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Updated: 02 सितम्बर, 2019 08:11 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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दिग्विजय सिंह के सामने पहला टास्क तो मध्य प्रदेश कांग्रेस के लिए ऐसे अध्यक्ष की नियुक्ति करानी है जो उनकी भी हां में हां मिलाने वाला हो. ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ की लड़ाई में दिग्विजय सिंह भी एक पार्टी बन कर पहले ही घुसपैठ कर चुके हैं. दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ सरकरार के मंत्रियों से मुलाकात का वक्त भी मांगा है क्योंकि वो जानना चाहते हैं कि उनकी सिफारिशों पर कुछ हुआ भी है या नहीं?

2017 में जगोवा के प्रभारी रहते दिग्विजय जब कांग्रेस की सरकार बनवाने से चूक गये तो हाशिये पर भेज दिये गये - लेकिन नर्मदा परिक्रमा के बाद रिचार्ज होकर लौटे और 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत में महती भूमिका निभायी. अब जबकि सोनिया गांधी फिर से ड्राइविंग सीट संभाल चुकी हैं, दिग्विजय सिंह फिर से एक्टिव हो गये हैं - लेकिन मुश्किल ये है कि रास्ता वही अख्तियार कर रहे हैं जिस पर लगातार दौड़ते रहने के बावजूद राहुल गांधी रेस हार गये और फिर मैदान भी छोड़ दिया.

विरोध में दीवार से सिर नहीं टकराया करते हैं

काफी दिनों से कांग्रेस के विरोध का तरीका कुछ कुछ ऐसा जैसे को दीवार से गुस्सा होकर कोई खुद का ही सिर टकराने लगे. कांग्रेस नेतृत्व के विरोध का तरीका भी वैसा ही हो रहा है जो पलट कर उसी को जख्मी कर देता है.

आम चुनाव में राहुल गांधी का सबसे बड़ा स्लोगन इसका बेहतरीन नमूना है - 'चौकीदार चोर है'. हालांकि, राहुल गांधी अब भी अपने स्टैंड पर कायम हैं. अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा सार्वजनिक करते हुए भी राहुल गांधी ने ये बात दोहरायी थी.

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के निशाने पर अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ रहा करता है. उनके ताजा बयान में टारगेट थोड़ा बदला हुआ है. दिग्विजय सिंह ने बीजेपी और बजरंग दल को निशाना बनाया है.

digvijay sing attacks bjp कांग्रेस दिग्विजय सिंह की लाइन से चलेगी या जयराम रमेश और शशि थरूर वाली राजनीतिक राह अपनाएंगी?

दिग्विजय सिंह ने कहा है कि मुसलमानों से ज्यादा गैर-मुसलमान आईएसआई के लिए जासूसी कर रहे हैं. आईएसआई पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी है जो जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजों के लिए फंडिंग भी करती रही है - और कई अलगाववादी नेता NIA की गिरफ्त में आये हैं. आईएसआई किस तरह से भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए फंडिंग करती है स्टिंग ऑपरेशनों के जरिये भी सामने आ चुका है. आज तक के ताजा स्टिंग ऑपरेशन में भी आईएसआई एजेंट नजीर अहमद ने एक होटल में खुफिया एजेंसी के कारनामों की कहानी डिटेल में समझायी है.

दिग्विजय सिंह का ताजातरीन आरोप है कि बीजेपी और बजरंग दल ISI से पैसा लेते हैं. दिग्विजय सिंह का ये भी दावा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लिए मुसलमान कम गैर मुसलमान ज्यादा जासूसी कर रहे हैं.

दिग्विजय सिंह की ये बातें बिलकुल वैसी ही हैं जैसे राहुल गांधी पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक पर 'खून की दलाली' और जम्मू-कश्मीर में धारा 370 हटाये जाने के केंद्र की मोदी सरकार के फैसले को 'राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा' बताते हैं. कश्मीर के मौजूदा हालात पर राहुल गांधी के बयान को पाकिस्तान सरकार ने संयुक्त राष्ट्र को भेजे पत्र में भी उद्धृत किया था - और नतीजा ये हुआ कि न सिर्फ राहुल गांधी बल्कि कांग्रेस के दूसरे नेताओं और प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला को कई बार मीडिया में आकर सफाई देनी पड़ी.

