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Updated: 14 जून, 2022 01:15 PM
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उद्धव ठाकरे 15 जून को अयोध्या (Uddhav Thackeray Ayodhya Visit) के दौरे पर जा रहे हैं - और ममता बनर्जी की मीटिंग में न जा पाने की वजह भी यही बतायी है. असल में ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष का उम्मीदवार तय करने के लिए विपक्षी दलों के नेताओं की मीटिंग बुलायी, लेकिन उद्धव ठाकरे के पास ये कहने को है कि उनका कार्यक्रम पहले से बना हुआ था - और ममता बनर्जी ने तो अभी अभी चिट्ठी लिखी है, वो भी सोनिया गांधी के एक्टिव होने के बाद.

उद्धव ठाकरे के साथ उनके बेटे और कैबिनेट साथी आदित्य ठाकरे भी होंगे - और शिवसेना सांसद संजय राउत हफ्ता भर पहले ही अयोध्या जाकर सारे इंतजाम भी कर चुके हैं. ऐसे पोस्टर भी लगवा चुके हैं जिसमें राज ठाकरे को टारगेट किया गया है.

बीजेपी (BJP) से गठबंधन तोड़ने के बाद भी उद्धव ठाकरे अयोध्या जाते रहे हैं. अपनी गठबंधन सरकार के 100 दिन का जश्न मनाने भी वो अयोध्या ही गये थे - दरअसल, बीजेपी के नयी शिवसेना के हिंदुत्व पर सवाल उठाये जाने का जवाब भी तो अयोध्या में ही मिलता है.

हाल फिलहाल तो उद्धव ठाकरे के हिंदुत्व पर हनुमान चालीस से लेकर लाउडस्पीकर तक के जरिये सवाल उठाने की कोशिश की गयी है, लेकिन राज्य सभा चुनाव में बीजेपी के हाथों एक सीट गंवा देने के बाद उद्धव ठाकरे की अयोध्या यात्रा और भी महत्वपूर्ण लगती है. वैसे भी एनसीपी सांसद का शिवसेना उम्मीदवार की हार को 'शर्मनाक' बताया जाना कोई मामूली बात नहीं लगती - क्योंकि महाराष्ट्र सरकार के किसी भी गठबंधन साथी के खिलाफ वो ऐसा बयान क्यों देंगी. और अपने मन से तो ये सब तो वो कहने से रहीं. ये तो सुप्रिया सुले के अपने पिता शरद पवार की भावनाएं प्रकट करने का एक तरीका ही लगता है.

ऊपर से राज ठाकरे (Raj Thackeray) का दौरा रद्द हो जाने के बाद भी उद्धव ठाकरे का अयोध्या जाना अलग से भी महत्वपूर्ण तो हो ही जाता है, लेकिन राज ठाकरे की तरह उद्धव ठाकरे की अयोध्या यात्रा का बीजेपी की तरफ से किसी तरह का विरोध न किया जाना कुछ राजनीतिक इशारे तो करता ही है!

उद्धव ठाकरे का निर्विरोध अयोध्या दौरा!

उद्धव ठाकरे बड़े आराम से अयोध्या जा रहे हैं. डंके की चोट जैसे भी कह सकते हैं. राज ठाकरे को अपना दौरा रद्द करना पड़ा था - और पुणे की भीड़ भरी रैली में ये बोल कर कि ऐसा मजबूरी में करना पड़ रहा है, 'मुझे इस जाल में नहीं फंसना.'

uddhav thackeray, aditya thackeray, raj thackerayक्या उद्धव ठाकरे को लेकर बीजेपी का हृदय परिवर्तन होने लगा है - और राज ठाकरे से हाथ पीछे खींच लिया है?

ढाई दशक की गठबंधन वाली गाढ़ी दोस्ती तोड़ने के बाद ढाई साल से बीजेपी की तरफ से उद्धव ठाकरे को घेरने की कोशिश चल रही है - और बार बार पलटवार में उद्धव ठाकरे बीजेपी नेतृत्व को ललकारते रहते हैं. हाल की औरंगाबाद की रैली में भी वैसा ही तेवर देखने को मिला था.

नुपुर शर्मा प्रकरण ने तो वैसे भी बीजेपी के हर विरोधी को अब तक का सबसे बड़ा मुद्दा दे दिया है. अगर नुपुर शर्मा को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 'फ्रिंज एलिमेंट' नहीं बताया गया होता तो शायद ये हाल न होता.

क्या बीजेपी हिंदुत्व को लेकर अभी बैकफुट पर है इसलिए उद्धव ठाकरे की राजनीति पर सवाल नहीं उठाया जा रहा है?

उद्धव ठाकरे का बीजेपी के साथ छत्तीस का आंकड़ा है, लेकिन बीजेपी के ही नेता राज ठाकरे को अयोध्या में घुसने न देने की धमकी देते हैं और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के फायरब्रांड नेता को मजबूरी और साजिश की आशंका जताते हुए पीछे हट जाने की घोषणा करनी पड़ती है.

और तभी उद्धव ठाकरे की अयोध्या दौरे की तैयारियों को फाइनल करने संजय राउत अयोध्या पहुंचते हैं - और तभी पूछ लिया जाता है, बृजभूषण शरण सिंह से डील हो गयी क्या?

आखिर बृजभूषण शरण सिंह जब राज ठाकरे का उत्तर भारतीयों के नाम पर विरोध कर सकते हैं, तो उद्धव ठाकरे के सियासी दुश्मन बन जाने के बाद खामोश क्यों हो जाते हैं? हो सकता है बृजभूषण शरण सिंह अपने मन से राज ठाकरे का विरोध किया हो, लेकिन कोई रोकता भी तो नहीं. बीजेपी सांसद एक बार नहीं बल्कि कई बार राज ठाकरे को माफी मांगने से पहले अयोध्या में न घुसने देने की बात करते हैं - और यहां तक कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी सलाह दे डालते हैं कि माफी मांगने से पहले वो राज ठाकरे के आने पर उनसे न मिलें.

योगी आदित्यनाथ की परवाह न सही, लेकिन क्या बृजभूषण शरण सिंह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ग्रीन सिग्नल के बगैर ये सब किये होंगे? ये हजम होने वाली बात तो कहीं से भी नहीं लगती है.

डील की बात सुनते ही संजय राउत भड़क जाते हैं - 'क्या डील हो सकती है?'

फिर कहते हैं, 'उस दौर में राज ठाकरे के कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र में निश्चित ही उत्तर भारतीयों का अपमान किया था... बृजभूषण शरण सिंह किसी के दबाव में नहीं आने वाले हैं? उनका अपना नेतृत्व है... वो बड़े नेता हैं.'

राज ठाकरे की खामोशी को कैसे समझें

लाउडस्पीकर की कौन कहे, राज ठाकरे के कार्यकर्ताओं की तो अब कानाफूसी भी कहीं नहीं सुनायी दे रही है - और ये 22 मई के बाद से ही देखा जा रहा है. एमएनएस कार्यकर्ता राज ठाकरे के अयोध्या दौरे की काफी पहले से तैयारी कर रहे थे. जगह जगह पोस्टर भी लगाये गये थे - 'आ रहे हैं भगवाधारी...' पोस्टर पर शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे वाले अंदाज में राज ठाकरे के फोटो लगाये गये, लेकिन पुणे की रैली में खुद राज ठाकरे ने अपना अयोध्या दौरा रद्द कर देने की घोषणा कर दी.

राज ठाकरे ने समर्थकों को बताया, 'मैं उस स्थान पर जाकर भी दर्शन करना चाहता था जहां कारसेवकों को मारा गया था.'

एमएनएस के पोस्टर के जवाब में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने अयोध्या में जो पोस्टर लगाये उस पर लिख डाला - 'असली आ रहा है, नकली से सावधान.' उद्धव ठाकरे ने भी लोगों को यही समझाने की कोशिश की कि सज और संवर जाने से कोई भी बालासाहेब ठाकरे नहीं बन जाता.

