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Updated: 12 फरवरी, 2021 11:14 PM
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राहुल गांधी राजस्थान के दौरे पर हैं. राहुल गांधी की किसान पंचायत के लिए राजस्थान के चार ज़िलों को चुना गया है. हनुमानगढ़, श्री गंगानगर, अजमेर और नागौर में राहुल गांधी किसानों से सीधा संवाद कर रहे हैं. अजमेर ज़िले के रूपनगढ़ में ट्रैक्टर पर बैठ कर ट्रैक्टर पर बैठे हुए किसानों को संबोधित करेंगे. कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के राजस्थान की किसान सभाओं को लेकर कई तरह के सवाल खड़े किए जा रहे हैं. कई लोग कह रहे हैं बहुत देर हो गई आते आते. तो कइयों का कहना है कि राहुल गांधी को अलवर जाना चाहिए था जहां पर महीनों से सड़क पार किसान शाहजहांपुर में बैठे हुए हैं. कांग्रेस किसान बिलों का विरोध तो कर रही है पर कांग्रेस एक सियासी दल भी है. ऐसे में सियासी पार्टी का लक्ष्य जनता के मुद्दों को उठाकर अपनी ज़मीन तलाशना भी होता है. लिहाज़ा कांग्रेस यही कर रही है. दो दिन पहले कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रुद्राक्ष की माला लेकर पहुंची थी और अब राहुल गांधी राजस्थान के जाटलैंड के तूफ़ानी दौरे पर हैं. राहुल दो दिनों में जाटों के लोकदेवता तेजाजी मंदिर के दर्शन के अलावा 5 सभाएं कर रहे हैं.

Farmer Protest, Farmer, Rahul Gandhi, Congress, Rajasthan, Ashok Gehlot, Sachin Pilotकिसान दौर में सचिन पायलट राहुल गांधी के लिए किसी मसीहा से कम नहीं हैं

कहा जा रहा है कि जिस तरह से प्रियंका गांधी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कृषि बिल के विरोध के बहाने जाट वोट बैंक पर नज़र लगाए हुए हैं. उसी तरह से राजस्थान में भी राहुल गांधी अपने खोए हुए जाटवोट बैंक को तलाशने आए हैं. चारों ज़िलों में वही इलाक़े हैं जहां पर सबसे ज़्यादा जाट हैं. पूर्व मुख्यमंत्री सचिन पायलट को लंबे अरसे बाद राहुल गांधी के साथ बुलाया गया है क्योंकि कृषि बिल को लेकर सबसे ज़्यादा कोई विरोध कर रहा है तो कृषक जातियां हैं जिनमें मार्शल कौमें जाट और गुर्जर हैं.

कहा जाता है कि जिस तरह से गुर्ज़र बहुल इलाकों में मध्य प्रदेश में सचिन पायलट ने कांग्रेस के पक्ष में बड़ी बड़ी सभाएं की. उसी तरह से प्रियंका गांधी चाहती है कि सचिन पायलट कांग्रेस में मज़बूती से बने रहे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट और गुर्ज़र बहुल इलाक़े में उनका दौरा कराया जाए. इसलिए सचिन पायलट के ज़रिए लगातार राजस्थान में किसान पंचायतें करायी जा रही है ताकि इसका मेसेज राजस्थान के अलावा दूसरे राज्यों में पहुंचे.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह का जो प्रयोग जाट और मुसलमानों का साथ लाने का रहा था वह कंबिनेशन BJP की धमक के साथ ही ख़त्म हो गया था और रही सही कसर मुज़फ़्फ़रनगर दंगे ने पूरी कर दी थी. मगर कांग्रेस को लगता है कि तीनों पीछे बिल के बहाने खोई हुई ज़मीन को पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में वापस पाया जा सकता है. यह इलाक़ा पंजाब से भी जुड़ा हुआ है जहां पर बड़ी संख्या में सिख भी रहते हैं.

इस इलाक़े में मुसलमानों के अलावा जाट और गुर्ज़र बड़ी संख्या में खेती करते हैं जो कृषि बिल के विरोध में हैं. जिस तरह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों के बल पर BJP ने सबसे ज़्यादा सीटें जीती, हरियाणा में बड़ी संख्या में जाट दुष्यंत चौटाला के साथ चले गए और राजस्थान में तो जब से BJP ने जाटों को आरक्षण दिया उसके बाद कांग्रेस कभी विधानसभा चुनाव में 100 सीट भी पार नहीं कर पाई. उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि चार्ट कांग्रेस को छोड़कर आगे निकल चुके हैं.

यही वजह है कि कांग्रेस को लगता है कि यह बड़ा मौक़ा है कि कृषि बिलों के बहाने अपनी खोई हुई ज़मीन को वापस पाए और कम से कम राजस्थान में जाटलैंड में राहुल गांधी का दौरा करवाकर पार्टी के कोर वोट बैंक मज़बूत करें. राजस्थान में परंपरागत रूप से कांग्रेस के कोर वोटर माने जाते थे मगर परसराम मदेरणा की जगह अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद और फिर उसके तुरंत बाद BJP ने जाटों को आरक्षण दे दिया तब सेकांग्रेस का भी अपने पैर पर राजस्थान में खड़ी नहीं हो पायी.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने सीकर की रैली में जाटों को आरक्षण की घोषणा कर कांग्रेस के वोट बैंक के ताबूत में आख़िरी कील जड़ दी थी. उससे पहले BJP आज़ादी के बाद कभी भी राजस्थान में बहुमत हासिल नहीं कर पायी थी. मगर उसके बाद जब भी बीजेपी सत्ता में आयी बड़ी बहुमत के साथ आयी है. अकेले मारवाड़ और शेखावाटी इलाक़े में 31 सीटों में से 25 सीटों पर जाट जीतकर आए हैं. राजस्थान में क़रीब साठसीटों पर जाट उम्मीदवार जीतने का दम रखते हैं राजस्थान में इनकी आबादी 12 से 16 फ़ीसदी तक कही जाती है.

जाट बहुल क्षेत्र में किसान सभा कर कांग्रेस को लगता है कि BJP की तरफ़ गए किसानों को वापस लाया जा सकता है. नागौर जाटों का गढ़ माना जाता है जहां पर जाट बड़ी संख्या में कांग्रेस और BJP को छोड़कर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी हनुमान बेनीवाल के साथ जाते हुए दिख रहे हैं. इसीलिए कांग्रेस कोशिश कर रही है कि अगर BJP से ज़्यादा नाराज़ होते हैं. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को विकल्प के तौर पर नहीं चुने बल्कि कांग्रेस के पास आए.

नागौर कभी मिर्धा परिवार की विरासत कही जाती थी पर हनुमान बेनीवाल ने यहां पर कांग्रेस की जड़ें खो दी है. जिस तरह से हनुमान बेनीवाल NDA छोड़कर बाहर निकले हैं और लगातार बीजेपी पर हमला बोल रहे हैं. कांग्रेस को लगता है कि कहीं हनुमान बेनीवाल जाट नेता के तौर पर मज़बूत होकर नहीं उभरें. अगर हनुमान बेनीवाल मज़बूत होते हैं तो निश्चित रूप से वह कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाएंगे.

इसमें कोई ग़लत बात नहीं है कि कोई राजनीतिक पार्टी अपनी ज़मीन आंदोलन के आधार पर तैयार करे. मगर कांग्रेस बदनामी से डर रही है. लिहाज़ा राहुल गांधी की सभा में कांग्रेस के झंडे और बैनर नहीं लगाए गए हैं, बल्कि उसकी जगह तिरंगा लगाया जा रहा है ताकि BJP कृषि बिल के पीछे छिप कर कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप नहीं लगाए. कृषि बिल के ख़िलाफ़ ही सही अगर जाट, गुर्जर और मुसलमान BJP के खिलाफ़ खड़े हो जाते हैं तो उत्तर भारत में कांग्रेस के लिए यह बड़ी कामयाबी होगी. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी इन मार्शल जातियों के ग़ुस्से को कांग्रेस के पक्षमें भुना पाने में क़ामयाब हो पाएंगे.

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