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Updated: 07 फरवरी, 2021 12:16 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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भारतीय किसान यूनियन (BKU) के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए अचूक नुस्खा (Rakesh Tikait MSP formula) दे दिया है. राकेश टिकेत के इस 'रामबाण फॉर्मूले' से किसानों के सभी दु:खों का अंत हो जाएगा. इस फॉर्मूला के लागू होते ही स्वर्ग में बैठे सभी देवता 'राकेश टिकैत' की जय-जयकार करते हुए पुष्पवर्षा करने लगेंगे. राकेश टिकैत ने आजतक के विशेष कार्यक्रम 'सीधी बात' में वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला से बातचीत में कहा कि '3 क्विंटल गेहूं (300 किलोग्राम) की कीमत 1 तोले (10 ग्राम) सोने के बराबर कर दी जाए.' मैं तो सोच रहा हूं कि मोदी सरकार ने किसान आंदोलन के शुरू होने से पहले राकेश टिकैत से संपर्क क्यों नहीं किया. बेवजह दिल्ली की सीमाओं पर ढाई महीने से किसानों को ठंड में बैठा रखा है. मतलब ये इतना फैनटास्टिक आईडिया है कि कोई आम आदमी तो इतना सोच ही नहीं पाता. वैसे, लोगों को राकेश टिकैत का इस बात पर भी धन्यवाद और आभार व्यक्त करना चाहिए कि उन्होंने सोना से आगे नहीं सोचा. क्या पता किसी अन्य मणि-माणिक्य, हीरे-जवाहरात से तुलना कर देते तो, शायद चीन से लोन लेना पड़ जाता. चीन वैसे भी लोन देकर जमीन हथियाने में बहुत आगे है. पड़ोसी देश पाकिस्तान इसका सबसे शानदार उदाहरण है.

'300 किलोग्राम = 10 ग्राम सोना' का टिकैत फॉर्मूला

मोदी सरकार के कृषि कानूनों से कई सौ कदम आगे जाते हुए राकेश टिकैत ने ये MSP फॉर्मूला दिया है. यह फॉर्मूला है 3 क्विंटल गेहूं (300 किलोग्राम) = 10 ग्राम सोना. मैं गणित का बहुत अच्छा छात्र नही रहा हूं. लेकिन, इतनी गणित आती है कि इस फॉर्मूला को आसानी से समझ सकूं. मेरे कहने का सीधा सा मतलब ये है कि इतना गुणा-भाग तो कोई आम इंसान भी कर लेगा. हालांकि, मैं उस आम इंसान को ऐसा करने से पहले सौ बार रोकूंगा. रोकने के पीछे एक बड़ी और ठोस वजह है. अगर उस व्यक्ति ने ये गुणा-भाग करने की कोशिश की, तो देश की जनसंख्या अचानक से कम होने लगेगी. एक रिपोर्ट के अनुसार, बीते दो दशकों में भारत में हार्ट अटैक से होने वाली मौतों की संख्या में चौंकाने वाला इजाफा हुआ है. खैर, राकेश टिकैत के फॉर्मूला पर लौटते हैं. सोने का वर्तमान भाव करीब 48500 है. बजट आने के बाद से सोने में काफी टूट दर्ज की गई है. वहीं, किसान को गेंहू का समर्थन मूल्य 1975 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से सरकार की ओर से दिया जाता है. इस हिसाब से गुणा-भाग करना बड़ी बात नहीं है.

मोदी सरकार के कृषि कानूनों से कई सौ कदम आगे जाते हुए राकेश टिकैत ने ये MSP फॉर्मूला दिया है.मोदी सरकार के कृषि कानूनों से कई सौ कदम आगे जाते हुए राकेश टिकैत ने ये MSP फॉर्मूला दिया है.

वर्तमान समर्थन मूल्य से 8 गुना हो जाएगी कीमत

राकेश टिकैत के फॉर्मूला को आधार बनाकर सोने के साथ गेहूं की तुलना करने पर 1 क्विंटल गेहूं की कीमत करीब 16,166 रुपये होगी. वहीं, एक किलो गेंहूं की कीमत 161.66 रुपये हो जाएगी. इस हिसाब से गेंहूं का मूल्य सरकार द्वारा 1975 रुपये के हिसाब से दिए जा रहे समर्थन मूल्य से 8 गुना ज्यादा हो जाएगा. राकेश टिकैत के अनुसार, MSP का ये फॉर्मूला उनके पिता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का दिया हुआ है. 'सीधी बात' में वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला से बातचीत में टिकैत ने कहा कि '1967 में भारत सरकार ने गेहूं की एमएसपी 76 रुपए प्रति क्विंटल तय की थी. तब सोने का भाव 200 रुपये प्रति तोला था. जो तीन क्विंटल गेहूं से खरीदा जा सकता था. हमको अब तीन क्विंटल गेहूं के बदले 1 तोले सोना दे दो और उसी हिसाब से कीमतें तय की जाएं. जितना कीमत और चीजों की बढ़ें, उतनी ही कीमत गेहूं की भी बढ़नी चाहिए.'

साम्यवाद लाने का सबसे अच्छा तरीका

बताया जाता है कि राकेश टिकैत ने मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए और एलएलबी की पढ़ाई की है. लेकिन, 1967 के इस फॉर्मूले को आज 2021 में लागू करने की मांग करने से साफ हो गया है कि राकेश टिकैत का मीडिया प्रेम अभी कम नहीं हुआ है. अखबारों के कारण कुछ लोगों को 'छपास' की बीमारी हो जाती है. न्यूज चैनल आने के बाद इस बीमारी ने कोरोना की तरह ही अपना एक नया वेरिएंट 'दिखास' बना लिया. कुल मिलाकर 'छपास' और 'दिखास' की बीमारी से घिरे व्यक्ति की 'इम्यूनिटी' कम हो जाती है. वह छपने और दिखने के लिए कुछ भी कह सकता है. मतलब, अगर ऐसी MSP सरकार निर्धारित कर सकती, तो तात्कालीन कांग्रेस सरकार ही ले आती. कांग्रेस तो हमेशा से ही किसानों की हितैषी पार्टी रही है. मोदी सरकार के कृषि कानूनों की वजह से किसानों की जमीनें कॉरपोरेट लील जाने को तैयार बैठा ही हुआ है. ऐसे में अगर ये फॉर्मूला लागू हो जाता है, तो बहुत ही जल्द किसान एक छोटे-मोटे कॉरपोरेट घराना की तरह दिखने ही लगेंगे. साम्यवाद लाने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है?

मोदी सरकार के सामने बड़ी समस्या

सदियों पहले किसी जमाने में भारत को 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था. लेकिन, इस वर्ष का बजट 2021 जारी होने के बाद पता चला कि मोदी सरकार कुछ सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) में अपनी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया विनिवेश या डिसइन्वेस्टमेंट (DisInvestment) शुरू करने जा रही है. कोरोनाकाल में देश को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा था. इस चोट से आम आदमी अभी तक उबर नहीं पाया है. अगर राकेश टिकैत का फॉर्मूला लागू हो जाता है, तो अन्य सार्वजनिक उपक्रमों को भी बेचा जा सकता है. ये तो अच्छा हुआ कि राकेश टिकैत ने सरकारी नौकरी वालों की तरह एरियर की मांग नहीं की. वरना सचमुच में भारत को चीन से कर्ज लेना पड़ जाएगा. 'मैं देश नहीं बिकने दूंगा' को थीम सांग बनाने वाली भाजपा के सामने एक बड़ी समस्या 'सुरसा का मुंह' खोले खड़ी है.

गरीब को नसीब नहीं हो पाएगी रोटी

इस फॉर्मूला से किसानों की स्थिति सुधरेगी या नहीं, पता नहीं. लेकिन, इसके लागू होने से भारत की जनसंख्या में बदलाव आना निश्चित है. देश के गरीब और मजदूर वर्ग को जब रोटी नहीं नसीब होगी, तो वह दम ही तोड़ेगा. राकेश टिकैत किसान नेता हैं, इसका मतलब ये नहीं कि वह कोई भी बिना लॉजिक की बात एक बड़े टीवी शो पर कहेंगे और अपने रास्ते चले जाएंगे. राकेश टिकैत मूलरूप से तो किसान ही हैं. नेता उन्हें किसानों ने बनाया है. इन किसानों में गरीब भूमिहीन किसान मजदूर भी है. आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 26.3 करोड़ परिवार खेती-किसानी करते हैं. इनमें से 14.43 करोड़ किसान भूमिहीन हैं और 11.9 करोड़ किसानों के पास ही खुद की जमीन है. अब अगर साम्यवाद की बात करें, तो इन भूमिहीन किसानों को 11.9 करोड़ किसानों की भूमि के बराबर हिस्से कर बांट देना चाहिए. मैंने यहां कुतर्क के साथ यह उदाहरण दिया है. राकेश टिकैत को समझना चाहिए कि वह राजनेताओं की तरह ही लोगों को ख्वाब बेचने में नहीं लग सकते. टिकैत को अपनी जिम्मेदारियां समझनी होंगी. टिकैत आंदोलनरत किसानों के नेता हैं. सड़क पर परिवार के साथ जा रहा कोई बच्चा नहीं, कि खिलौना देखकर जिद करने लगें.

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