charcha me| 

होम -> सियासत

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 17 सितम्बर, 2021 07:42 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
  • Total Shares

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 की राजनीतिक बिसात पर इन दिनों एक से बढ़कर एक सियासी चालें देखने को मिल रही हैं. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने 'नई हवा और नई सपा' के नारे के साथ अपने एमवाई (मुस्लिम+यादव) समीकरण में करेक्शन करते हुए इसे नया रूप दे दिया है. अखिलेश यादव के अनुसार, अब एमवाई समीकरण का मतलब मुस्लिम-यादव गठजोड़ नहीं महिला-युवा की सपा (SP) से करीबी होगा. बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati) कहती दिख रही हैं कि अब वो विकास की राजनीति करेंगी और मूर्तियों से पहरेज करेंगी. कांग्रेस (Congress) ने प्रियंका गांधी के सहारे सूबे में पैरों के नीचे गायब हो चुकी जमीन को दोबारा जगह पर लाने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ ली है.

आम आदमी पार्टी (Aam Aadmi Party) ने तिरंगा यात्रा के जरिये भाजपा के झूठे राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को बेनकाब करने की कसम खा ली है. कुला मिलाकर कहने का अर्थ ये है कि यूपी चुनाव से पहले सूबे के तमाम राजनीतिक दलों में बदलाव की एक अलग ही बयार दिखाई पड़ रही है. लेकिन, ये बदलाव की बयार सियासी मजबूरी के तहत यूपी चुनाव (UP Election 2022) से पहले किया जा रहा सामूहिक भूल सुधार अभियान ही नजर आ रहा है. क्योंकि, सपा, कांग्रेस, बसपा (BSP), आम आदमी पार्टी समेत सभी सियासी दलों को भाजपा (BJP) अकेले ही निशाने पर लिए हुए है. ये चौंकाने वाली बात कही जा सकती है कि महज 7 साल पहले सत्ता में आई भाजपा के पास ऐसी कौन सी जादुई छड़ी है, जिसके इशारे पर ये सभी राजनीतिक दल खुद में इतने बदलाव ला रहे हैं?

ये बदलाव की बयार सियासी मजबूरी के तहत यूपी चुनाव से पहले किया जा रहा सामूहिक भूल सुधार अभियान ही नजर आ रहा है.ये बदलाव की बयार सियासी मजबूरी के तहत यूपी चुनाव से पहले किया जा रहा सामूहिक भूल सुधार अभियान ही नजर आ रहा है.

राजनीतिक दलों का सामूहिक भूल सुधार अभियान

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव के चुनावी एमवाई समीकरण को लेकर राजनीति करते रहे हैं. लेकिन, इस बार के यूपी चुनाव में उन्होंने इस फॉर्मूले में थोड़ा करेक्शन किया है. अखिलेश यादव की नई सपा में अब एम का मतलब मुस्लिम (Muslim) न होकर महिला और वाई का अर्थ यादव (Yadav) से बदलकर युवा हो गया है. मुस्लिम-यादव परस्त होने का आरोप झेल रही सपा के लिए ये बदलाव करना जरूरी था. सपा के कार्यक्रमों और साइकिल यात्राओं में मुस्लिम नेताओं को अब उतनी प्रमुखता नही दी जा रही है. यहां तक कि अखिलेश सरकार के पूर्व मंत्री आजम खान के लिए भी सपा कोई खास प्रयास करती नजर नही आती है.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव मंदिरों में माथा टेक रहे हैं और राम मंदिर (Ram Mandir) के निर्माण के बाद सरपिरवार दर्शन करने आने का वादा भी लोगों के बीच छोड़ चुके हैं. हालांकि, माफिया मुख्तार अंसारी के भाई को सपा में शामिल कराकर अखिलेश यादव ने साबित कर दिया है कि यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में केवल जिताऊ उम्मीदवारों पर ही दांव लगाया जाएगा. लेकिन, सपा के सामने समस्या यही आएगी कि कारसेवकों पर गोली चलवाने के आरोपों की अखिलेश यादव के पास कोई काट नहीं है. धारा 370 (Article 370) और सीएए जैसों मुद्दों पर सपा और अखिलेश यादव अपने पहले के दिए बयानों पर ही फंसते हुए ही दिखाई पड़ते हैं. तो, भूल सुधार अभियान उनकी सियासी मजबूरी है.

