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Updated: 18 दिसम्बर, 2021 05:26 PM
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क्या वक्त आ गया है कि अनंतकाल की परंपराओं में पड़े हिंदू धर्म को जड़ता से निकाला जाए. ऐसा नहीं है कि हिंदू धर्म में सुधार नही आए हैं. अगर कुरीतियां आईं, तो उस अनुरूप सुधार के लिए भगवान राम, कृष्ण के मनुष्य अवतार से लेकर शंकराचार्य परंपरा प्रतिष्ठा भी विभिन्न काल-खंड का हिस्सा रहे हैं, मगर चित्रकूट की धरती से राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक ने जो शपथ ली है और दिलवाई है यह हिंदू धर्म के प्रवर्तन के बाद की सबसे बड़ी सुधारवादी पहल है. हिंदू धर्म के जन्मदाता मनु और सतरूपा की सच्चाई से हिंदूओं को आगे ले जाने की सोच है. कुछ लोग इसे राहुल गांधी के हिंदू दर्शन का संघ का जवाब समझ रहे हैं मगर यह तंग समझ है.

दरअसल, संघ अब अबतक के मूल हिंदू तत्व 'मनुष्य जन्म से हीं हिंदू हो सकता है' में बदलाव के लिए बेचैन है. यह सुधारात्मक कदम हिंदू धर्म की मूल अवधारणा को बदल देने वाला है. मोहन भागवत की यह पहल संसार में हिंदू श्रेष्ठता का पथप्रदर्शक हो सकती है. जाति-पाति में बंध कर भारतीय उपमहाद्वीप के भारत जैसे एक भूमि तक सीमित हिंदू धर्म के फलक खोलने वाले हो सकते हैं. लोगों ने मोहन भागवत (Hindu Ekta Mahakumbh) के साथ शपथ लेते हुए कहा कि मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि किसी भी हिंदू भाई को धर्म से विमुख नहीं होने दूंगा. जो भाई धर्म छोड़कर चले गए हैं उनकी भी घर वापसी के लिए प्रयास करूंगा और उनको घर का हिस्सा बनाउंगा. सवाल ये है कि घरवापसी किसकी और कैसे?

Mohan Bhagwat Conversionमोहन भागवत का ये सुधारात्मक कदम हिंदू धर्म की मूल अवधारणा को बदल देने वाला है.

मोहम्मद साहब से पहले अरब देशों में भी मूर्तिपूजा होती थी. चीन के जीन सम्राज्य से लेकर चंगेज खान तक सूर्य, जल ,पृथ्वी के उपासक थे. मगर यह सब तो बहुत दूर निकलने वाली बात है. हम कलिंग से लेकर कंधार और काबुल से लेकर ढाका तक के सपने मोहन भागवत की प्रतिज्ञा पर नहीं देख सकते हैं, मगर क्या हिंदू धर्म की उस सोच पर प्रहार कर सकते हैं, जिसमें आडंबरी सोच ने जन्म से ही हिंदू हो सकता है, इस वाक्य को हिंदू धर्म की मूल आत्मा बना दिया. मनुष्य हिंदू जन्म लेता और हिंदू मरता है, इस सोच ने हिंदू धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ नफरती बना दिया और हिंदू संकुचित होते-होते घाट पर लगे घोंघे की तरह खुद को अपनी शेल में कैद कर बचाने में लगा रहा. दूसरे धर्म के लोग समुद्र पार कर गए और जमीनें नाप लीं, मगर हिंदू घाट पर आज भी पड़े हैं. तो क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू धर्म को उसके शेल से निकालकर पार लगा पाएगा.

अन्तहीन सदियों पुरानी पुरातन व्यवस्था केवल एक भागवत की प्रतिज्ञा से खत्म हो जाएगी, यह मानना बेमानी है. मगर यह शुरुआत हिंदू धर्म इतिहास का सबसे बड़ा कदम है और सोच साहसिक है. यह केवल घरवापसी की कोशिश नही है. प्रतिज्ञा की अगली लाईन है कि मैं उन्हें परिवार का हिस्सा बनाउंगा. यह सबसे चुनौतीपूर्ण काम है. चित्रकुट के संघ समागम से पहले वसीम रिजवी का जितेंद्र नरायण सिंह त्यागी बनना दिखाता है कि संघ की सोच और प्रयास को भागवत का दिवास्पन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता है और न ही इसे इकलौती घटना मानकर भूला जा सकता है. मगर बड़ा सवाल है कि अब आगे का रास्ता क्या है.

यह सच्चाई है कि मीर कासिम से लेकर औरंगजेब तक के एक हजार साल के कालखंड में बड़ी संख्या में काबुल के आखिरी हिंदू राजशाही वंश हिंदूशाही के दारा से लेकर बंगाल के आखिरी हिंदूशासन गौड़वंश के लक्ष्मण सेना तक में राज्य और गण दोनों ने तलवारों के बल इस्लाम कुबूला. इतने सालों बाद जब इस्लाम लगातार अपनी जड़ें गहरी करने में लगा है और धर्मिक कट्टरता के लिए तबलीगी जमात जैसे संगठन जैसलमेर-बाड़मेर तक के दूर दराज के रेगिस्तानी ईलाकों तक में जी जान से लगे हैं, मुसलमानों को समझा पाना आसान नहीं है कि तुम्हारे पुरखों पर अन्याय हुआ है और तुम हिंदू थे इसलिए तुम वापस हिंदू धर्म में लौट आओ. कोई नहीं लौटेगा. और, यह भी अर्धसत्य है. यह पूरा सच नहीं है.