टारगेट से पहले सही हथियार चुनना ज्यादा जरूरी होता है

बेशक निशाना पक्का होना ही चाहिये. अगर निशाना पक्का नहीं है तो सारे हथियार और गोला बारूद बेकार चले जाएंगे - लेकिन निशाना चुन लेने भर से काम पूरा नहीं हो जाता. सही हथियार भी सेलेक्ट करने होते हैं. किस मौके के लिए कौन सा हथियार काम आ सकता है इसकी समझ बेहद जरूरी हो जाती है. अफसोस की बात है कि कांग्रेस में एक ही तरीके की गलती ज्यादातर नेता करते आ रहे हैं - और ख्वाब देखते हैं कि बीजेपी वायरल होते विस्तार को एक झटके में गले मिलकर और फिर आंख मार कर समेट देंगे.

NRC ऐसा मुद्दा है जो बीजेपी के लिए भी कुछ जगह गले की हड्डी बना हुआ है. असम में बीजेपी के मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को वोट बैंक की चिंता खाये जा रही है. हिमंत सरमा को इस बात की परवाह नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह इसे लागू करने की बात भर से वोट बटोर लेने की खुशी महसूस कर रहे हैं - क्योंकि उनके सामने तो पश्चिम बंगाल जीत कर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ परिवर्तन लाना है.

दिल्ली में तो खुद की कुर्सी डोलते देख मनोज तिवारी NRC लागू करने के लिए आवाज देने लगे हैं. ये दिल्ली बीजेपी के चुनावी एजेंडे का हिस्सा भी होने वाला है. केंद्रीय नेतृत्व इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अमल बता रहा है - और क्षेत्रीय नेता विरोध में सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह रहे हैं.

अच्छा तो ये होता कि कांग्रेस के नेता चाहे वो दिग्विजय सिंह हों या फिर राहुल गांधी लोगों को इसके बारे में बताते. आखिर राहुल गांधी वायनाड जाकर भी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बाढ़ पीड़ितों की मदद की बात ही कर रहे हैं. बेहतर तो ये होता कि राहुल गांधी जम्मू-कश्मीर की नाकाम कवायद और केरल की जगह असम पहुंच गये होते - कम से कम लोगों की समस्याएं तो समझ सकते थे और फिर उनकी आवाज बन सकते थे.

मोदी सरकार फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था को लेकर मुश्किल दौर से गुजर रही है. बार बार मीडिया के सामने आकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को देश की जनता को भरोसा दिलाना पड़ रहा है कि सब ठीक ठीक है. अर्थव्यवस्था सुधारने के तमाम उपाय अपनाये जा रहे हैं.

कांग्रेस के हमलावर अर्थशास्त्री पी. चिदंबरम तो खुद ही फंसे हैं, ऐसे में ले देकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से ही आस है. मजबूरी में वो सामने आ भी रहे हैं, लेकिन जब से प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में रेनकोट पहन कर नहाने की संज्ञा दे डाली है, वो भी फिर से खामोशी अख्तियार कर लिए हैं. एक वजह तो संसदीय राजनीति से अचानक कुछ देर के लिए रिश्ता खत्म हो जाना रहा - हालांकि, अब वो राजस्थान से राज्य सभा फिर से पहुंच चुके हैं.

ऐसा भी नहीं है कि दिग्विजय सिंह ने देश की अर्थव्यवस्था का मुद्दा नहीं उठाया है, लेकिन आईएसआई और बीजेपी के रिश्तों का दावा कर अपने ही हमले की धार कुंद कर ली. ठीक वैसे ही जैसे सोनभद्र पहुंच कर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने नरसंहार के साथ साथ धारा 370 पर भी साउंडबाइट दे डाला था.

दिग्विजय सिंह के साथ भी प्रियंका गांधी वाला ही 'हुआ तो हुआ' हो गया, अर्थव्यवस्था की बात पीछे रह गयी और आईएसआई वाला बयान हेडलाइन बन गया. राजनीति में इसे मीडिया मैनेजमेंट का हुनर माना जाता है, जिसमें बीजेपी नेतृत्व सबसे ज्यादा माहिर माना जाता है.

