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Updated: 09 जुलाई, 2022 09:27 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) अब भी मन की बात ही करते फिर रहे हैं. बीती बातें लगता है इस कदर हावी हैं कि छोड़ने का नाम ही नहीं लेते. ये सब तभी अच्छा लगता है जब सत्ता की कमान हाथ में हो. अब तो हाल ये है कि शिवसेना जैसी पार्टी पर भी पकड़ काफी ढीली हो चुकी है.

महाराष्ट्र से रोज ही शिवसेना (Shiv Sena) नेताओं और कार्यकर्ताओं के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) के खेमे में चले जाने की खबरें आ रही हैं. छोड़ने वालों की तादाद भी कोई आधी अधूरी नहीं है, बल्कि मुट्ठी भर लोगों को छोड़ बाकी एक साथ पाला बदल ले रहे हैं - और ये हाल पार्षदों का ही नहीं, लोक सभा के सांसदों के मन में भी ऐसी ही उधेड़बुन चल रही है.

और ये सब स्वाभाविक भी है. एक तरफ सत्ता है, दूसरी तरफ कोई उम्मीद की किरण भी नहीं दिखायी पड़ रही है. हिंदुत्व के दबदबे वाली राजनीति में उद्धव ठाकरे पहले ही मिसफिट हो चुके हैं - और अब न तो सरकार है, न ही इतने विधायकों का सपोर्ट ही कि कहीं किसी से कोई बारगेन ही कर सकें.

लेकिन उद्धव ठाकरे के रवैये में अब तक कोई भी बदलाव देखने को नहीं मिला है. अब भी वो इमोशनल भाषण दिये जा रहे हैं. बीच बीच में अब भी वो अपने अंदाज में धमकाने की कोशिश कर रहे हैं - और मालूम नहीं किस भरोसे दिलासा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि शिवसेना का चुनाव निशान उनसे कोई नहीं ले सकता.

ऐसे दावों के पीछे न तो कोई मजबूत दलील है, न कहीं वे आधार जिससे लगे कि चीजों को वो वाकई दुरूस्त करने को लेकर गंभीर हैं - आखिर घर परिवार और बेटे की दुहाई देकर उद्धव ठाकरे कब तक अपना और बचे खुचे समर्थकों का मन बहला सकते हैं?

ये तो इमोशनल अत्याचार है

उद्धव ठाकरे की ये बात तो बिलकुल वाजिब है, 'मैं वास्तव में अपने 14 विधायकों को धन्यवाद देना चाहता हूं जिन्हें कई धमकियां मिलीं, लेकिन उन्होंने मेरा साथ नहीं छोड़ा... जिस तरफ इस तरह के साहसी लोग होंगे, उनकी जीत होगी... सच्चाई की जीत होगी.' बेशक, लेकिन इस बात पर कायम रहने के बजाय वो जल्दी ही भटक जाते हैं.

शिवसेना से बगावत के शुरुआती दौर में जब एकनाथ शिंदे खेमे के विधायकों ने कहना शुरू किया कि वे बाल ठाकरे के बताये रास्ते पर चल रहे हैं और असल मायने में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. ये सुनने के बाद तो शिवसेना सांसद संजय राउत तो जैसे आपे से बाहर ही हो गये थे.

तब संजय राउत ने कहा था, 'जो लोग हमें छोड़कर गए हैं वे लोग शिवसेना के नाम पर वोट न मांगें... अगर मांगना है तो अपने बाप के नाम पर वोट मांगें... शिवसेना के बाप, हमारे बाप यानी बालासाहेब ठाकरे के नाम पर वोट ना मांगें... अपने बाप के नाम पर वोट मांग लो.'

uddhav thackeray, eknath shindeउद्धव ठाकरे को एकनाथ शिंदे के मुकाबले असरदार बने रहने के लिए नये तरीके खोजने होंगे

संजय राउत के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोग ट्रोल करने लगे थे, फिर भी संजय राउत मैदान में डटे रहे. तब ऐसा लगता था कि संजय राउत ये सब अपने मन से कह रहे हैं और उद्धव ठाकरे का ऐसी बातों से कोई लेना देना नहीं होगा, लेकिन अब तो ऐसा लग रहा है जैसे जबान ही संजय राउत की रही, शब्द तो उद्धव ठाकरे ने दिये थे. फर्क बस ये रहा कि संजय राउत के मुंह से निकलते निकलते उद्धव ठाकरे के शब्दों के स्टैंडर्ड का लेवल थोड़ा कम हो जाता रहा.

