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Updated: 25 जून, 2022 04:50 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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शरद पवार (Sharad Pawar) से मुलाकात के बाद उद्धव ठाकरे का मनोबल बढ़ा है - और अब साफ कर दिया गया है कि शिवसेना तो फिर से बीजेपी के साथ जाने से रही. पहले संजय राउत ने शिवसेना की तरफ से कहा था कि अगर बागी शिवसेना विधायक लौट कर बात करें तो MVA छोड़ने पर भी विचार किया जा सकता है या फिर बीजेपी के साथ जाने पर भी सोचा जा सकता है, जैसा कि एकनाथ शिंदे और साथियों की डिमांड है.

उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) ने भी बागी बन चुके शिवसेना विधायकों से बड़ी ही भावनात्मक अपील की थी. शिवसेना सांसद संजय राउत ने अपने नेता की बातों को थोड़ी चाशनी लगा कर भी पेश किया था, लेकिन अब नये फ्लेवर के साथ सामने आये हैं. बल्कि, तड़का मार कर.

शिवसेना नेता संजय राउत का दावा है कि महाविकास आघाड़ी सरकार को कोई खतरा नहीं है. लगे हाथ ये भी दावा किया गया है कि असम के गुवाहाटी में मौजूद कई बागी विधायक महाविकास अघाड़ी के साथ खड़े हैं.

संजय राउत के मुताबिक, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के घर 'मातोश्री' पर एनसीपी चीफ शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल और डिप्टी सीएम अजित पवार की बैठक के दौरान करीब 10 विधायकों से बातचीत हुई - और सरकार के समर्थन में होने की हामी भर रहे हैं.

और जब संजय राउत ऐसी बातें बताते हैं तो जोश से भरपूर नजर आते हैं. उनकी बातों में असर भी दिखता है, 'मैं विधायकों से कहना चाहता हूं कि वे अपनी विधायकी बचायें... सरकार को कोई खतरा नहीं है.' संजय राउत आगे बढ़कर ये भी समझाने लगते हैं कि मौजूदा राजनीतिक हालात को वो संकट नहीं मानते, बल्कि शिवसेना के विस्तार के लिए मिला मौका बताते हैं. ऊपर से सरेआम धमकी भी दे डालते हैं, 'लोग अभी संयम से काम ले रहे हैं... उनका गुस्सा अभी तक भड़का नहीं है, लेकिन अगर लोग भड़क गये तो आग लग जाएगी.'

बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बारे में पूछे जाने पर कहते हैं, 'देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) को सलाह दूंगा आप इस झमेले में न पड़ें... आप फंस जाओगे... फिर से पुरानी वाली बात हो जाएगी... कोई सुबह आपके साथ था और शाम को किसी और के साथ.' दरअसल, संजय राउत अपनी तरफ से देवेंद्र फडणवीस को 72 घंटे के मुख्यमंत्री बनने का वाकया याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं.

'हम अगले चुनाव में देख लेंगे' - यही वो आत्मविश्वास है जो शिवसेना नेतृत्व को शरद पवार से मुलाकात के बाद मिला है. वरना, ऐसे बताया जा रहा था कि उद्धव ठाकरे सब कुछ छोड़ कर झोला उठा कर चल ही देंगे.

अब सवाल ये है कि कांग्रेस-एनसीपी के साथ उद्धव ठाकरे के बने रहने से क्या होगा? पहली बात तो ये कि लाख तकरार के बावजूद उद्धव ठाकरे जिस लाइन की राजनीति कर रहे हैं उसे वो मन से पसंद करते हैं. ये ठीक है कि उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व पर बीजेपी धावा बोल चुकी है, लेकिन अब तक शिवसेना को जिस रास्ते पर चलाते आ रहे हैं - उद्धव ठाकरे को यही सूट करता है.

अगर मौजूदा समीकरणों पर ही चलते रहे

ये तो MVA सरकार की ही देन है कि कांग्रेस महाराष्ट्र में भी बची हुई है, लेकन उसकी भूमिका तो निमित्त मात्र ही है. असल में तो शिवसेना को आगे करके शरद पवार गठबंधन की राजनीति कर रहे हैं - और ये पवार का रिमोट कंट्रोल ही है जिससे ऐसी मुश्किल घड़ी में भी उद्धव ठाकरे को ताकत और लड़ने की ऊर्जा मिल रही है.

uddhav thackeray, sharad pawarअभी तो उद्धव ठाकरे को यही लग रहा होगा कि अच्छा किया शरद पवार से रिमोट कंट्रोल वापस नहीं लिया था!

1. उद्धव ठाकरे के लिए गठबंधन की सरकार बचाने से ज्यादा जरूरी शिवसेना की कमान अपने हाथ में रखने की हर संभव कोशिश करना. इमोशनल अपील एक रणनीति तक ही सीमित रहे तो ज्यादा अच्छा है.

2. उद्धव ठाकरे के लिए जरूरी है कि किसी भी सूरत में शिवसेना का सिंबल अपने पास बनाये रखने का प्रयास करें. शिवसेना की प्रतिनिधि सभा की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.

बेहतर होगा वो अपने काडर को जितना हो सके साथ रखने की कोशिश करें - और लोगों के बीच अगर सेहत ठीक न होने की वजह से खुद जाना मुमकिन न हो रहा हो तो आदित्य ठाकरे को भेजें, लेकिन हर हाल में लोगों से कनेक्ट रहें .

महाराष्ट्र के शिवसेना समर्थकों को समझायें कि जिस हिंदुत्व की राजनीति वो कर रहे हैं उसका लोगों के लिए क्या फायदा है? हर तरीके से ये भी बतायें कि कोविड संकट के दौरान कैसे वो बीमार होने के बावजूद महाराष्ट्र के लोगों के प्रति अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं रखे थे. महाराष्ट्र में, खासकर मुंबई में कोरोना संकट का लगातार विकराल रूप देखा गया था.

3. बेहतर होगा सार्वजनिक तौर पर उद्धव ठाकरे ये चर्चा बंद कर दें कि किसके लिए क्या किया. किसे अपने हिस्से का विभाग दे दिया. मतलब, लोग ये न समझें की सरकार में मलाईदार कहे जाने वाले मंत्रालयों का बंटवारा सबकी मिलीभगत से होता रहा - और वो अपने साथियों को ऐश करने की छूट दे रहे थे. ऐसी बातें करने की भी कतई जरूरत नहीं है कि एकनाथ शिंदे का बेटा सांसद है तो उनका अपना बेटा विधायक या मंत्री क्यों नहीं हो सकता?

4. अच्छा तो ये होगा कि आदित्य ठाकरे को शिवसेना की कमान सौंप दें ताकि वो युवा पीढ़ी को साथ जोड़ सकें - ऐसा करने से शिवसेना के ज्यादा उम्र के विधायकों के लिए अपनी राजनीतिक जमीन बचाये रखने को लेकर चैलेंज किया जा सकता है.

5. अभी उद्धव ठाकरे को शिवसेना पर ही फोकस करना चाहिये. अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देनी चाहिये. अभी जो कुछ भी हो रहा है, वे अस्थायी चीजें हैं - जौहर दिखाने का मौका चुनावी मैदान में ही मिलता है.

6. शिवसेना की नयी टीम बनाने का ये बेहतरीन मौका है. अभी से विधानसभा स्तर पर प्रभारी नियुक्त कर देने का बहुत फायदा मिलेगा. हर इलाके में कम से कम दो नेताओं का चयन करना चाहिये - पहला प्लान A के तहत हो और दूसरा प्लान B के लिए.

7. हर हाल में साफ सुथरी छवि के नेताओं को चुना जाना चाहिये. ऐसे नेता जिनको किसी भी जांच एजेंसी के लिए टारगेट करना मुश्किल हो सके. हालांकि, फिर भी तैयार रहना होगा किसी भी नये चैलेंज के लिए.

8. आने वाले चुनाव में शिवसेना को बिलकुल फ्रेश चेहरों पर फोकस करना चाहिये - और फिर शिवसेना का टिकट देकर मैदान में उतार देने की तैयारी अभी से करनी चाहिये. अपनी सरकार के काम के साथ मैदान में उतरें - और लोगों पर छोड़ दें कि वे क्या चुनते हैं? याद रखें महाराष्ट्र चुनावों में भी बीजेपी हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे के साथ ही उतरी थी, नुकसान भी उठाना पड़ा. बाद में हुए झारखंड और दिल्ली विधानसभा चुनावों के नतीजे भी वही कहानी सुना रहे थे.

9. उद्धव ठाकरे चाहें तो अरविंद केजरीवाल की तरह लोगों के पास ऑप्शन छोड़ सकते हैं - जैसे 'अगर आतंकवादी मानते हो तो जाकर बीजेपी को वोट दे देना'. यानी अगर शिवसेना का वोटर बागी नेताओं के साथ खड़ा होता है तो साफ है वो बीजेपी को तरजीह दे रहा है. ये बात बार बार लोगों को समझानी होगी. तभी बात बनेगी.

10. उद्धव ठाकरे चाहें तो प्रशांत किशोर जैसे एक्सपर्ट की फिर से मदद ले सकते हैं. वैसे भी प्रशांत किशोर की टीम ने आदित्य ठाकरे का चुनाव कैंपेन हैंडल तो किया ही था - और बीजेपी के खिलाफ उद्धव ठाकरे के डटे रहने में भी प्रशांत किशोर की महत्वपूर्ण भूमिका समझी गयी थी.

बीजेपी के साथ गये तो नीतीश का हाल हो जाएगा

उद्धव ठाकरे अगर फिर से बीजेपी के साथ लौटने का फैसला करते तो उनके साथ यूज-एंड-थ्रो व्यवहार ही होता - और धीरे धीरे बीजेपी अपने स्तर पर महाराष्ट्र की राजनीति पर काबिज होने की कोशिश करती. उद्धव ठाकरे ने मन बदल लिया है, उसका रिजल्ट भी मिलेगा ही.

नीतीश कुमार की जेडीयू, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और मायावती की बीएसपी - ऐसे सभी राजनीतिक दलों के साथ बीजेपी का व्यवहार बराबर ही रहा है. 2020 के बिहार चुनाव में जहां नीतीश कुमार पर नकेल टाइट कर दी और चिराग पासवान को पूरी तरह पैदल कर दिया, 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीएसपी का पूरा फायदा उठाने के बाद मायावती को एक विधायक वाला नेता बना कर रख दिया.

बारी बारी सारे बर्बाद हो गये: एन. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और बादल परिवार का अकाली दल भी तो कहीं के नहीं रह गये हैं - ऐसा लगता है जैसे अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हों. बीजेपी के साथ दोनों ही दलों ने सत्ता का पूरा सुख लिया, लेकिन साथ छूटने के बाद वे किसी लायक नहीं बचे.

और अब वैसा ही संघर्ष शिवसेना को भी करना पड़ रहा है. ढाई साल पहले तक शिवसेना और बीजेपी के बीच गठबंधन रहा. बीच में थोड़े समय के लिए अलग होने को छोड़ दें तो कम से कम ढाई दशक का साथ रहा, लेकिन अब तो कांग्रेस की तरफ बीजेपी शिवसेना मुक्त महाराष्ट्र अभियान चला रही है. थोड़ा बच बचाके जरूर कह सकते हैं.

एनडीए के ट्रैक रिकॉर्ड को देखा जाये तो बीजेपी का कोई भी गठबंधन पार्टनर साथ में रह कर फलता फूलता नहीं लगता. अगर वक्त जैसे तैसे गुजरता जा रहा है तो बात अलग है. अभी तो बीजेपी किसी तरह जेडीयू के साथ रिश्ता निभा रही है, लेकिन ऐसे मौके की तलाश जरूर है जब जेडीयू को नेस्तनाबूद किया जा सके - और नीतीश कुमार का पत्ता साफ.

अब तक तो बीजेपी की राजनीति ऐसी ही दिशा में बढ़ती देखी गयी है, जिसमें वो दोस्तों और दुश्मनों में कोई खास फर्क नहीं समझती. जैसे दोस्त, वैसे दुश्मन. जैसे कांग्रेस के पीछे पड़ी रही, जेडीयू के मामले में भी कोई अलग रवैया तो नहीं दिखा. भला कौन सी पार्टी होगी कि एक राज्य में सहयोगी पार्टी को चुनाव जिता कर सरकार बनवा दे और दूसरे राज्य में उसके विधायकों को हड़प ले. बिहार की सत्ता में वापसी नीतीश कुमार के लिए मुश्किल लेकिन बीजेपी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे करके सारी चीजें दुरूस्त कर दी - और नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने का वादा भी पूरा किया, लेकिन तभी अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू के 6 विधायकों को भगवा भी पहना डाला.

चिराग पासवान तो बीजेपी के सबसे बड़े शिकार हुए. रामविलास पासवान के जाते ही चिराग पासवान का जितना संभव था इस्तेमाल किया गया और फिर छोड़ दिया गया. आज चिराग पासवान को ये नहीं समझ में आ रहा होगा कि पार्टी बचाने की बात तो दूर अगले चुनाव में संसद भी पहुंच पाएंगे या नहीं?

लड़ना है, या डरना है? बीजेपी की तो 2019 के महाराष्ट्र चुनाव में ही शिवसेना को समेटने की कोशिश रही होगी, लेकिन उद्धव ठाकरे ने पाला बदल लिया और बीजेपी मन मसोस कर रह गयी. वैसे तो उद्धव ठाकरे बीजेपी से ढाई साल ही मांग रहे थे - उतने समय बीजेपी के हाथ कुछ लगा भी नहीं. बीजेपी पर लगने वाले आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन सच तो यही है कि महाराष्ट्र में सब कुछ फिलहाल बीजेपी के मनमाफिक हो रहा है.

ये तो अच्छा है कि उद्धव ठाकरे ने साफ साफ बोल दिया है कि वो तो बीजेपी के साथ जाने से रहे, लेकिन अगर पहले वाले स्टैंड पर कायम रहते हुए यू-टर्न ले भी लेते तो बीजेपी शिवसेना का वही हाल करती जो अपने दोस्तों और दुश्मनों का करती है.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों की एक बैठक बुलायी थी, जिसमें ममता बनर्जी से उद्धव ठाकरे का सवाल था, 'दीदी... डरना है या लड़ना है?' लगता है शरद पवार ने भी मुलाकात के दौरान ऐसा ही सवाल किया होगा - अब तो उद्धव ठाकरे ने अपना जवाब सबको बता दिया है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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