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Updated: 12 अप्रिल, 2019 02:23 PM
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प्रियंका गांधी वाड्रा ने देश के नेताओं को सोनिया गांधी से सीखने की सलाह दी है. मुमकिन है राजनीतिक विरोधी प्रियंका वाड्रा के इस बयान को अपनी मां के प्रति लगाव और श्रद्धा से जोड़ कर पेश करें, पर सच तो ये है कि सोनिया गांधी के पास सत्ता की राजनीति को करीब से देखने का सबसे लंबा अनुभव रहा है. सोनिया गांधी ने तीन तीन प्रधानमंत्रियों के कामकाज को इतने नजदीक से देखा है जितना देश में शायद ही किसी के लिए संभव हो सका हो. राजनीतिक विरोधी सोनिया गांधी की नीति और नीयत पर चाहे जितने भी सवाल खड़े कर लें - क्या इस बात से इंकार कर सकते हैं सोनिया के पास संगठन का जो भी अनभव हो सत्ता का नहीं है? कहने को तो संजय बारू की किताब 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' को भी प्रोपगैंडा ही करार देते हैं.

सोनिया गांधी को लेकर प्रियंका वाड्रा की सलाह पर किसी को ऐतराज नहीं हो सकता, बल्कि इस बात पर हो सकता है कि कांग्रेस महासचिव ने दूसरों को नसीहत देने की जगह राहुल गांधी को क्यों नहीं समझाया. अगर सोनिया गांधी से राहुल गांधी कुछ सीख लेते तो भला कांग्रेस का ही होगा. है कि नहीं?

सोनिया गांधी का अनुभव संसार विशाल है

रायबरेली से सोनिया गांधी के पांचवीं बार नामांकन में भी प्रियंका वाड्रा उतनी ही तत्परता से मौजूद रहीं जैसे राहुल गांधी के दोनों नामांकनों में. वायनाड से पहले और अमेठी से राहुल गांधी के चौथे नामांकन के मौके पर. कांग्रेस महासचिव की जिम्मेदारी मिलने के बाद प्रियंका वाड्रा पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ साथ राजनीतिक मौजूदगी भी दर्ज कराने लगी हैं. चाहे वो पति रॉबर्ट वाड्रा हों, भाई राहुल गांधी हों या फिर मां सोनिया गांधी - प्रियंका वाड्रा कदम कदम पर मजूबती के साथ डटी हुई नजर आती हैं.

प्रियंका वाड्रा भी समझ रही हैं कि अमेठी जैसी भले न सही, रायबरेली में भी सोनिया गांधी के सामने चुनौती खड़ी तो हो ही चुकी है. कभी गांधी परिवार और कांग्रेस के अमेठी में कर्ताधर्ता रहे दिनेश प्रताप सिंह करीब साल भर पहले बीजेपी के हो गये - और अब तो चुनाव मैदान में उतर कर पंजे पर कमल की जीत का दावा भी करने लगे हैं. मोदी फैक्टर की बात अलग है, लेकिन सोनिया के सामने दिनेश प्रताप अपने बूते तो नहीं ही टिकते. सोनिया गांधी ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चैलेंज कर ही दिया है. मोदी को सोनिया ने याद दिलाया है कि 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अजेय माने जा रहे थे. केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी सोनिया गांधी के इस बयान पर चाहे जैसे रिएक्ट करें, लेकिन ये बात कोई हवा में नहीं कही गयी है. सोनिया लगातार दो आम चुनाव जीतने और 10 साल तक केंद्र की सरकार चलाने के बात ये बात कही है. सरकार में काम क्या हुए, घोटाले कितने हुए बहस अलग से हो सकती है. गठबंधन की सरकार 10 साल चलाना कोई मामूली बात नहीं होती. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की पीड़ा से आसानी से समझा जा सकता है.

sonia, rahul, priyankaराहुल गांधी को गद्दी सौंपने का बाद भी मोर्चा सोनिया गांधी को ही संभालना पड़ रहा है.