सच यह भी है कि देश में पहली मस्जिद ईसवी 623 में घोघा में पोर्ट पर बरवादा मस्जिद गुजरात में व्यापारियों ने अरब के व्यापारियों के लिए बनवाई थी और दूसरी चेरामन मस्जिद ईसवी 629 में केरल में तब बनी थी, जहां कोंडागुलूर के राजा चेरामन पेरूमल ने मुहम्मद साहब के पास जाकर उनकी चमत्कारिक शक्ति से प्रभावित होकर या व्यापार के लिए इस्लाम धर्म अपनाया था. यानी इस्लाम ने अपना फैलाव भारतीय उपमहाद्वीप में आक्रमणकारियों से पांच सौ पहले कर लिया था.

तो, क्या मोहन भागवत की इस पहल को हिंदू धर्म के फैलाव की कुछ इसी तरह की शुरूआत मानी जाए. भारत में बहुत सारी कठात, मेहरात और बड़बुजे मुस्लिम जातियां हैं, जो इस्लाम से ज्यादा हिंदुओं के नजदीक हैं. हिंदू धर्म की तरफ से इन्हें मिलाने की कभी कोशिश नही हुई और इस बीच तबलीगियों ने इन्हें अपने शिकंजे में लेना शुरू कर दिया है. भारत के पाकिस्तान से सटे रेगिस्तानी ईलाकों में न तो मस्जिदें होती थी और न मुसलमान नमाज पढ़ते थे. इनके पहनावे देखकर हिंदू और मुस्लिम धर्म का फर्क नहीं कर सकते थे. मगर यूपी-बिहार और बंगाल के मौलवियों ने पूरे इलाके को कट्टर इस्लामी तौर-तरीकों और पहनावे में ढालना शूरू कर दिया है. इसलिए हिंदूओं का भविष्य इसमें नही है कि वह बच्चे पैदा करें. बल्कि, मोहन भागवत के दिखाए रास्ते पर चलें. अयोध्या, काशी और मथुरा का महिमा लौटाना इस मुहिम का हिस्सा हो सकता है , मोदी की तरह काशी मंदिर से हिंदू-मुसलमान पर बात न कर एक भारत सर्वश्रेष्ठ भारत की बात हो. घर वापसी में दिल जीतने से लेकर मुनाफे तक का मंत्र हीं काम आएगा.

मगर बड़ा सवाल है कि कोई मुसलमान हिंदू बनना चाहे तो किस जाति में बनेगा. यही वह दीवार जिसके आगे कोई खिड़की नही है, दरवाजा नही है. बिना रोशनदान के घर में हिंदुओं का दम घुट रहा है. हिंदू अपने स्वभाव से बेहद सरल और लचीले हैं. पेशाब करते वक्त भी कोई मंदिर दिख जाए, तो सिर झुका लेते हैं. मगर दूसरे धर्मों के प्रति हमारी भारी अस्पृश्यता का भाव हमें दूसरे धर्मावलंबियों से ज्यादा कट्टर बनाता है. क्या कोई मुसलमान राजपूत-ब्राह्णण, लाला, बनिया बनना चाहे तो क्या हम उसे अपनी जाति में शामिल कर उसके साथ बेटी-रोटी का रिश्ता कायम करने के लिए तैयार हैं. यह सबसे बड़ा सवाल है. भागवत इन सवालों का जवाब उनसे पूछ रहे थे, जिन्हें प्रतिज्ञा दिलवा रहे थे. मगर सीधे-सीधे पूछने का साहस अभी वह भी जुटाने में सहम रहे हैं. कोई मुसलमान एससी, एसटी या ओबीसी की जातियों में शामिल होना चाहे, तो आरक्षण को लेकर जातियां बवाल मचा देंगी. जाति-विहीन हिंदू समाज की परिकल्पना निकट भविष्य में दूर की कौड़ी लग रही है. तो फिर आगे का रास्ता क्या हो.

क्या यह हो सकता है कि देश की पूरी आबादी का डीएनए हो. यह लोगों के स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी क्रांति होगी. और फिर डीएनए रिजल्ट को आधार कार्ड से जोड़ा जाए. ऐसे में जातियों का डीएनए भी सामने आ जाएगा. फिर जिस गैर हिंदू का डीएनए जिन जातियों से मिले, उसमें उसे पुरखों के खून में शामिल होने दिया जाए. मगर यह रास्ता कम बवाली नही है. हम एक देश एक विधान पर हीं अब तक लौट नहीं पाए हैं, अगर केंद्र सरकार सभी जाति-धर्म के बेटियों की शादी की उम्र का कानून 21 साल बनाती है, तो यह भी इस दिशा में एक बड़ा कदम है.

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