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Updated: 01 मार्च, 2019 12:32 PM
श्रुति दीक्षित
श्रुति दीक्षित
  @shruti.dixit.31
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पाकिस्तानी सेना के कब्जे में हमारा एक भारतीय जवान है. ये वो समय है जब पूरा देश भारतीय सैनिक अभिनंदन वर्धमान की सुरक्षा की कामना कर रहा है और वो सही-सलामत वापस आ जाएं इसके लिए भारत सरकार की तरफ से कोशिशें भी तेज़ हो गई हैं. अभिनंदन वर्धमान जिस स्थिति में फंसे हुए हैं वो हमारे भारतीय सैनिकों के सामने कई बार आई है. लगभग हर जंग में भारतीय सैनिक पाकिस्तान के कब्जे में और पाकिस्तानी सैनिक भारत के कब्जे में आए हैं.

1971 के युद्ध में ऐसे ही कई सेना के जवान पाकिस्तान के कब्जे में आ गए थे. इन जवानों ने बहादुरी की एक ऐसी कहानी को जन्म दिया कि आज भी दुनिया को याद है. वो जंग जब भारत के वीर जवान पाकिस्तान की जेल को तोड़कर भाग निकले थे. ये वो समय था जब पाकिस्तान की तरफ से हमारे जवानों को छोड़ने की कोई पहल नहीं की गई थी.

एक वीर के वो शब्द जिन्होंने इतिहास में जगह बना ली..

1971 के युद्ध के समय फ्लाइट ले. दिलीप परुल्कर ने कहा था, 'हम दुश्मन के इलाके में अंदर तक वार करेंगे, एक गोली भी एक विमान को गिराने के लिए काफी है. अगर मैं कभी पकड़ा गया तो मैं भाग जाऊंगा.'

ये शब्द कहे गए थे परुल्कर के कमांडिंग अफसर एम.एस.बावा से और साल था 1968. विधि का विधान देखिए कि दिलीप परुल्कर 1971 की भारत-पाकिस्तान की जंग में गए भी और दुश्मन इलाके में ही जाकर गिरे. उन्हें और उनके साथ 11 अन्य पायलटों को जंग का कैदी बनाकर पाकिस्तान ने अपने कब्जे में ले लिया था. लेकिन परुल्कर ने वही किया जो उन्होंने कहा था. दिलीप परुल्कर दो अन्य पायलट मलविंदर सिंह ग्रेवाल और हरीश सिन्हजी के साथ पाकिस्तान की जेल से भाग निकले थे.

फ्लाइट ले. हरीश सिन्हजी, दिलीप परुल्कर, मलविंदर सिंह ग्रेवालफ्लाइट ले. हरीश सिन्हजी, दिलीप परुल्कर, मलविंदर सिंह ग्रेवाल

ये तीनो वीर रावलपिंडी के POW (Prisoner of war) कैंप से भाग निकले थे.

वो कहानी जो भारतीय सेना की वीरता का परिचय देती है-

साल था 1971 वक्त था भारत-पाकिस्तान के बीच जंग का. भारत के लिए लाहौर के पूर्व में स्थित एक शहर जफरवाल में मौजूद पाकिस्तानी वॉच टावर बहुत महंगा साबित हो रहा था. भारतीय वायुसेना के आदमपुर बेस की 26वीं बटालियन के सुखोई 7 फाइटर्स को इस टावर को नष्ट करने का टार्गेट सौंपा गया था.

10 दिसंबर 1971 को फ्लाइट ले. परुल्कर को मिशन पर जाना था ताकि इस टावर पर बम गिराया जा सके. उस समय परुल्कर के प्लेन को निशाना बनाया गया और वो प्लेन गिर गया. परुल्कर प्लेन से इजेक्ट तो हो गए, लेकिन पैराशूट सीधे पाकिस्तानियों के बीच उन्हें ले गया. परुल्कर नीचे गिरने पर चोटिल हो गए और तभी गुस्साए गांव वाले उनपर टूट पड़े. सीधे उनका सामान चुराया गया और जब तक पाकिस्तानी सेना के अफसर आते तब तक परुल्कर को काफी चोट आई थी. साथ ही, उनके सिर पर किसी ने एक जोरदार मुक्का मारा था जिससे परुलकर बेहोश हो गए थे और उन्हें Pow ले जाया गया था.

होश आने पर पता चला रावलपिंडी में हैं-

जब परुल्कर को होश आया तब वो रावलपिंडी में पाकिस्तान के एकान्त कारावास में हैं. ये कैंप खास तौर पर भारतीय बंधकों के लिए था जो युद्ध में गिरफ्तार किए गए हैं. उन्हें लंबी पूछताछ का हिस्सा बनाया गया. उनकी हड्डी टूट गई थी और प्लास्टर चढ़ा था. उन्हें कुछ समय बाद दूसरे कमरे में ले जाया गया. वहां उनकी मुलाकात एम.एस.ग्रेवाल और हरीश सिन्हजी और 9 अन्य एयर फोर्स पायलटों के साथ रखा गया. हालांकि, उन्हें अलग-अलग सेल में सोना होता था, लेकिन फिर भी खाने के वक्त वो लोग एक दूसरे से मिलते थे. कई दिनों बाद जाने-पहचाने चेहरे देखकर परुल्कर भी खुश हुए.