थोड़ी देर बाद ही उद्धव ठाकरे के मुंह से भी मिलते जुलते ही शब्द सुनने को मिले थे. उद्धव ठाकरे की बातें सुन कर ऐसा लग रहा था जैसे किसी मोहल्ला में दो पड़ोसी बच्चों को लेकर सड़क पर झगड़ा करने पहुंच गये हों.

उद्धव ठाकरे अपने बेटे के बचाव में एकनाथ शिंदे के बेटे की मिसाल दे रहे थे. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में बनी महाविकास आघाड़ी सरकार में उनके बेटे आदित्य ठाकरे भी कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे.

आदित्य ठाकरे को लेकर सवाल उठाने जाने पर उद्धव ठाकरे, एकनाथ शिंदे के बेटे श्रीकांत शिंदे की तरफ उंगली उठाने लगे. श्रीकांत शिंदे लोक सभा सांसद हैं. उद्धव ठाकरे पूछने लगे कि अगर किसी का बेटा सांसद हो सकता है तो उनका बेटा विधायक या मंत्री क्यों नहीं हो सकता?

बंद कमरे में एकनाथ शिंदे से झगड़ा करने के लिए तो ऐसा तर्क ठीक हो सकता था, लेकिन क्या जनता के बीच में ऐसा करने से कोई फायदा हो सकता है? अगर किसी के मन में ठाकरे परिवार के प्रति सम्मान है तो अलग बात है, लेकिन क्या लोग वोट ऐसा ही करने के लिए देते हैं?

और वो भी तब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घूम घूम कर कैंपेन चला रहे हों कि परिवारवाद की राजनीति को खत्म करना है. तेलंगाना के अलावा भी मोदी के भाषणों में युवाओं से परिवारवाद की राजनीति को खत्म करने की अपील सुनायी देती है. अब तो साफ साफ नजर आ रहा है कि गांधी परिवार जैसा ही ठाकरे परिवार का हाल भी हो चुका है. बल्कि गांधी परिवार से भी बुरी हालत लग रही है. कांग्रेस मुक्त भारत की तर्ज पर शिवसेना मुक्त महाराष्ट्र की नौबत आ चुकी है.

फिर भी उद्धव ठाकरे अभी बीती बातों में ही उलझे और अटके पड़े हैं. शिवसेना के बागी विधायकों को दुश्मन के साथ जा मिलने के लिए जीभर कर कोस रहे हैं - और बार बार दुहाई दे रहे हैं कि दुश्मन बीजेपी ने ठाकरे परिवार के साथ साथ क्या क्या नहीं किया, लेकिन ऐसी बातों का मतलब क्या रह गया है?

उद्धव ठाकरे के ताजा बयान पर जरा ध्यान दीजिये, कहते हैं - 'जो लोग हमें गाली दे रहे थे... तुम जाकर उनकी गोद में बैठ गये... तुम उनसे मिल रहे हो, उन्हें गले लगा रहे हो... जिन लोगों ने ठाकरे परिवार का अपमान किया... हमारे लिए नीच शब्दों का इस्तेमाल किया... जिन लोगों ने मेरे बेटे को खत्म करने की कोशिश की - और आपने ऐसे लोगों के साथ बैठने का फैसला किया है.'

उद्धव ठाकरे लगता है सुशांत सिंह राजपूत की मौत की जांच के वक्त की याद दिलाने की कोशिश कर रहे हैं. उस दौरान आदित्य ठाकरे को लगातार निशाना बनाया जा रहा था. आदित्य ठाकरे को लेकर तरह तरह की चर्चाएं चल रही थीं. आदित्य ठाकरे को भी तब मीडिया के सामने आकर बोलना पड़ा था कि जो कुछ भी हो रहा है वो डर्टी पॉलिटिक्स हो रही है.

तभी की बात है, एक ट्वीट काफी चर्चित रहा, 'बेबी पेंग्विन... तू तो गयो!'

ये ट्वीट नितेश राणे की तरफ से किया गया था. नितेश राणे, केंद्रीय मंत्री नारायण राणे के विधायक बेटे हैं. राणे और ठाकरे परिवार की दुश्मनी काफी पुरानी है. राणे को शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे ने ही महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया था, जब शिवसेना सत्ता में रही. उद्धव ठाकरे और राणे में कभी पटरी नहीं खायी और उसी के चलते राणे को शिवसेना छोड़नी पड़ी.

उद्धव ठाकरे ये क्यों भूल रहे हैं कि जो लोग उनके बेटे के पीछे पड़े हुए थे, बदला तो ले ही चुके हैं. केंद्रीय मंत्री नारायण राणे के थप्पड़ जड़ देने वाले बयान के लिए महाराष्ट्र पुलिस ने गिरफ्तार तो किया ही था.

ऐसे किस्से सुनाने और छोटी छोटी शिकायतें करने से शिवसेना को फिर से खड़ा नहीं किया जा सकता है - अगर वास्तव में उद्धव ठाकरे अपने हिस्से की शिवसेना को फिर से सम्मानजनक स्थिति में पहुंचाना चाहते हैं तो कोई ठोस पहल और प्लान के बारे में गंभीरता से सोचें.

सही सलाहकारों की सख्त जरूरत है

उद्धव ठाकरे के अचानक ऐसे मुश्किल दौर में फंस जाने की एक बड़ी वजह उनके सलाहकार भी हैं. शिवसेना में बगावत के साथ ही उद्धव ठाकरे के सलाहकारों पर भी सवाल उठने लगे थे. उद्धव ठाकरे पर ये भी आरोप लगा कि वो कुछ ही लोगों से घिरे रहे - नेताओं और शिवसैनिकों के लिए उनसे मिल पाना मुश्किल हो गया था. हालांकि, उद्धव ठाकरे ने अपनी तरफ से ऐसी बातों से इनकार किया था और अपनी बीमारी को अनुपलब्धता की बड़ी वजह बतायी थी.

असल वजह तो उद्धव ठाकरे ही जानते होंगे, लेकिन अब भी ऐसा लग रहा है कि उनके पास सही सलाह देने वालों का टोटा है. अगर शरद पवार कोई राजनीतिक सलाह देते हैं तो उद्धव ठाकरे को ये नहीं भूलना चाहिये कि उसमें उनका निजी स्वार्थ समाहित होगा, सही सलाह उनके लिए वो है जो सिर्फ और सिर्फ उनके हित में हो.

सही सलाहकार चुनना भी कोई आसान काम नहीं है. बहुत ही नीर-क्षीर विवेकी बनना पड़ता है. मुश्किल मौकों पर आजमाना पड़ता है - और बार बार अपने विवेक के तराजू पर तौल कर ही आगे बढ़ना होता है.

अदालत पर भरोसा तो ठीक है: उद्धव ठाकरे का ये कहना भी ठीक है कि शिवसेना का जो भी होगा, पार्टी के कार्यकर्ता तय करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई का जिक्र करते हुए उद्धव ठाकरे ये भी ठीक ही कह रहे हैं, 'मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है... 11 जुलाई को जो कुछ भी होगा, उससे पार्टी का भविष्य तय नहीं होगा.' बिलकुल सही बात है.

चुनाव निशान की लड़ाई तो लड़नी पड़ेगी: उद्धव ठाकरे मानते हैं कि शिवसेना के चुनाव निशान धनुष-बाण को लेकर भी विवाद बढ़ चुका है. निश्चित तौर पर एकनाथ शिंदे गुट का अगला निशाना शिवसेना का चुनाव निशान ही है.

उद्धव ठाकरे का बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं, 'मैं हर शिवसैनिक से कहना चाहता हूं कि इसे कोई नहीं ले सकता... कहा जा रहा है कि हमारा निशान चला गया, ऐसा नहीं है... कोई भी हमसे हमारा प्रतीक नहीं ले सकता.'

अपना आत्मविश्वास और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाये रखने के लिए तो ठीक है, लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं है. उद्धव ठाकरे को नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने पक्ष में बनाये रखने के लिए कठिन परिश्रम और प्रयास करने होंगे. चुनाव आयोग में वही भारी पड़ेगा जिसकी पार्टी पर पकड़ हर तरह से मजबूत होगी.

मध्यावधि चुनाव तो होने से रहा: प्रेस कांफ्रेंस में उद्धव ठाकरे ने एक और भी महत्वपूर्ण बात कही, 'महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने चाहिये... आज राज्य में चुनाव हो जाने दीजिये... देखते हैं कि जनता क्या सोचती है? कौन गलत है या कौन सही?'

बिलकुल ठीक बात है. आखिरी फैसला तो जनता के दरबार में ही होनी है. अगर उद्धव ठाकरे ढाई साल बाद की बात कर रहे हैं तब तो ठीक है, लेकिन अगर ये मध्यावधि चुनाव की डिमांड है तो मुंगेरी लाल के सपने ही समझ लेना चाहिये.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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