दिग्विजय सिंह का बीजेपी और बजरंग को आईएसआई की कमीशनखोरी के आरोपों से घेरना भी बहुत हद तक राहुल गांधी के प्रधानमंत्री मोदी के लिए 'चौकीदार चोर है' वाले नारे लगाने जैसा ही है. जब राहुल गांधी 'चौकीदार चोर है' का महामृत्युंजय मंत्र की तरह जाप करना भी कांग्रेस की आम चुनाव में हार से छुटकारना नहीं दिला सका तो दिग्विजय सिंह की क्या मंशा है?

दिग्विजय सिंह की ये बात सुन कर सोनिया गांधी खुश होंगी? राहुल गांधी खुश होंगे? प्रियंका गांधी वाड्रा खुश होंगी?

अगर दिग्विजय सिंह ये सोच कर ऐसे बयान दे रहे हैं कि कांग्रेस नेतृत्व, जो इस वक्त सोनिया गांधी के हाथ में है, इससे खुश होगा - फिर तो कोई बात नहीं. वैसे भी दिग्विजय सिंह फिलहाल तो इसी मिशन में जुटे हैं कि मध्य प्रदेश का कांग्रेस अध्यक्ष उनका अपना आदमी हो जाये. अगर पूरी तरह अपना न हो तो आधा ही सही, कमलनाथ खेमे का ही हो जाये, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया तो हरगिज न हों. लेकिन अगर दिग्विजय सिंह कांग्रेस से प्यार करते हैं तो ऐसे बयान पार्टी की जड़ें ही खोद रहे हैं. बीजेपी का समर्थक दिग्विजय सिंह से ऐसी कोई नसीहत कभी नहीं लेगा जो सुनते ही सिर्फ राजनीतिक वजहों से लगाये गये आरोप लगते हों - वो भी उन दिग्विजय सिंह की ओर से जिनके जबान से हमेशा 'ओसामाजी' और 'हाफिज सईद' और 'भारत अधिकृत कश्मीर' जैसे जुमले बहुतायत में बरसते रहते हों.

बीजेपी के समर्थकों को कांग्रेस नेतृत्व ऐसा करके अपनी तरफ कभी नहीं खींच सकता, हां, खुद को कन्फ्यूज करने का ये ख्याल अच्छा जरूर है. राहुल गांधी बीजेपी को सांप्रदायिक बताते हैं और फिर खुद को असली हिंदू जनेऊधारी शिवभक्त साबित करने में जुट जाते हैं - ऊपर से ये भी बताते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को हिंदू धर्म की समझ ही नहीं है.

कांग्रेस के ही कई सीनियर नेता पार्टी नेतृत्व को बार बार सलाह दे रहे हैं कि वो मोदी को खलनायक बताने से बचें, तभी वो दिन कभी आ सकता है जब लोग उनकी बातों पर यकीन करने की सोचें.

संघ खेमे के बुद्धिजीवी और पांचजन्य के पूर्व संपादक शेषाद्री चारी द प्रिंट में लिखते हैं - 'कांग्रेस में ये आम राय दिखती है कि महज विरोध के लिए मोदी की आलोचना करना नुकसानदेह है. हालांकि शशि थरूर जैसे कुछ नेताओं को अपने रुख पर सफाई देने के लिए कहा गया है, क्योंकि बहुत से कांग्रेसी उनके बयानों को मोदी और उनके नेतृत्व के समर्थन के तौर पर देखते हैं.'

शेषाद्री चारी कांग्रेस नेताओं की बात को काफी गंभीरत से ले रहे हैं और बीजेपी को साथ ही साथ आगाह भी कर रहे हैं, 'इन परिस्थितियों में, भाजपा को ये तय करना है कि वह इसी तरह के जाल में फंसने से खुद को कैसे बचाती है. जब राहुल गांधी की बातों को खुद उनकी पार्टी में ही ज़्यादा महत्व नहीं दिया जाता दिखता हो, तो ऐसे में कांग्रेस नेता को खलनायक साबित करने के प्रयास उनके राजनीतिक करिअर में नई जान फूंकने का ही काम करेंगे.

अब कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में फिर से आ चुकी है. सोनिया गांधी को सबसे पहले तो यही समझना होगा कि उन्हें दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं की राजनीति पसंद है या फिर जयराम रमेश, अभिषेक मनु सिंघवी और शशि थरूर जैसे नेताओं की?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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