फ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप परुल्कर अपने मेडल के साथफ्लाइट लेफ्टिनेंट दिलीप परुल्कर अपने मेडल के साथ

दूसरे पाकिस्तानी अफसरों को विपरीत पाकिस्तानी स्क्वाड्रन लीडर उस्मान अमीन भारतीय पायलटों के साथ बहुत अच्छी तरह पेश आते थे. उन्हें किताबें, बोर्ड गेम आदि इस्तेमाल करने की सुविधा भी देते थे. परुल्कर ने उस्मान अमीन का जिक्र 2017 में दिए एक इंटरव्यू में भी किया था.

परुल्कर ने कहा था, 'हम बॉलीवुड फिल्मों और अपने परिवार के बारे में बात करते थे. अन्य पाकिस्तानी अफसर नाराज रहते थे क्योंकि अमीन साहब हमारे साथ अच्छा बर्ताव करते थे. अमीन ने हमें एक कसेट प्लेयर भी दिया था गाने सुनने को और साथ ही एटलस किताब का एक मैप भी दिया था जो आगे चलकर हमारे भागने के काम आया.'

25 दिसंबर को अमीन ने 11 भारतीय सैनिकों को क्रिसमस मानाने के लिए न्योता भी दिया था. माहौल को देखकर कैदी जंग की जानकारी जुटाने में लग गए और पता चला कि ढाका में पाकिस्तानी सेना ने समर्पण कर दिया है. सभी खुश थे. उस समय परुल्कर ने भागने का प्लान बनाया था पर वो प्लान अन्य लोगों की वजह से पूरा नहीं हो पाया. पर उस ग्रुप में से दो पायलट मान गए और भागने का प्लान बनाने लगे. ये थे ग्रेवाल और सिन्हजी.

एक किताब रिलीज के मौके पर फ्लाइट ले. ग्रेवाल और फ्लाइट ले. परुल्करएक किताब रिलीज के मौके पर फ्लाइट ले. ग्रेवाल और फ्लाइट ले. परुल्कर

वो प्लान जिसने इन तीनों को आजादी के करीब पहुंचाया-

तीनों जानते थे कि अगर पकड़े गए तो मौत पक्की है और वो बहुत सावधानी से प्लान बनाने लगे. उसी ऑक्फोर्ड स्कूल एटलस का इस्तेमाल किया गया जिसे अमीन ने परुल्कर को दिया था. उन्हें समझ आ गया था कि उन्हें अपनी सेल से दूसरी जगह शिफ्ट होना होगा. उन्हें एक ऐसा सेल जिसमें कम पहरा था और जो रोड के पास था उसमें किसी तरह से शिफ्ट होना था. उसके बाद उन्हें किसी तरह से पहरा कर रहे सिपाही को चकमा देना था और दीवार फांदकर एक गली से होते हुए चर्चित ग्रांड ट्रंक रोड में जाना था.

इसके बाद उन्हें इसी व्यस्त रोड पर सीधे चलना था और लाहौर युद्ध स्थल पर जाना था जहां दोनों देशों की सेना एक दूसरे से लड़ रही थीं. यहां जमीन में माइन्स भी बिछीं थीं और इसके बाद पहाड़ियों से होते हुए अफगानिस्तान-पाकिस्तान की बॉर्डर तोरखाम में पहुंचे और उस सीमा को पार कर जाएं ताकि बिना गिरफ्तार हुए अफगानिस्तान के रास्ते भारत पहुंचा जा सके.

इस तरह से पूरा किया प्लान-

उन तीनों का पहला कदम था स्टाफ से दोस्ती करना खास तौर पर उन गार्ड्स से जो पहरा देते थे. इन तीनों ने 57 रुपए प्रति माह के अपने वेतन (जेनेवा कन्वेंशन के आधार पर उन्हें ये मिलना था.) को जोड़कर कुछ सामान इकट्ठा करना शुरू किया. इसमें ड्राय फ्रूट्स, गाढ़ा दूध और भागने के लिए कुछ सामान लेना शुरू कर दिया.

पर्दे, बेल्ट, पेराशूट का फटा हुआ कपड़ा आदि इस्तेमाल कर इन लोगों ने थैले बनाए गए जिसमें सामान रखा जा सके और G-सूट (एंटी-ग्रैविटी सूट जो फाइटर पायलट पहनते हैं.) का इस्तेमाल करके पानी के थैले बनाए गए. सुइयां जिन्हें सिलाई के लिए इस्तेमाल किया गया था उन्हें ट्रांजिस्टर की बैटरी से चुंबक बनाया गया और उन्हें पेन में छुपाया गया ताकि कंपस बनाया जा सके और उन पेन को जेब में बिना दिक्कत रखा जा सके.

