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Updated: 23 दिसम्बर, 2021 05:50 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) चाहते हैं कि चुनावी इंतजाम पूरे चाक चौबंद हों - और कहीं भी किसी भी कदम पर कोई चूक न हो. पहले भले ही किसी को न लगा हो, लेकिन लगता है जब छोटे दलों के साथ वो चुनावी गठबंधन की बात कर रहे थे, चाचा शिवपाल यादव (Shivpal Yadav) की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का भी ख्याल जरूर रहा होगा.

अब तो अखिलेश यादव ने समाजावादी पार्टी (Samajwadi Party) और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के बीच हुए चुनावी गठबंधन की भी घोषणा चुके हैं, लेकिन शिवपाल यादव बता रहे हैं कि सीटों के बंटवारे पर अभी फैसला नहीं हुआ है, लेकिन जिस अंदाज में बता रहे हैं ये तो बिलकुल नहीं लगता कि वो भी गठबंधन की ही तरह हंसते मुस्कुराते अगली मुलाकात में दोनों मिल कर फाइनल कर लेंगे.

पांच साल बाद हुई मुलाकात में सबसे सकारात्मक बात यही है कि शिवपाल यादव ने अब अखिलेश यादव को नया 'नेताजी' मान लिया है. वैसे तो जो लोग भी राजनीति में होते उनके घर परिवार वाले या पास पड़ोस वाले नेताजी कह कर ही बुलाया करते हैं, लेकिन पूरा परिवार राजनीति में होने के बावजूद समाजवादी पार्टी में नेताजी सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही कहे जाते हैं.

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव के परिवार में झगड़ा भी इसी बात को लेकर हुआ था क्योंकि मुलायम सिंह को छोड़ कर शिवपाल यादव किसी और को नेताजी मानने तो तैयार नहीं थे. समाजवादी पार्टी में दूसरा नेताजी तो वही कहलाता जिसे मुलायम सिंह यादव अपनी राजनीतिक विरासत सौंपते.

बेशक शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव को नया 'नेताजी' तो मान लिया है, लेकिन वो ये नहीं भूल पा रहे या फिर अखिलेश यादव को भी नहीं भूलने देना चाहते कि भतीजे ने ट्रेनिंग तो चाचा से ही ली है - और समाजवादी पार्टी को खड़ा करने वाले भी शिवपाल यादव ही हैं.

ये तो साफ तौर पर नजर आ रहा है कि पांच साल में ही शिवपाल यादव अखिलेश यादव के सामने हथियार डाल चुके हैं. आज तक के साथ इंटरव्यू में शिवपाल यादव के तेवर देख कर एक सवाल अपनेआप खड़ा हो रहा है - कहीं पांच साल पुराने जख्म कोई नयी तकलीफ तो नहीं देने वाले हैं?

शिवपाल के इरादे नेक तो हैं?

ऐसा तो कभी नहीं लगा कि शिवपाल यादव, मुलायम सिंह के बाद खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते हों. ऐसा भी नहीं होगा कि कभी ऐसे सपने उनके मन में आये ही न हों, लेकिन इतना जरूर था कि समाजवादी पार्टी में एक पावर सेंटर बने रहना वो जरूर चाहते थे.

शिवपाल यादव क्या करने वाले हैं: मुख्यमंत्री तो वो 2012 में भी मुलायम सिंह यादव के बनने के पक्ष में ही थे. ऐसा सोचने वाले भी मुलायम सिंह यादव कोई अकेले नेता नहीं थे. शिवपाल यादव के अलावा आपस में जानी दुश्मन बने रहने वाले मोहम्मद आजम खां और अमर सिंह दोनों ही चाहते थे कि मुलायम सिंह यादव के अलावा कोई और मुख्यमंत्री न बने.

akhilesh yadav, shivpal yadavहाथ तो मिला लिये, लेकिन मन में टीस अभी बाकी है!

ये सिर्फ असुरक्षा की ही भावना नहीं थी. आंखों के सामने बड़े हुए किसी बच्चे के पीछे चलने को तैयार होना आसान नहीं होता, अगर वो अपनी औलाद न हो. जिस बात से मुलायम सिंह यादव खुशी महसूस कर रहे थे, बाकियों के लिए सबसे बड़ा टेंशन भी वही था.

हाथ तो मिला लिये, लेकिन मन में टीस अभी बाकी है!

