New

होम -> सियासत

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 04 सितम्बर, 2019 10:28 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
  • Total Shares

बागडोर बदलते ही तमाम बदलावों के संकेत मिलने लगते हैं. हरियाणा कांग्सेस का झगड़ा पुराना था, इसलिए बदलाव की उम्मीद पहले मध्य प्रदेश में की जा रही थी. कांग्रेस आलाकमान का फैसला हरियाणा पर पहले ही आ गया है - क्योंकि वहां जल्द ही चुनाव होने वाले हैं.

राहुल गांधी के पसंदीदा अशोक तंवर को हटाकर कुमारी शैलजा को हरियाणा कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष बनाया गया है. साथ ही भूपिंदर सिंह हुड्डा को सोनिया गांधी ने विधायक दल का नया नेता बना दिया है. अब तक किरन चौधरी हरियाणा में कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता हुआ करती रहीं. देखा जाये तो पंजाब वाली ट्रिक हरियाणा में भी काम कर गयी है, लेकिन बस आधा. कैप्टन अमरिंदर सिंह की राह चलते हुए भूपिंदर सिंह हुड्डा ने भी रोहतक में रैली कर कांग्रेस नेतृत्व को कड़ा संदेश दिया था. क्या कदम उठाएंगे इसके लिए एक भारी भरकम कमेटी भी बनायी थी और कमेटी फैसले का अधिकार भी हुड्डा को ही सौंप दिया था. देखा जाये तो कैप्टन की ट्रिक अपनाने से हुड्डा को आधी कामयाबी तो मिल ही गयी है.

ऐसे बदलावों के संकेत सोनिया गांधी के कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष बनने के साथ ही मिलने लगे थे - सवाल है कि क्या मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों में भी कांग्रेस के नेताओं की फेरबदल में यही पैटर्न देखने को मिलेगा?

राहुल के फेवरेट नेताओं की छुट्टी तो नहीं होने वाली है?

हरियाणा से अशोक तंवर की छुट्टी वैसे तो कांग्रेस को टूटने से बचाने की एक कोशिश भी हो सकती है - लेकिन इसके दूरगामी संकेत भी हो सकते हैं. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश से लेकर असम तक कांग्रेस के अंदरूनी झगड़े में एक बात कॉमन जरूर रही है - राहुल गांधी के पंसदीदा नेता के खिलाफ दूसरे कद्दावर नेताओं का तगड़ा विरोध. असम में तो जब राहुल गांधी ने गौरव गोगोई को ज्यादा तवज्जो देना शुरू किया तो हिमंत बिस्वा सरमा ने पार्टी ही छोड़ दी और बीजेपी में जाकर कांग्रेस की जड़ें ही खोद डाली है.

हरियाणा में अशोक तंवर राहुल गांधी के पसंदीदा नेता रहे हैं और उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने की वजह भी एक ही रही. भूपिंदर हुड्डा अपने बेटे दीपेंदर हुड्डा को हरियाणा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते रहे - यही वजह रही कि पांच साल से पिता-पुत्र का विरोध प्रदर्शन बरकरार रहा. सबसे बड़ा तमाशा तो तब देखने को मिलता रहा जब दिल्ली में कांग्रेस की कोई रैली होती - दोनों गुट अलग अलग रंग की पगड़ी बांधे खुद को ताकतवर होने के तमाम सबूत पेश करता रहा.

haryana congress leaders with sonia gandhi and seljaसोनिया गांधी ने राहुल गांधी के अशोक तंवर की छुट्टी कर दी है [अशोक तंवर फोटो में पीछे सुरजेवाला और हुड्डा के बीच में हैं]

अशोक तंवर जैसे राहुल गांधी के फेवरेट रहे, ठीक वैसे ही शैलजा को सोनिया गांधी का करीबी समझा जाता है. भूपिंदर सिंह हुड्डा कई महीने तक राहुल गांधी से मिल कर अपनी बात कहना चाह रहे थे. पहले तो राहुल गांधी टालते रहे, लेकिन बाद में इस्तीफा ही दे दिया. जब सोनिया गांधी से भी मिलने का वक्त नहीं मिला और देर के साथ साथ अंधेर भी नजर आने लगा तो हुड्डा बेटे को लेकर मैदान में सीधे उतर गये. रोहतक में रैली की और साफ कर दिया कि अगर कांग्रेस ने उनकी बात नहीं सुनी तो पार्टी की कोई ताकत रोक भी नहीं पाएगी.