पठान की तरह कपड़े लेने के मामले में परुल्कर खुशकिस्मत निकले रेड क्रॉस एजेंट्स ने कई खत, पार्सल आदि लाने शुरू कर दिए थे जो बंदियों के घर वालों ने भेजे थे. इसमें परुल्कर के माता-पिता ने उन्हें तीन शर्ट और पैंट भेजी थीं जिन्हें थोड़ा सा बदलकर पठानी कपड़ों जैसा बना लिया गया.

आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण समस्या थी 18 इंच की मोटी दीवार पर एक छेद करना. इन तीनों ने कांटे और कैंची का इस्तेमाल किया जिसे उन्होंने दाढ़ी काटने के लिए मांगा था. तीनों ने दाढ़ी जान कर बढ़ाई थी ताकि उसे काटने के औजार मांगे जा सकें.

दिन भी वो चुना जो जिसपर पाकिस्तानी शक नहीं कर सकते थे-

13 अगस्त 1972 की रात को परुल्कर, ग्रेवाल और सिन्हजी धीरे से कैंप से बाहर निकल गए. उनकी प्लानिंग इतनी पक्की थी कि किसी को शक न हो. क्योंकि 14 अगस्त को पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस होता है इसलिए पाकिस्तानी कैंप के गार्ड भी आराम के मूड में थे. उस दिन थोड़ी ज्यादा बारिश भी हो रही थी इसलिए उनका निकलना आसान रहा.

जैसे ही बादल छंटे तीनों हाईवे की तरफ बढ़ गए. दिल में उम्मीद और होठों पर प्रार्थना थी. अपने नाम बदल तीनो टूरिस्ट की शक्ल में पेशावर जाने वाली बस में चढ़े जहां वो खैबर में ट्रेकिंग के लिए जाने वाले थे.

वो बस शहर में पहुंच पाती इससे पहले ही वो उतर गए और अफगानिस्तान के लिए अपनी चढ़ाई शुरू कर दी. उन्होंने एक तांगा (घोड़ागाड़ी) की और आगे बढ़ने लगे, लेकिन तांगे वाले ने इतनी पूछताछ शुरू कर दी कि उन्होंने पैदल चलना शुरू किया. उनका अफगानिस्तान पहुंचने का प्लान कारगर भी हो जाता, लेकिन 8 किलोमीटर पहले ही उन्हें जामरूद में पकड़ लिया गया.

किस गलती के कारण हुए थे दोबारा गिरफ्तार?

उन्हें इसलिए पकड़ लिया गया क्योंकि वो बार-बार लंदी खाना रेलवे स्टेशन के बारे में पूछ रहे थे. उनकी रिसर्च के अनुसार ये रेलवे ट्रैक उनका आखिरी पड़ाव होना था, लेकिन उन्हें ये नहीं पता था कि ये दिसंबर 1932 में ही बंद कर दिया गया था. क्योंकि वो स्थानीय लोगों से बार-बार उस जगह के बारे में पूछ रहे थे जो थी ही नहीं इसलिए वहां के तहसीलदार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. अब उन्हें कोई चमत्कार ही बचा सकता था. उन्होंने तहसीलदार से कहा कि उन्हें एक फोन करने की इजाजत दी जाए ताकि वो अपनी बात बता सकें. वो किसमतवाले थे कि अमीन ने उनकी पहचान तहसीलदार को बता दी और कहा कि जब तक सेना न आ जाए उन्हें गिरफ्तार ही रखा जाए और कोई चोट न पहुंचाई जाए.

परुल्कर, ग्रेवाल और सिन्हजी को वापस रावलपिंडी कैंप में छोड़ दिया गया. तब तक कैंप का कमांडर अमीन नहीं था बल्कि कोई और बन चुका था. ये था वाहिदुद्दीन जो काफी गुस्से वाले थे. तीनों को 30 दिन का एकांत कारावास दिया गया. कुछ दिन बाद उन्हें फैसलाबाद जेल में भेज दिया गया जहां अन्य एयरफोर्स के पायलट भी थे. इसके कुछ दिन बाद ही जुल्फिकार अली भुट्टो ने उन सभी की रिहाई के आदेश दिए.

1 दिसंबर 1972 को सभी भारतीय वायुसेना के पायलटों को वाघा बॉर्डर पर छोड़ा गया और उनका हीरो की तरह स्वागत किया गया. उन तीनों के भागने की खबर उनसे पहले ही घर पहुंच चुकी थी. वो तीने अमृतसर से दिल्ली पहुंचे जहां उनका परिवार उनका इंतजार कर रहा था.

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लेखक

श्रुति दीक्षित श्रुति दीक्षित @shruti.dixit.31

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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