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Updated: 05 अगस्त, 2016 11:11 PM
वाल्सन थंपू
वाल्सन थंपू
  @vthampu
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एक दिन हमें बताया गया कि सेंट स्टीफेंस में हिस्ट्री हॉनर्स के एक नहीं दो सेक्शन होंगे. इसका कोई खास कारण नहीं बताया गया. न ही किसी ने कारण जानना चाहा. लगभग उसी समय कैंपस में एक नई पुलिस चौकी बना दी गई. चौकी को गोपनीयता देने के लिए उस टीले को चुना गया जो राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी की नानी कमला नेहरू के नाम पर था.

उस साल जब जुलाई में नए सेशन की शुरुआत हुई तो कैंपस में नए-नए चेहरे देखने को मिले. जो आमतौर पर कैंपस में बतौर बाहरी माने जाते थे. इतिहास रहा है कि सेंट स्टीफेंस के कैंपस ‘बाहरी’ लोगों के लिए बहुत सेंसिटिव रहता है. कैंपस में इन अप्रत्याशित बदलावों पर सवाल खड़े होने लगे.

इन सवालों के जवाब में पता चला कि कैंपस में घूम रहे बाहरी संदिग्ध लोगों का रिश्ता हिस्ट्री हॉनर्स के एक नए विद्यार्थी राहुल से है (जाहिर है उस वक्त राहुल को RaGa के नाम से नहीं जाना जाता था).

मझे बताया गया कि नए स्टूडेंट को स्पोर्ट्स कोटे में दाखिला दिया गया है जो एक शूटर है. इंग्लिश लिटरेचर डिपार्टमेंट में होने के कारण मुझे इस नए भाग्यशाली स्टूडेंट को पढ़ाने का मौका नहीं मिला.

अपने पिता राजीव की तरह राहुल भी स्वभाव से बहुत सरल था. राहुल को देखकर ऐसा लगता था कि उसे इस बात का एहसास नहीं था कि नेहरू परिवार का होने के कारण वह कितना महत्वपूर्ण है.

rahul gandhiराहुल गांधी ने उसी जल्दबाजी में सेंट स्टीफेंस छोड़ दिया जिस जल्दबाजी में उसका यहां एडमिशन हुआ था

मैं उस पुलिस अफसर से मिला था, जिस पर राहुल की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी. उस पुलिस अधिकारी से मैंने जाना कि उसे और उसकी टीम को सख्त निर्देश दिया गया था कि राहुल की सुरक्षा के नाम पर कैंपस में किसी अन्य व्यक्ति को कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए.

उन्होंने किसी को असुविधा होने भी नहीं दी. (जबिक 70 के दशक में जब सेंट स्टीफेंस में उड़ीसा के एक बड़े नेता के बेटे ने दाखिला लिया तो उसने पूरी कोशिश की कि कोई यह भूलने न पाए कि उसके तार बहुत ऊपर तक जुड़े हैं. वह नेता भी कांग्रेस पार्टी से था.)

राहुल गांधी ने उसी जल्दबाजी में सेंट स्टीफेंस छोड़ दिया जिस जल्दबाजी में उसका यहां एडमिशन हुआ था. मुझे बताया गया कि राहुल उच्च शिक्षा के लिए विदेश चला गया है.

राहुल से मेरा आमना-सामना कई दिनों बाद तब हुआ, जब वे सीधे इंडियन नेशनल कांग्रेस के बड़े पद पर नियुक्त कर दिए गए. तब तक मैं भी सभी दिक्कतों को झेलते हुए सेंट स्टीफेंस के शीर्ष पद पर पहुंच चुका था.

सेंट स्टीफेंस के कई पुराने स्टूडेंस ने मुझसे मुलाकात कर राहुल गांधी के किसी बयान पर आपत्ति दर्ज कराई कि उससे कॉलेज की छवि खराब हुई है.

एक बार उच्च शिक्षा की खामियों पर बोलते हुए शायद आवेग में आकर राहुल ने कहा कि जब वह सेंट स्टीफेंस में पढ़ते थे तब उन्हें क्लास में सवाल नहीं पूछने दिया जाता था. इस बयान पर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ.

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राहुल गांधी

मेरा तजुर्बा कहता था कि स्टूडेंस सबसे ज्यादा सवाल पूछने में ही मशगूल रहते थे. मैं खुद पूरी कोशिश करता था कि क्लास में नए-नए डिस्कशन होते रहें. इसमें मैं इस बात की भी परवाह नहीं करता था कि ऐसे डिस्कशन में मुझे अपनी उम्मीद के मुताबिक कुछ मिलता है या नहीं.

इसके बाद मैंने राहुल गांधी से मुलाकात करने का फैसला किया. हमारी मुलाकात भी हुई. इस मुलाकात में यह तय हुआ कि राहुल कॉलेज आएंगे और सभी स्टूडेंट्स से बिना किसी रोकटोक के एक घंटे की चर्चा करेंगे.

इस मुलाकात में मैंने राहुल को पूरी गंभीरता के साथ सुना. उनकी बातों में मुझे कई ऐसे बयान मिले जो किसी को नुकसान पहुंचाने की मंशा से नहीं थे, स्पष्ट थे और बिना किसी चतुराई के दिए गए थे.

राहुल की पूरी बात का सारांश चुनौती और बदलाव की जरूरत को सामने रखने पर था और मकसद था कि लोगों में सवाल पूछने की प्रवृति विकसित हो.

अपनी भाषण कला का परिचय देते हुए राहुल ने पूछा- ‘क्या कोई अपने देश की राजनीति में रत्ति भर परिवर्तन ला सकता है”. बिना रुके हुए उन्होंने अपने सवाल का खुद जवाब दिया- “नहीं”.

मासूमियत के साथ मेरी तरफ देखते हुए राहुल ने पूछा- “क्या आपके प्रिंसिपल इस जैसे छोटे से कॉलेज में कोई बदलाव ला सकते हैं? “नहीं...”

राहुल की बातों को सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ.

कॉलेज की जिम्मेदारी संभालने के बाद मैं लगातार कोशिश में था कि किसी तरह कॉलेज के चरित्र और दृष्टिकोण में अर्सों से लंबित बदलावों को लाया जाए.

लिहाजा, राहुल के बयान पर टिप्पणी करते हुए मैंने कहा- “यह संभव है कि किसी व्यवस्था या संस्था को चुनौती देकर उसे बदल दिया जाए. इसके लिए जरूरी है कि इस बदलाव की कीमत अदा करने के लिए हम तैयार रहें.”

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सोनिया गांधी और राहुल गांधी

कालेज के अंदर से जमा हुए दर्शक राहुल की मासूमियत और खुलेपन से मंत्रमुग्ध थे (खासतौर पर कॉलेज की वह लड़कियां जिन्हेंह राहुल गांधी एक स्मार्ट युवा लग रहे थे) कि एक घंटे के लिए आयोजित यह अनौपचारिक संवाद दो घंटे तक खिंच गया.

आमतौर पर कार्यक्रम के बाद सभी वीवीआईपी कार्यक्रम स्थल से जल्दी भागना चाहते हैं. वह जल्दी तब भी जाहिर की जाती है जब उनका कोई दूसरा कार्यक्रम फिक्स नहीं रहता. लेकिन इसके उलट राहुल गांधी ने ऐसी कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और वह कैंपस में अगले एक घंटे और लोगों के साथ घुलते-मिलते रहे.

इससे मुझे यकीन हो गया कि यह नौजवान राजनीति के लिए नहीं बना है.

वह बेहद अच्छे इंसान हैं. वह सबकुछ बदल देना चाहते हैं और इसमें वह खुद को भी बदलने के लिए तत्पर रहते हैं.

लेकिन उन्हें राजनीति के उस चिर-परिचित सांचे में नहीं तैयार किया गया है, जहां किसी नेता को अपने सामने सभी बौने नजर आते हैं. न ही उनके अंदर राजनीतिक चतुराई है (जो आपको देखकर भी अनदेखा कर दे). नही ही वह चिकनी-चुपड़ी बाते कर सकते हैं क्यों कि वह अपनी बात बहुत सीधे तौर पर रखते हैं-जैसा कि वह सोचते हैं. (अब कह सकता हूं कि वह रागा हैं).

मुझे राहुल भेड़ियों के बीच एक मेमने की तरह दिखते हैं (भगवान के लिए इसे बस मुहावरे की तरह ही लें).

आखिरी बार राहुल से मेरी मुलाकात 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों में हुए घोटाले के संदर्भ में हुई थी. इस घोटाले की छीटों से सेंट स्टीफेस कॉलेज भी गंदा हुआ था. मैंने उनसे निवेदन किया था कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर सामने आएं.

“वो लोग आपके भविष्य को बेच रहे हैं. अभी समय है इसके खिलाफ कुछ करने का, नहीं तो बहुत देर हो जाएगी”.

मैनें उनके जवाब का इंतजार किया. कुछ देर के लिए वह सोचने लगे. मैंने देखा कि बेहद दर्द के साथ वह दूसरी दिशा में खींच लिए गए.

मुझे पता था कि उनकी आत्मा चाहती है कि वह हमला बोलते हुए अपनी आवाज को बुलंद करें. लेकिन अब तक उन्हें राजनीति की जो ट्रेनिंग दी गई थी उसने उनकी आत्मा की आवाज को अनसुना कर दिया.

इसके बाद राहुल के अंदर बसी राजनीति ने मुझसे पूछा कि क्या मैं कांग्रेस अध्यक्षा से मिलना चाहता हूं?

मैंने मना कर दिया और उसके बाद कभी 10 जनपथ के दरवाजे को नहीं देखा.

मैं जानता था ये मजबूरी थी, क्योंकि पासे इसी तरह फेंके गए थे. नीयती ऐसी थी. कहीं पश्चिम में सूरज को डूबना ही है, कुछ चेतावनियों के साथ.

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लेखक

वाल्सन थंपू वाल्सन थंपू @vthampu

लेखक सेंट स्टीफेंस कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल हैं.

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