हुड्डा चाहते तो बीजेपी में भी अपनी बात बढ़ा सकते थे. ऐसा करके वो डीके शिवकुमार और पी. चिदंबरम जैसे किसी संभावित खतरे को भी टाल सकते थे - लेकिन ये भी तय था कि मुख्यमंत्री की कुर्सी तो हरगिज नहीं मिलती. जाहिर है सोनिया गांधी ने खुद भी स्थिति की गंभीरता को समझा होगा और गुलाम नबी आजाद और अहमद पटेल जैसे सलाहकारों ने भी अपनी ओर से सर्वोत्तम राय भी दी ही होगी.

हरियाणा कांग्रेस झगड़ा मिटाने के लिए सोनिया गांधी ने अशोक तंवर को तो हटा दिया, लेकिन कमान अपनी पंसद की कुमारी शैलजा को सौंप दिया. जैसे भी संभव हो कांग्रेस नेतृत्व के लिए ये भी जरूरी रहा कि हुड्डा को भी एडजस्ट किया जाये. बीच का रास्ता निकालते हुए हुड्डा को कांग्रेस विधायक दल का नेता बना दिया गया है. अब तक किरन चौधरी ये जिम्मेदारी संभालती रही हैं. देखा जाये तो हरियाणा में ये चार नेता ही कांग्रेस के चेहरे हुआ करते हैं. होने को तो रणदीप सिंह सुरजेवाला भी हरियाणा से ही आते हैं लेकिन वो राष्ट्रीय स्तर पर काम देखते हैं. ये बात अलग है कि कुछ दिन के लिए उन्हें जींद उपचुनाव लड़ने के लिए जरूर सूबे के भीतर भेजा गया था. हो सकता है जींद चुनाव जीते होते तो सुरजेवाला पहले से ही हरियाणा की कमान संभाल रहे होते क्योंकि वो भी राहुल गांधी के बेहद करीबी रहे हैं.

अब समझने वाली बात ये है कि हरियाणा से आगे क्या है?

क्या सोनिया गांधी के कमान संभालने का मतलब राहुल गांधी के पसंदीदा नेताओं के अच्छे दिन जाने वाले हैं?

क्या मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही बदलाव देखने को मिलेगा?

अगर बदलाव का आधार यही रहा तो क्या मध्य प्रदेश में राहुल गांधी के करीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया फिर से चूक जाएंगे?

फिर मुहाने पर सिंधिया - अब क्या होने वाला है?

मध्य प्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की लड़ाई नये आयाम लेते हुए एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंची है. मुख्यमंत्री की कुर्सी की तरह ही अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर एक बार फिर फैसला कांग्रेस नेतृत्व को ही लेना है. इस बार फर्क ये आया है कि अध्यक्ष बदल गया है.

क्या सिंधिया हरियाणा में कुमारी शैलजा की नियुक्ति से अपने लिए कोई भविष्यवाणी कर सकते हैं?

मध्य प्रदेश में कई दिनों से कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी के लिए लामबंदी तेज हो चली है. कमलनाथ और सिंधिया की लड़ाई में धीरे से दिग्विजय सिंह भी घुस आये हैं. सिंधिया तो खुद अध्यक्ष पद के दावेदार हैं लेकिन कमलनाथ और दिग्विजय सिंह अपने अपने आदमियों को कुर्सी पर बिठाने में जी जान से जुटे हुए हैं. इस बीच दिग्विजय सिंह और कमलनाथ सरकार के एक मंत्री उमंग सिंघार भिड़े हुए हैं. ये भिड़ंत भी कोई मामूली नहीं है क्योंकि उमंग ने दिग्विजय को ब्लैकमेलर नंबर 1 करार दिया है. मौके की नजाकत को देखते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी एंट्री मार ली है और उमंग का सपोर्ट करते हुए कहा है कि उनकी बातें सुनी ही जानी चाहिये. उमंग ने दिग्विजय के खिलाफ मोर्चा खोला है सरकार के काम में उनकी दखल को लेकर. असल में दिग्विजय सिंह ने पत्र लिख कर मंत्रियों से मुलाकात का वक्त मांगा था. दिग्विजय सिंह जानना चाहते थे कि जो सिफारिशें उन्होंने सरकार के मंत्रियों को भेजे हैं उनमें क्या प्रोग्रेस है. ये बात नागवार तो कई मंत्रियों को गुजरी लेकिन आगे आये उमंग सिंघार. दिग्विजय सिंह पर उमंग सिंघार ने बड़े ही गंभीर आरोप लगाये हैं. उमंग का इल्जाम है कि दिग्विजय सिंह रेत के अवैध खनन और शराब की तस्करी में भी शामिल हैं.

सिंधिया खुद को एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़े पा रहे होंगे जहां गुजरात चुनावों के बाद रहे. गुजरात चुनाव जब 2017 में खत्म हुए तो राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी संभाली और सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया. ये फैसला होते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्य प्रदेश की कमान मिलने की संभावनाएं प्रबल हो चली थीं. एक वजह ये भी रही कि झगड़ा खत्म करने के लिए राहुल गांधी ने अशोक गहलोत को दिल्ली में पार्टी का संगठन मंत्री बना दिया था. अशोक गहलोत ने जनार्दन द्विवेदी की जगह ली थी.

ऐसा लगा कि मध्य प्रदेश में भी सचिन पायलट की तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया भेजे जाएंगे और कमलनाथ दिल्ली में बने रहेंगे. मगर, हुआ उलटा. मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष कमलनाथ को बना दिया गया. जब मुख्यमंत्री बनाने की बारी आयी तो कांग्रेस नेतृत्व ने कमलनाथ को भोपाल में ही रहने दिया और अशोक गहलोत का दिल्ली से जयपुर भेज दिया.

सिंधिया दावेदार तो अब भी हैं लेकिन एक बार फिर उसी मुहाने पर पहुंच गये हैं. फिलहाल सिंधिया को महाराष्ट्र कांग्रेस की चुनाव स्क्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया है. इससे पहले सिंधिया को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था जबकि प्रियंका गांधी वाड्रा पूर्वी उत्तर प्रदेश की इंचार्ज रहीं. अब तो पूरी यूपी ही प्रियंका के हवाले है. ये भी कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दीपक बावरिया ने कांग्रेस अध्यक्ष के संभावित नामों की जो सूची पार्टी आलाकमान को भेजी है उसमें सिंधिया का नाम सबसे ऊपर है. नाम ऊपर होना कोई शर्त भी तो नहीं होती.

राहुल गांधी की राजनीति में सबसे ज्यादा जोर सिस्टम को सुधारना रहा है. सिस्टम को सुधारने के ही क्रम में राहुल गांधी ने यूथ कांग्रेस का चुनाव भी कराया था और फिर कांग्रेस में भी राज्यों के प्रभारी और अध्यक्ष बनाये थे - लेकिन व्यवस्था कहीं भी कायम नहीं रह सकी. हर जगह झगड़ा चलता रहा है. दिल्ली में शीला दीक्षित आखिरी सांस तक जूझती रहीं और एक बार फिर वहां वही हाल हो चुका है. हाल फिलहाल चर्चा रही है कि नवजोत सिंह सिद्धू को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौपी जा सकती है - लेकिन कुमारी शैलजा की नियुक्ति के हिसाब से देखें तो लगता नहीं कि ऐसा होगा. वैसे भी सिद्धू तो राहुल गांधी को ही अपना असली कैप्टन मानते हैं. राहुल गांधी के कुर्सी छोड़ते ही उनका मामला अहमद पटेल के पास भेज दिया गया और फिर वही हुआ जो कांग्रेस नेताओं के अनुसार होता आया है. सिद्धू निपट गये.

हरियाणा में हुड्डा की ट्रिक तो काफी हद तक कामयाब रही, लेकिन मध्य प्रदेश में क्या होगा. सिंधिया तो राहुल गांधी के सबसे अच्छे दोस्त रहे हैं, सड़क से संसद तक. फैसला सोनिया गांधी को करना है - सिंधिया ने दिग्विजय सिंह के खिलाफ खुली जंग भी छेड़ दी है. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पुरानी खिलाड़ी ही नहीं, एक ही गुट के हिस्सेदार रहे हैं. दिल्ली में कमलनाथ तो भोपाल में दिग्विजय सिंह ने बरसों से अपनी अपनी हिस्सेदारी बांट रखी थी. मध्य प्रदेश की इस जोड़ी से ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया भी लंबे वक्त तक परेशान और जूझते रहे - क्या जूनियर सिंधिया पिता का बदला ले पाएंगे या फिर खामोशी अख्तियार कर राहुल गांधी के लौटने का इंतजार करना पड़ेगा?

इन्हें भी पढ़ें :

हुड्डा गलत टाइम पर कैप्टन की कॉपी कर रहे हैं - नाकाम ही होंगे

कांग्रेस में बदले शक्ति केंद्र में कमलनाथ के आगे कब तक टिकेंगे सिंधिया

सोनिया गांधी के फ्रंट पर आते ही राहुल वाली गलती दिग्विजय दोहराने लगे

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय