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Updated: 01 फरवरी, 2021 12:22 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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उत्तर प्रदेश में होने जा रहे पंचायत चुनाव के ऐन पहले डॉक्टर कफील खान (Kafeel Khan) नये सिरे से सुर्खियां बटोर रहे हैं. ताजा मामला चुनावों से पहले गोरखपुर पुलिस की तरफ से तैयार की गयी हिस्ट्रीशीटरों की लिस्ट के चलते है.

काफी दिनों से कफील खान को भी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का सियासी स्नेह वैसे ही मिलता रहा है, जैसा अब राकेश टिकैत के प्रति महसूस किया जा रहा है. प्रियंका गांधी वाड्रा ने राकेश टिकैत को भी फुल सपोर्ट देने का वादा किया है, जैसे उनकी टीम कफील खान के संरक्षण और सुख-सुविधाओं का ख्याल रखती है.

सिर्फ प्रियंका गांधी वाड्रा ही नहीं, अखिलेश यादव और मायावती को भी डॉक्टर कफील खान का कंधा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) पर निशाना साधने के लिए काफी उपयोगी लगता है.

राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) को तो अभी गणतंत्र दिवस के मौके पर हुई हिंसा के लिए दिल्ली पुलिस का नोटिस ही मिला है, डॉक्टर कफील खान तो गोरखपुर पुलिस की हिस्ट्रीशीटरों की लिस्ट में टॉप 10 में जगह बना चुके हैं - डॉक्टर कफील खान के बाद अब तो यही लगता है जैसे योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अगला सियासी हथियार राकेश टिकैत ही बनने वाले हैं.

पहले डॉक्टर, अब हिस्ट्रीशीटर

योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बन जाने के बाद गोरखपुर सीट पर संसदीय उपचुनाव में बीजेपी की चौंकाने वाली शिकस्त तो बाद की बात है, उससे पहले जो दो बातें पता चलीं वो भी कम हैरान करने वाली नहीं थीं - एक, 'अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं' और दो, 'पुलिस ने पाया कि कफील खान तो सफेद कोट पहनने वाला अपराधी है.' अगस्त के महीनें बच्चों की मौत की बात योगी सरकार के ही एक सहयोगी का रिसर्च पेपर रहा जो उनके बयान के तौर पर सामने आया था.

अगस्त, 2017 से पहले डॉक्टर कफील खान को लोग गोरखपुर अस्पताल के एक चाइल्ड स्पेशलिस्ट के तौर पर जानते थे. अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से 60 से ज्यादा बच्चों की मौत की खबर आने के बाद मालूम हुआ कि कफील खान महज एक डॉक्टर नहीं बल्कि बच्चों के लिए मसीहा है, जो मुसीबत के वक्त मासूमों की जान बचाने के लिए दोस्तों से ऑक्सीजन सिलेंडर मांग लेता है और अपनी कार में ढोकर सरकारी अस्पताल लेकर आता है - लोकल मीडिया में कफील खान की हीरोगिरी ही उनके जी का जंजाल भी बन गयी.

एक तरफ बच्चों की मौत पर योगी सरकार को बचाव का रास्ता नहीं सूझ रहा था, दूसरी तरफ कफील खान की कारसेवा के किस्से अखबारों की सुर्खियां में छाये हुए थे. ये तब की बात है जब यूपी पुलिस अपने 'एनकाउंटर' या 'अपराधियों की गाड़ी पलट जाने' के लिए नहीं बल्कि 'एंटी रोमियो स्क्वॉड' की करतूतों को लेकर निशाने पर रही. कफील खान योगी सरकार के संकटमोचकों की नजर में तो पहले से ही चढ़े थे, एक झटके में ही यूपी पुलिस के हत्थे भी चढ़ गये.

rakesh tikait, kafeel khanराकेश टिकैत पर भी कफील खान की तरह सियासी मोहरा बनने का खतरा मंडराने लगा है!

माना जा रहा है कि 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की यूपी पॉलिटिक्स को चमकाने के मकसद से डॉक्टर कफील खान को पार्टी का पोस्टर बॉय बनाया जा सकता है, लेकिन उससे पहले कफील खान यूपी पुलिस की तरफ से गोरखपुर में तैयार 81 हिस्ट्रीशीटर की लिस्ट में जगह बना चुके हैं. खास बात ये है कि गोरखपुर पुलिस ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विशेषज्ञ रहे डॉक्टर कफील खान को जिले के सबसे खूंखार 10 अपराधियों में से एक माना है.

गोरखपुर के टॉप 10 अपनाधियों की सूची में अपना नाम आने के बाद एक वीडियो मैसेज में कफील खान ने कहा है, 'उत्तर प्रदेश सरकार ने मेरी हिस्ट्रीशीट खोल दी है... कहते हैं ताउम्र आप पर निगरानी रखेंगे. अच्छा है... दो सिक्योरिटी गार्ड दे दो... चौबीस घंटे निगरानी रखें मेरे पर - कम से कम फर्जी चीजों से तो बच जाऊंगा.'

पहले कफील खान, अब राकेश टिकैत

डॉक्टर कफील खान को सितंबर, 2020 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देश पर जेल से रिहा किया गया था. कफील खान के बाहर आने से पहले ही कांग्रेस की एक टीम जेल पहुंच गयी थी और उनके निकलते ही उनको राजस्थान ले जाया गया - क्योंकि वहां पर कांग्रेस की सरकार है.

दिसंबर, 2019 में नागरिकता संशोधन कानून CAA विरोधी प्रदर्शन के दौरान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कफील खान पर भड़काई भाषण का इल्जाम लगा और फिर जनवरी, 2020 में यूपी पुलिल ने उनको गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. बाद में उनके खिलाफ नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया था. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी सरकार की कार्रवाई को ये गलत पाते हुए यहां तक कहा था कि भड़काऊ नहीं बल्कि वो भाषण तो सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाने वाला था.

फिर यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया था, लेकिन अपील खारिज हो गयी. सुप्रीम कोर्ट से यूपी सरकार को झटका लगने के बाद डॉक्टर कफील खान ने सरकार से आग्रह किया था कि उनका निलंबन भी रद्द कर दिया जाये, लेकिन अब मालूम हुआ है कि पुलिस की नजर में तो वो अब भी अपराधी ही हैं.

कफील खान और यूपी पुलिस दोनों अपनी अपनी जगह सही हैं. कफील खान जमानत पर छूटे हैं, अदालत ने अभी बरी नहीं किया है - और जब तक केस चलता रहेगा, पुलिस की नजर में तो वो महज एक अपराधी ही रहेंगे.

राजनीतिक वजहों से ही सही, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए नामांकन के साथ सभी उम्मीदवार हलफनामा भी दाखिल करते हैं और उसमें उनके खिलाफ दर्ज मामलों का विवरण भी होता है - बेशक, ऐसे मामले राजनीतिक वजहों से हों, लेकिन कोर्ट से बरी होने तक तो वे सभी उम्मीदवार के खिलाफ अपराधों की सूची का हिस्सा ही होते हैं.

मुमकिन है, डॉक्टर कफील खान भी अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ से चुनाव मैदान में उतरें, लेकिन जब वो नामांकन भरने जाएंगे तो पुलिस केस को लेकर हलफनामा तो दाखिल करना ही पड़ेगा - और हलफनामें में वे सभी मामले शामिल होंगे जो उनके खिलाफ दर्ज हैं.

कफील खान के चुनाव लड़ने की तो अभी संभावना ही है, राकेश टिकैत तो लड़ भी चुके हैं लेकिन हर बार नाकामी ही हाथ लगी है. जहां तक पुलिस की बात है, तो राकेश टिकैत दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल भी रह चुके हैं. 90 के दशक में राकेश टिकैत के पिता और अपने जमाने के जाने माने किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत किसान आंदोलन चला रहे थे. जब आंदोलन खत्म कराने के लिए राकेश टिकैत पर दबाव बनाने की कोशिश हुई तो इस्तीफा देकर वो भी पिता के साथ आंदोलन में कूद पड़े - और तभी से ये सिलसिला जारी है.

कफील खान को भी शुरू में उत्तर प्रदेश के तमाम विपक्षी दलों का सपोर्ट मिला था, लेकिन कांग्रेस से नजदीकियां बढ़ने के बाद वो अब सिर्फ प्रियंका गांधी वाड्रा के टीम के लिए इस्तेमाल होने लगे हैं. जहां तक नजदीकियों का सवाल है, राकेश टिकैत भी आरएलडी नेता अजीत सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी के ज्यादा करीब नजर आ रहे हैं. राकेश टिकैत के बड़े भाई नरेश टिकैत का ये कहना कि बीजेपी को अब सबक सिखाना जरूरी हो गया है और अजीत सिंह का साथ छोड़ कर उन लोगों ने गलती कर दी. ऐसा लगता है अब पश्चिम यूपी में भूल सुधार की राजनीति शुरू हो चुकी है.

अब तो ऐसा ही लगता है जैसे राकेश टिकैत भी यूपी की राजनीति के उसी छोर पर खड़े हैं जहां राजनीति का सिर्फ एक ही मतलब है - बीजेपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का खुला विरोध और उसमें दोनों का अपने अपने हिसाब से राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल.

राकेश टिकैत को अभी यूपी में सक्रिय राजनीतिक दलों के साथ साथ यूपी चुनाव पर नजर गड़ा चुकी आम आदमी पार्टी का भी पूरा सपोर्ट मिल रहा है. तभी तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के मैसेज के साथ डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया गाजीपुर बॉडर इंतजामों का मुआयना कर रहे हैं, जबकि आप के राज्य सभा सांसद संजय सिंह सीधे मुजफ्फर नगर की महापंचायत में पहुंच जाते हैं. महापंचायत में जयंत चौधरी और संजय सिंह के बीच किसानों के अपने पक्ष में करने की होड़ भी मच जाती है.

जैसे जेल जाना राकेश टिकैत और कफील खान दोनों के लिए आम बात है, वैसे ही एक कॉमन बात ये भी है कि दोनों अपने विरोध प्रदर्शनों की बदौलत ही यूपी में विपक्ष की राजनीति करने वाली पार्टियों के पसंदीदा किरदार साबित हो रहे हैं. कफील खान सीएए विरोध के चलते तो राकेश टिकैत किसान आंदोलन के चलते.

कफील खान कांग्रेस के करीबी जरूर बन गये हैं, लेकिन राकेश टिकैत को भी राजनीति में राहुल गांधी की तरह ही काफी संघर्ष करना पड़ा है - दरअसल, दोनों को ही ये सब विरासत में ही मिला है.

राकेश टिकैत के आंसू छलकने से पहले दोनों टिकैत भाइयों पर विरासत संभालने में अक्षम होने की भी वैसे ही चर्चा हो रही थी जैसे राहुल गांधी और कांग्रेस की होती है - राकेश टिकैत ने तो वापसी कर ली, देखना है कफील खान, राहुल गांधी के लिए ऐसा सुनहरा पल कब लाने वाले हैं!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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