जहां तक सोनिया गांधी के सत्ता की राजनीति के जानने समझने और उस पर अमल करने की बात है, बीते वाकयों के जरिये समझने की कोशिश की जा सकती है. सोनिया गांधी जब बहू बन कर भारत आयीं तो उनकी सास इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. 1968 से लेकर 1984 के बीच सोनिया गांधी ने इंदिरा गांधी के काम के तौर तरीके को सबसे करीब से देखा. सोनिया गांधी ने वो दौर भी देखा जब देश में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगायी और वो दौर भी जब चुनावों में हारने के गिरफ्तार कर ली गयीं - और ये भी देखा और सीखा कि कैसे एक सरकार गिराने के लिए किसी नेता को कैसे सपोर्ट करना चाहिये और कैसे काम निकल जाने के बाद कदम पीछे खींच लेने चाहिये.

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो सोनिया ने उन्हें आजमाया जरूर होगा. ऐसे कई उदाहरण भी मिलते हैं. जो तरीका इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई की सरकार गिराने में इस्तेमाल किया, आगे चलकर तकरीबन उसी स्टाइल में राजीव गांधी ने वीपी सिंह को चलता किया. इंदिरा गांधी ने तो चौधरी चरण सिंह को बहुमत तक साबित करने का मौका नहीं दिया थी, राजीव गांधी ने तो चंद्रशेखर को पूरे चार महीने सरकार चलाने का अवसर दिया. जब मन ऊब गया और कारगर बहाना मिला तो समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी. राजीव गांधी की कामयाबी में सोनिया गांधी के योगदान से कोई इंकार तो नहीं ही कर सकता. क्या ऐसा नहीं लगता कि राहुल गांधी भी पिता की तरह मां की सलाह से चलते तो अब तक इतने धक्के नहीं खाने पड़ते.

जो राहुल गांधी अब तक नहीं सीख सके

राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी सौंप कर सोनिया रिटायर होना चाह रही होंगी. मगर, ऐसा अब तक संभव नहीं हो सका है. सेहत ठीक न होने के बावजूद सोनिया को मोर्चा संभालना पड़ा है. बीमार होकर अस्पताल में भर्ती रहते हुए भी सोनिया को विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश करते देखा गया है. खराब सेहत के चलते सोनिया गांधी चुनाव प्रचार तो दूर रहीं ही, कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठकों तक में आना जाना कम कर दिया था. बनारस में तो रोड शो के दौरान बीच में ही सोनिया की तबीयत खराब हो गयी और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. यहां तक की रायबरेली में अपने नामांकन से पहले रोड शो में भी सोनिया गांधी ज्यादातर गाड़ी में ही बैठी रहीं. बीच बीच में बाहर आकर लोगों से मिलती रहीं.

सोनिया गांधी को मोर्चा इसीलिए संभालना पड़ रहा है क्योंकि राहुल गांधी भरोसा नहीं दिला पाये हैं कि वो अपेक्षा के अनुरूप नतीजे ला सकेंगे. गुजरात और कर्नाटक के बाद तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनवाने का क्रेडिट राहुल गांधी को जरूर मिलता है लेकिन जरूरत के मुताबिक नाकाफी है.

राहुल गांधी अब तक खुद को ऐसा नहीं बना पाये हैं कि विपक्षी खेमा उनकी बात पर ऐतबार कर सके. जब राहुल गांधी के लिए विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भी मुख्यमंत्री के नाम फाइनल करना मुश्किल हो रहा हो, राज्यों में दूसरे राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन और सीटों के बंटवारे में मुश्किल आ रही हो तो क्या समझा जाये. राहुल गांधी के लिए सोनिया से सीखने वाली चीजों की फेहरिस्त बहुत लंबी है. कुछेक भी सीख लें तो काफी होगा और उससे कांग्रेस का काफी भला हो सकेगा.

सोनिया गांधी से राहुल गांधी को सीखने वाली सबसे बड़ी बात तो वो है कि कैसे प्रधानमंत्री पद का त्याग करने की हिम्मत जुटाई जाती है - और उसके बाद दस साल तक सत्ता पर पूरे नियंत्रण के साथ काबिज रहा जा सकता है.

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