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Updated: 17 दिसम्बर, 2018 08:11 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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लोगों को राजनीति में इतनी कड़वाहट देखने को मिलती है कि यदि उसका कोई उजला पक्ष सामने आता भी है तो एक पल को भरोसा नहीं होता. हम किसी भी पार्टी के नेता को देखने और सुनने के बाद अपनी धारणा बनाने में इतनी जल्दबाजी करते हैं कि काफी कुछ नजरअंदाज कर देते हैं. हाल ही में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने एक-दूसरे के खिलाफ जमकर आरोप लगाए. नतीजे में भाजपा हार गई और कांग्रेस जीत गई. फिर तस्‍वीर बदली. नतीजे आने के बाद कमलनाथ और शिवराज जिस तरह आपस में मिले, उन्‍होंने भाजपा-कांग्रेस की प्रतिद्वंद्विता को पीछे छोड़ दिया.

शिवराज सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमल नाथ, मध्य प्रदेशकमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में जो नजारा दिखा, उसने सबको चौंका दिया.

वीडियो हो रहा है वायरल

कमलनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे शिवराज सिंह चौहान ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया का हाथ उठाते हुए उन्हें बधाई दी. देखने वाले हैरान रह गए. सोशल मीडिया पर इसका वीडियो तेजी से वायरल होने लगा. कोई शिवराज चौहान की तारीफ ये कहते हुए कर रहा है कि उन्हें 'मामा' इसीलिए कहते हैं, क्योंकि वे सबको परिवार मानते हैं और राजनीति में दुश्मनी को स्‍थान नहीं देते. जबकि कुछ लोग कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के तारीफों के पुल बांध रहे हैं.

शिवराज सिंह चौहान, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की तस्‍वीरें देखकर हैरान हो रहे लोगों को अतीत की कुछ तस्‍वीरों को एक बार फिर पलटना चाहिए. इससे यह समझा जा सकेगा कि नेताओं के लिए वोट हासिल करने से पहले जो 'दुश्‍मन' होते हैं, वो नतीजे आने के बाद दोस्‍त भी बन जाते हैं. कमलनाथ के साथ शिवराज को देखकर हैरान न हों, बल्कि ये समझें कि ऐसा क्यों है. राजनीति में भले ही पार्टियां एक दूसरे पर कितना भी कीचड़ उछालें, लेकिन एक-दूसरे का सम्मान करना भी उन्हें बखूबी आता है. जब कभी वे मिलते हैं तो भले ही दोस्त की तरह ना मिलें, लेकिन आंखों में दुश्मनी का कोई भाव नहीं होता है. ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है.

(वीडियो) सालभर पहले भी जब शिवराज और कमलनाथ मिले थे, तो...

त्रिपुरा में मोदी और मानिक सरकार का शिष्टाचार सबने देखा था

18 फरवरी 2018 को त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव हुए थे. इस चुनाव से पहले आपने रैलियों में पीएम मोदी को माणिक सरकार पर निशाना साधते हुए देखा होगा. वह साफ कहते थे कि अब त्रिपुरा को माणिक नहीं हीरा चाहिए. वह कहते थे कि त्रिपुरा के लोगों ने गलत माणिक पहना हुआ है. हीरा से उनका मतलब हाईवे, आईवे, रोडवे और एयरवे से था. 3 मार्च 2018 को नतीजे आए. 20 साल सत्‍ता में रहने वाली कम्‍युनिस्‍ट नेता माणिक सरकार की सरकार हार गई. बिप्‍लब देब के शपथ ग्रहण समारोह में माणिक सरकार को आमंत्रित करने के लिए पीएम मोदी ने राम माधव को व्यक्तिगत तौर पर भेजा. जब शपथ ग्रहण के बाद माणिक सरकार जाने लगे तो पीएम मोदी खुद उन्हें स्टेज से नीचे तक छोड़कर आए. कुछ दिन पहले तक दोनों में एक दुश्मनी देखने को मिल रही थी, लेकिन शपथ ग्रहण के मंच पर दिखा नजारा वो दूसरा पहलू है, जिसे हम नहीं देखते.

बिप्लब देब ने छुए माणिक सरकार के पैर

ये नजारा भी त्रिपुरा का ही है, जब बिप्लब देव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उन्होंने अपने भाषण में कहा कि सरकार चलाने के लिए उन्हें सहयोग चाहिए, अगर कोई गलती हो तो कान पकड़कर ठीक करवाइएगा. अपना भाषण खत्म करते ही सबके पहले उन्होंने पीएम मोदी के पैर छुए, अमित शाह का अभिवादन किया और फिर अपने विरोधी माणिक सरकार के भी पैर छुए.

जयललिता के धुर विरोधी हुए इमोशनल

जब भी दक्षिण भारत में धुर विरोधी नेताओं की बात होती है तो जयललिता और करुणानिधि का जिक्र जरूर होता है. तमिलनाडु में अन्य राज्यों की तरह एक मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता मंच साझा नहीं करते थे. जयललिता पर किताब लिखने वाली लेखिका वसंती कहती हैं कि वो दोनों न सिर्फ एक दूसरे को नापसंद करते थे, बल्कि एक दूसरे से नफरत करते थे. जब करुणानिधि सत्ता में थे तो उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों में जयललिता को जेल भेजा. इसके बाद जब सत्ता जयललिता के हाथ आई तो उन्होंने करुणानिधि को आधी रात को उनके घर से गिरफ्तार करवा लिया. इतने बड़े दुश्मन होने के बावजूद जब जयललिता की मौत हुई थी, तो उनके अंतिम संस्कार में करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन भी पहुंचे थे. वहां उन्होंने एक इमोशनल स्पीच भी दी और जयललिता का आयरन लेडी कहते हुए कहा कि उनकी जगह कोई नहीं ले सकता.

शिवराज सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमल नाथ, मध्य प्रदेशजयललिता के अंतिम संस्कार में करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन भी पहुंचे थे.

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तो होते ही हैं, लेकिन जब कभी इन नेताओं को एक दूसरे से मिलने का मौका मिलता है तो वे सामने वाले नेता को पूरा सम्मान देते हैं. ये बात सभी नेता समझते हैं कि सत्ता आज उनके हाथ है तो कल किसी और के हाथ जाएगी. अगर हर पार्टी दूसरी पार्टी के नेताओं से दुश्मनी निकालने बैठ जाएगी तो एक तो वह जनता पर ध्यान नहीं दे पाएंगे और दूसरा ये कि इससे नुकसान भी उन्हीं का होगा. क्योंकि ये पब्लिक है, सब जानती है. अगर जनता रातोंरात सत्ता का ताज पहना सकती है तो पलक झपके ही कुर्सी से गिरा भी सकती है. दिलचस्‍प ये है कि तमाम विरोधों के बावजूद नेता आपस में संबंध मधुर बनाए रखते हैं, लेकिन उनको फॉलो करने वाली बड़ी आबादी भावना में बहकर उतावली रहती है. चुनाव के पहले हो या नतीजे के बाद, सोशल मीडिया पर नेताओं के मामूली उकसावे पर ट्रोलिंग शुरू हो जाती है. यदि अगली बार दो नेताओं के बीच हुई बहस से आपके मन में कोई कड़वाहट आए, तो एक बार ठहर जाइए. याद रखिए, पर्दे के पीछे नेताओं के आपसी रिश्‍ते तो मधुर ही हैं.

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