हो सकता है मुलायम सिंह यादव ने पहले से ही तय कर लिया हो, या फिर उनको लगा हो कि 2012 के चुनावों के लिए अखिलेश यादव ने खूब मेहनत की थी - वो अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने पर वो सहमति जता दिये तो फिर सारी किंतु-परंतु भी एक झटके में खत्म हो गये.

कुछ ही दिन बीते थे कि तत्कालीन विपक्षी पार्टियां यूपी में साढ़े चार सीएम होने की बातें करने लगीं - मजे की बात ये रही कि उसमें आधे सीएम अखिलेश यादव को ही माना जाता रहा. शिवपाल एंड कंपनी को जिस बात का डर था, वही हुआ. 2017 का अगला चुनाव आने से पहले ही झगड़ा शुरू हो गया - और एक बार शुरू हुआ तो आर पार होकर ही दम लिया.

मुख्यमंत्री बनने की कौन कहे, अखिलेश यादव ने पूरी ताकत और पिता के आशीर्वाद से लड़ाई लड़ी और चुनाव आयोग ने उनको ही समाजवादी पार्टी का नेता माना. ऐसे कई मोड़ भी आये जब शिवपाल यादव को लगा कि बेटे जितना नहीं तो थोड़ा बहुत प्यार मुलायम सिंह यादव को भाई पर भी आएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उनकी तरफ से चुनाव आयोग में कोई आपत्ति तक नहीं जतायी गयी. अखिलेश यादव का सर्वेसर्वा कब्जा हो गया और शिवपाल यादव पहले हाशिये पर, फिर बाहर हो गया.

मुलायम सिंह बीच बीच में ऐसा आशंका जरूर जताते रहे कि पार्टी टूट जाएगी. मालूम नहीं ये बातें वो अखिलेश यादव को समझाने के लिए कह रहे थे या फिर शिवपाल यादव को गुमराह करने के लिए?

बहरहाल, जैसे तैसे पांच साल बीते और घूमते फिरते एक दिन अखिलेश यादव घर से निकले और सीधे चाचा के साथ चाय पीने पहुंच गये. चाचा भी चाय नाश्ते के बाद सीढ़ियों तक छोड़ गये. गठबंधन की घोषणा भी हो गयी, लेकिन आगे की राह काफी मुश्किल और संशय भरी लग रही है.

अखिलेश को बुलाया नहीं था: आज तक के साथ एक इंटरव्यू में शिवपाल यादव ने साफ साफ दावा किया है कि वो अखिलेश यादव को बुलाये नहीं थे. हां, ये जरूर मानते हैं कि मुलाकात से पहले दोनों की फोन पर बात जरूर हुई थी. ये भी बता रहे हैं कि अखिलेश यादव के आने पर पूरा परिवार साथ बैठा था. बातें भी सबने की. चाय-नाश्ता भी हुआ.

कहने का मतलब तो यही हुआ कि अखिलेश यादव खुद चल कर शिवपाल यादव के दरवाजे तक पहुंचे थे. मतलब ये भी पहल अखिलेश यादव की तरफ से ही हुई, शिवपाल यादव की तरफ से नहीं - तो क्या शिवपाल यादव ये जताने की कोशिश कर रहे हैं कि वो न तो झुके हैं, न टूटे हैं और न ही उनके तेवर कम हुए हैं.

अखिलेश के ट्रेनर हैं: बातचीत में शिवपाल यादव ये तो मानते हैं कि अखिलेश यादव राजनीति में परफेक्शन हासिल कर चुके हैं, लेकिन लगे हाथ याद दिलाना नहीं भूलते कि उनका ट्रेनर कौन है - "ट्रेनिंग तो हम ही दिये थे... अब वो परफेक्ट हो गये हैं."

नेताजी के बाद कौन: अखिलेश यादव को शिवपाल यादव ये याद दिलाना भी नहीं भूलते कि मुलायम सिंह के बाद अगर समाजवादी पार्टी के लिए किसी ने कुछ किया है तो वो खुद ही है. ये हक भी वैसे ही जता रहे हैं, जैसे लगता है पूछ रहे हों - 'अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी के लिए किया ही क्या है? पहले मुख्यमंत्री और फिर समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष बन जाने के सिवाय.'

हंसते मुस्कुराते शिवपाल यादव बड़े आराम से बता जाते हैं कि अपनी जिंदगी के 40-45 साल वो समाजवादी पार्टी को दिये हैं. समाजवादी पार्टी को खड़ा करने वाले भी वहीं है, लेकिन अखिलेश को आगाह करते वक्त भी भाई को आदर देना नहीं भूलते - नेताजी के बाद.

