालांकि, वो भी लिखा जैसा ही लगा, 'हमारी पार्टी में ये स्वाभाविक प्रक्रिया है... कार्यकर्ताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी दी जाती है... हम इसे पद नहीं, जिम्मेदारी मानते हैं... मुझे पांच साल मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई - अब पार्टी जो जिम्मेदारी देगी, वो मैं करूंगा.'

फिर मीडिया की ये जानने की कोशिश रही कि अगला विजय रूपानी कौन होगा? मतलब, गुजरात का अगला चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा जाएगा?

विजय रूपानी ने लिख कर रखा तो ये भी नहीं था, लेकिन रेडीमेड जवाब उनके पास पहले से था, 'हम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चुनाव लड़ते हैं. नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी हर राज्य में चुनाव लड़ती है. इस बार भी हमारे पास मज़बूत नेतृत्व है, उनके नेतृत्व में हम चुनाव लड़ेंगे.'

सही बोल रहे हैं. हाल फिलहाल बीजेपी तो सारे ही चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ही लड़ती है - बाकी लोग तो निमित्त मात्र ही होते हैं. देखा जाये तो जैसे विजय रूपानी के नाम पर अमित शाह की ही तरह यूपी में योगी आदित्यनाथ ने जो ठेका अपने नाम पर ले रखा है, ऐन मौके पर पूरा दारोमदार मोदी के ही मत्थे आने वाला है!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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