रैली में भी राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को टारगेट किया था, 'ये कैसे बचकाना व्यवहार है कि मेरा हिंदुत्व असली है और तुम्हारा नकली… ये तो ऐसा बोलने जैसा है कि तुम्हारी कमीज हमारी कमीज से सफेद कैसे? क्या हिंदुत्व कोई वाशिंग पाउडर है? हिंदुओं को नतीजे चाहिये - और हम उन्हें नतीजे दे रहे हैं. हम मराठी मानुष हैं... हम नतीजों में भरोसा रखते हैं.'

फिर ये भी बताया कि उनके खिलाफ कैसे साजिशें रची जा रही हैं. कैसे उनके अयोध्या जाने की घोषणा से परेशान लोग जाल बिछाने की योजना बना रहे हैं.

राज ठाकरे बोले, 'जिस दिन मैंने मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतारने की घोषणा की थी उसी दिन मैंने अयोध्या जाने का एलान भी किया था... ये कहा गया कि मुझे अयोध्या में घुसने की अनुमति नहीं दी जाएगी... मैं ये सब देख रहा था... लोग मुझे बता रहे थे कि क्या हो रहा है? मुझे अहसास हुआ कि ये एक जाल है... मुझे इस जाल में नहीं फंसना है.'

और फिर राज ठाकरे ने अपना अयोध्या दौरा टालने की घोषणा कर डाली. बताया कि महाराष्ट्र में चुनावी मौसम में उनके साथ साथ उनके कार्यकर्ताओं को फंसाने की साजिश रची जा रही है - और इसी वजह से मजबूर होकर उनको अपना अयोध्या दौरा मजबूरन टालना पड़ रहा है.

ये ठीक है कि लाउडस्पीकर और अयोध्या दौरे की घोषणा साथ साथ हुई थी, लेकिन अयोध्या दौरा टालने के साथ ही राज ठाकरे और उनके कार्यकर्ताओं में खामोशी क्यों छा गयी?

राज ठाकरे ने पहले 3 मई तक महाराष्ट्र के सभी मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतारने की धमकी दी थी. फिर 3 मई को बोले कि ये सिलसिला लगातार चलेगा. रुकने वाला नहीं है. कुछ इलाकों की मुस्लिम बस्तियों में पाकिस्तान कनेक्शन वाले लोगों के होने का शक जता केंद्र सरकार से छापे मारने की अपील कर रहे थे. ऐसा क्यों लगता है जैसे राज ठाकरे की सारी मुहिम ठप हो गयी है?

शिवसेना, गठबंधन सरकार के गृह मंत्री और फिर खुद उद्धव ठाकरे की तरफ से भी राज ठाकरे के मामले में भी नवनीत राणा जैसे एक्शन के ही संकेत देने की कोशिश देखी गयी थी - तो क्या राज ठाकरे ऐसी गीदड़भभकियों से डर गये? राज ठाकरे का ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा तो नहीं है. वो तो डंके की चोट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट बुलेट ट्रेन का विरोध कर चुके हैं. चुनावों के दौरान मोदी का मजाक तक उड़ा चुके हैं.

कहीं ऐसा तो नहीं कि राज ठाकरे बीजेपी के 'यूज एंड थ्रो' प्रैक्टिस का शिकार हो चुके हैं. जैसे नीतीश कुमार के दबाव में चिराग पासवान को किनारे लगा दिया. बात अगर उद्धव ठाकरे की हो तो भला बीजेपी के लिए राज ठाकरे क्या चीज हैं?

राज्य सभा चुनाव के नतीजे आने के बाद उद्धव ठाकरे को निशाना बनाकर गठबंधन के नेताओं की बयानबाजी भी तो यही बता रही है कि सब ठीक नहीं चल रहा है - क्या महाराष्ट्र में सियासत की फिजा बदलने वाली है?

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