सीटों के बंटवारे को लेकर सवाल होता है तो कहते हैं, 'सबको हम ही तो आगे बढ़ाये हैं. सब तो हमारे ही हैं. नेताजी के बाद हम ही तो थे.' मतलब, सबको नेता बनाने वाले भी तो वही हैं. अखिलेश यादव को भी.

सलाह तो देंगे ही: जाहिर है समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष और प्रगतिशील समाजवादी पार्टी गठबंधन में बड़े नेता होने के नाते जो भी फैसला होगा आखिरी बात पूर्व मुख्यमंत्री की ही होगी. शिवपाल यादव को ये भी मंजूर है, लेकिन वो सलाह भी देंगे.

सलाह देने की बात करते वक्त भी शिवपाल यादव का लहजा वैसा ही है जैसे नहीं मांगे जाने पर भी वो सलाह तो देंगे ही. ऐसे भी समझ सकते हैं कि परफेक्ट हो जाने के बाद भी शिवपाल यादव को लगता है कि अभी अखिलेश यादव को कदम कदम पर सलाहियत की जरूरत है - तभी बीजेपी को सत्ता से बाहर किया जा सकेगा.

चाचा नाराज हुए तो भतीजा क्या करेगा?

शिवपाल यादव की बातों से तो ऐसा लगता है जैसे वो अखिलेश यादव को नेता भी मान लिये हों, गठबंधन भी पक्का हो गया है - और उनका हर फैसला भी आखिरी और मंजूर होगा, लेकिन बाकी चीजें वो आसानी से नहीं मानने वाले.

सारी बातें अपनी जगह हैं, लेकिन सीटों का बंटवारा कहीं से भी आसान नहीं लगता है. सवाल ये है कि अगर समाजवादी पार्टी में सब को शिवपाल यादव अपना मानते हैं तो किसके लिए टिकट मांगेंगे और किसकी राह का रोड़ा बनेंगे?

बैठकों का लंबा दौर चलेगा: अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी, ओम प्रकाश राजभर जैसे गठबंधन साथियों के लिए जितनी भी सीटें सोच रखे हों, लेकिन शिवपाल यादव भी उतने में ही मान जाएंगे, ऐसा तो नहीं लगता.

शिवपाल यादव के मुताबिक, गठबंधन की सीटों पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है. अगर किसी को ऐसा लगता है कि जब गठबंधन पक्का हो गया तो सीटों पर भी समझौता हो ही जाएगा. अगर अखिलेश यादव भी ऐसा ही सोचते हैं, सही नहीं सोच रहे हैं.

और ये सारी चीजें शिवपाल यादव खुद ही साफ कर देते हैं, 'अभी तो दूसरी बैठक होगी... तीसरी बैठक होगी - फिर तय होगा.'

उम्मीदवारों की सूची लंबी है: शिवपाल यादव बताते हैं कि गठबंधन फाइनल होने के दौरान ही उनके हिस्से की सीटों और उम्मीदवारों पर भी बात हुई है, लेकिन उस पर आखिरी फैसला चुनाव की तारीखें आने के बाद लिया जाएगा.

ये पूछे जाने पर कि अखिलेश यादव के साथ बातचीत में उम्मीदवारों को लेकर उनकी क्या डिमांड रही, शिवपाल यादव बताते हैं कि अपनी तरफ से वो साफ कर चुके हैं, 'जीतने वाले जितने लोग हैं... टिकट दे दें' - और अपनी तरफ से ये जोड़ भी देते हैं, 'वो तैयार हैं.'

सबसे मुश्किल तो यही लगता है कि जीतने वाले कितने होंगे - और वे जीत ही रहे हैं उसका आधार क्या होगा?

शिवपाल यादव बार बार जोर देकर कह रहे हैं कि उनकी पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय नहीं होनेवाला. ये तो अखिलेश यादव को भी पता है कि चाचा की कार्यशैली कैसी रही है. वो ये भी जानते हैं कि चाचा राजनीति के माहिर खिलाड़ी रहे हैं. संगठन में नेताओं और कार्यकर्ताओं से जब मिलना जुलना होगा तो वो अपने अनुभव और राजनीतिक हुनर का भरपूर इस्तेमाल भी करेंगे. जाहिर है ये सब सोच समझ कर ही अखिलेश यादव बिना बुलाये भी चाचा शिवपाल यादव के घर पहुंचे थे - लेकिन क्या भतीजे ने ये भी सोच रखा है कि चाचा ने नये सिरे से अंगड़ाई ली तो आगे की लड़ाई कैसे पूरी कर पाएंगे?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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