उत्तर प्रदेश के तमाम क्षत्रपों सपा, बसपा (BSP) पर जातिगत राजनीति करने का ठप्पा लग चुका है. मायावती दलितों (Dalit Votebank) का मसीहा बन राजनीति करती आई हैं. ब्राह्मणों (Brahman) को सोशल इंजीनियरिंग के सहारे साथ लाकर सत्ता की कुर्सी पा चुकी मायावती अब इसी चुनावी फॉर्मूले को फिर से अपना रही हैं. क्योंकि, केवल दलितों या मुस्लिमों को वोटों से उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी कर पाना मुश्किल है. धारा 370, राम मंदिर, सीएए (CAA) जैसे मुद्दों पर मायावती ने भाजपा का पक्ष लेते हुए ही समर्थन जताया है.

इसे आसान शब्दों में कहें, तो बसपा सुप्रीमो मायावती ने भाजपा की राजनीतिक सोच को सही करार दे दिया है. एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी से गठबंधन की बात पर खुद ही सफाई देकर उन्होंने सॉफ्ट हिंदुत्व (Soft Hindutva) का तार छेड़ ही दिया है. वहीं, मुख्तार अंसारी सरीखे माफियाओं का टिकट काट कर मायावती ने बसपा और अपनी छवि को सुधारने की कोशिश की है. 2007 में सत्ता में आई मायावती ने पार्कों और मूर्तियों के निर्माण से तौबा करते हुए सूबे के विकास पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही है. यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में भूल सुधार के बाद एक बदली हुई बसपा सबके सामने होगी.

कांग्रेस की बात करें, तो पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) अच्छी तरह से जानती हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अभी इस स्थिति में नही है कि अकेले दम पर सरकार बना सके. इसी वजह से कांग्रेस मुस्लिम, दलित, ब्राह्मण, ओबीसी समेत सभी वर्गों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है. लेकिन, सीएए, धारा 370, तीन तलाक (Triple Talaq) जैसे मुद्दों पर पार्टी का विरोध यूपी चुनाव (UP Assembly Elections 2022) में उसके खिलाफ जाता दिखाई पड़ रहा है. जिसकी वजह से कांग्रेस ने सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड के जरिये खुद को संभालने की कोशिश की है. राम मंदिर के फैसले का स्वागत इसी का हिस्सा माना जा सकता है. वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद मुस्लिम समुदाय में पैंठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. नसीमुद्दीन सिद्दीकी की और कफील खान सरीखे चेहरों के सहारे कांग्रेस इस वोटबैंक में पीछे के दरवाजे से सेंध लगाने की कोशिश कर रही है. लेकिन, ये सभी कवायदें चुनावी भूल सुधार अभियान के तहत ही आएंगी.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) की आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने विस्तार के लिए तिरंगा यात्रा निकाल रही है. आम आदमी पार्टी के नेता और डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया राम राज्य (Ram Mandir) को सुशासन का पर्याय बता रहे हैं. पार्टी के नेता संजय सिंह कह रहे हैं कि वो भाजपा के फर्जी राष्ट्रवाद को बेनकाब करेंगे. लेकिन, अरविंद केजरीवाल ही वो शख्स हैं, जिन्होंने मोदी सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे थे. आम आदमी पार्टी वही सियासी दल है, जो रामजन्मभूमि पर राम मंदिर की जगह यूनिवर्सिटी बनाने की बात कहता था. इन बयानों की वजह से ही अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी यूपी में सामूहिक भूल सुधार अभियान का हिस्सा बनी है.

भाजपा का एकसूत्रीय एजेंडा सब पर भारी

दरअसल, इस सामूहिक भूल सुधार अभियान की सबसे बड़ी वजह भाजपा का हमेशा से चला आ रहा एकसूत्रीय एजेंडा है. भाजपा ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के नाम पर मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने में कामयाबी हासिल की है. 2014 के बाद चुनाव दर चुनाव भाजपा ने कामयाबी की जो इबारत लिखी है, उसमें इस एकसूत्रीय एजेंडे का ही रोल अहम है. जातिगत और धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले सियासी दलों को भाजपा ने उन्ही की राजनीतिक चालों में उलझाकर अपना मिशन जारी रखा. वहीं, राम मंदिर, धारा 370 जैसे चुनावी वादों को पूराकर भाजपा ने मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ को और मजबूत किया. तीन तलाक के खिलाफ कानून और सीएए जैसों मुद्दों से भाजपा ने अपनी प्रासंगिकता को कमजोर नहीं पड़ने दिया. और ये सभी चीजें उसके एजेंडे में सत्ता में आने से पहले से ही शामिल रही हैं. सत्ता पाने के लिए भाजपा ने इसमें किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया.

बिहार और महाराष्ट्र जैसे उदाहरण सबके सामने हैं. नीतीश कुमार महागठबंधन का हिस्सा बनकर बिहार में सरकार बना ले गए. लेकिन, कुछ ही समय बाद उन्हें एनडीए में घर वापसी करनी पड़ गई. कारण स्पष्ट है कि लालू यादव की पार्टी आरजेडी के साथ गठबंधन करने से उन पर जातिगत राजनीति के आरोप लगने लगे. जबकि नीतीश कुमार अपनी समावेशी राजनीति के लिए जाने जाते हैं. वहीं, नीतीश कुमार सरकार में लालू के बेटों तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव को उनकी व्यक्तिगत कुशलताओं को नकारते हुए बड़े पद देने का भी सिरदर्द उनके ही खाते में आया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ भाजपा को नए कीर्तिमान गढ़ने में आसानी हुई है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ भाजपा को नए कीर्तिमान गढ़ने में आसानी हुई है.

महाराष्ट्र में भाजपा सबसे बड़ा सियासी दल होने के बाद भी सत्ता से बाहर है. एनडीए की पूर्व सहयोगी शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद के लिए कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महाविकास आघाड़ी सरकार बना ली. लेकिन, भाजपा केवल बाहर बैठकर विरोध कर रही है. भाजपा अगले विधानसभा चुनाव से पहले एनसीपी या कांग्रेस को कितना नुकसान पहुंचाएगी, इस पर कयास लगाने से ज्यादा जरूरी ये देखना है कि कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर शिवसेना ने अपनी हिंदुत्व की राजनीति को कमजोर कर लिया है. अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा 'एकला चलो' की नीति अपनाएगी, ये अभी से तय माना जा रहा है.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ भाजपा को नए कीर्तिमान गढ़ने में आसानी हुई है. लेकिन, इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता है कि नरेंद्र मोदी भी भाजपा के उसी एकसूत्रीय एजेंडे को लेकर आगे बढ़े हैं, जो हमेशा से पार्टी की ताकत रहा है. भाजपा ने जातिगत राजनीति के बजाय हिंदुत्व को चुना, जिसके सहारे उसने दलित, ओबीसी, समेत सभी वर्गों को अपने साथ जोड़ा. पार्टी के स्पष्ट एजेंडे की वजह से भाजपा को किसी वर्ग को साधने की जरूरत नहीं पड़ी. हां, ये जरूर कहा जा सकता है कि जिस भाजपा पर कभी ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी होने का ठप्पा लगा था. अब उसमें हर वर्ग के नेताओं की सक्रियता बढ़ी है. परिस्थितियां दुरूह होने के बाद भी भाजपा ने कभी भी अपने चुनावी एजेंडा से समझौता नहीं किया.

कहना गलत नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश की जनता-जनार्धन लंबे समय से सपा, बसपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी जैसे दलों की राजनीति देखती आ रही है. मुस्लिम तुष्टीकरण से लेकर राष्ट्रीय मुद्दों पर देशविरोधी पक्ष अपनाने तक इन सियासी दलों ने ऐसे फैसले लिए हैं, जो इनके खिलाफ ही जाएंगे. बड़ा सवाल ये है कि क्या उत्तर प्रदेश के मतदाताओं की नजर इस सामूहिक भूल सुधार अभियान पर पड़ेगी या नहीं?

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय