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Updated: 24 मई, 2019 11:50 AM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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बात उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रदर्शन की उठी है तो Amethi election result का analysis करना जरूरी हो जाता है. इस सीट पर जिस तरह का चुनाव हुआ है और जैसे इसे राहुल गांधी ने गंवाया है साफ हो जाता है कि इसे संभालने में कांग्रेस और राहुल गांधी दोनों से तमाम तरह की बड़ी चूक हुई हैं. इस सीट पर ऐसा क्या क्या हुआ जिसके कारण 2019 का चुनाव राहुल गांधी शर्मनाक तरीके हारे हैं, ये जानने से पहले एक नजर देश के परिदृश्‍य पर.

Loksabha Election Results 2019 ने आने वाली सरकार की छवि साफ कर दी है. देश की जनता ने पुनः भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर विपक्ष समेत तमाम उन लोगों को हैरत में डाल दिया जो लगातार भाजपा की आलोचना कर रहे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी पुनः सरकार बनाने जा रही है. जिस तरह के नतीजे देखने को मिले हैं उनसे ये भी साफ हो गया है कि भाजपा के कमल को खिलने में ज्यादा दुश्वारियों का सामना नहीं करना पड़ा है.

वहीं बात अगर कांग्रेस समेत विपक्ष की हो तो मोदी की सुनामी ने इन्हें भी नष्ट कर दिया है. 2019 के इस चुनाव में यूपी बिहार को निर्णायक माना जा रहा था. ऐसे में जब यूपी और बिहार का अवलोकन किया जा जाए तो मिलता है जहां एक तरफ यूपी में सपा बसपा गठबंधन बुरी तरह नाकाम रहा तो वहीं बिहार में भी आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन भी जनता को एक फूटी आंख नहीं भाया.

लोकसभा चुनाव 2019, राहुल गांधी, अमेठी, वायनाड, स्मृति ईरानीमाना जा रहा था कि अमेठी गांधी परिवार की पुश्तैनी सीट है इसलिए इसे कांग्रेस आसानी से जीत लेगी

राहुल गांधी की अमेठी हार: शर्म... शर्म... शर्म...

बात क्योंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के सन्दर्भ में चल रही है. ऐसे में यदि हम अमेठी लोकसभा सीट का जिक्र न करें तो बात काफी हद तक अधूरी रह जाती है. अमेठी लोकसभा सीट का शुमार देश की उन सीटों में है, जो न सिर्फ हाई प्रोफाइल थी. बल्कि जिसे कांग्रेस के अस्तित्व से भी जोड़कर देखा जाता रहा है. जैसे रुझान सुबह से आ रहे आहे थे, इस देश की जनता को इस बात का अंदाजा खुद लग गया है कि राहुल गांधी अमेठी हार चुके हैं.

अमेठी में राहुल के मुकाबले में भाजपा ने स्मृति ईरानी पर दोबारा दाव खेला था. अमेठी के लगभग 50 फीसदी मतदाताओं ने स्‍मृति इरानी के पक्ष में मतदान किया, और राहुल गांधी 55 हजार वोटों से पराजय हुई.

जैसा अब तक अमेठी सीट का इतिहास रहा है. साथ ही जिस हिसाब से इस सीट को लेकर सारी बातें कांग्रेस पार्टी की साख से जोड़कर देखी जा रही थीं. कह सकते हैं जिस तरह राहुल ने अपना सबसे महत्वपूर्ण दुर्ग गंवाया है वो उनके लिहाज से कई मायनों में बेहद शर्मनाक है.

असली महागठबंधन का इकलौता उम्‍मीदवार

जिस हिसाब से राहुल गांधी ने अमेठी से चुनाव लड़ा ये बात शीशे की तरह साफ है कि यूपी के महागठबंधन के इस मकड़जाल में महागठबंधन के इकलौते और असली उम्मीदवार राहुल गांधी थे. सवाल हो सकता है कि कैसे? तो जवाब है कि अमेठी में लड़ाई राहुल बनाम स्मृति ईरानी थी. चुनाव प्रभावित न हों इसलिए सपा-बसपा-आरएडी महागठबंधन की तरफ से यहां कोई उम्मीदवार उतारा नहीं गया.

जीत की इतनी प्रबल सम्भावना के बावजूद यदि राहुल गांधी ये सीट हार गए हैं तो न सिर्फ राहुल को बल्कि पूरी कांग्रेस पार्टी को इस हार का आत्मसात करना चाहिए और ये सोचना चाहिए कि क्या राहुल का वायनाड भागने का प्लान ही इस हार की एक अहम वजह बना? या फिर उनकी पार्टी का क्षेत्र के विकास को नकारना अमेठी में उनके पतन की वजह बना है.

कांग्रेस के गढ़ अमेठी की हकीकत

अमेठी को कांग्रेस का गढ़ कहा जाता था. साथ ही ये भी कहा जाता था कि ये सीट गांधी परिवार के लिए इतनी सुरक्षित है कि कोई इसे उससे चाहकर भी नहीं छीन सकता. मगर जिस तरह स्मृति ईरानी ने ये भ्रम तोड़ा है साफ पता चलता है कि यहां राहुल को अपने अति आत्मविश्वास का परिणाम भुगतना पड़ा है.

खैर ऐसा नहीं था कि स्मृति ने ये सब ऐसे ही कर लिया. अमेठी के लिए जैसी मेहनत स्मृति ने की है हमारे लिए ये कहना कहीं से भी गलत नहीं है कि सारे देश का चुनाव एक तरह था और अमेठी का चुनाव एक तरफ था. बात अगर इस सीट के इतिहास की हो तो अमेठी लोकसभा सीट पर गांधी परिवार शुरू से ही हावी रहा है. 1967 से लेकर अब तक यहां सिर्फ दो बार ऐसा हुआ है जब कांग्रेस ने लोकसभा का चुनाव न जीता हो.

ध्यान रहे कि 1977 की जनता लहर में भारतीय लोक दल के रवींद्र प्रताप सिंह ने कांग्रेस के संजय गांधी को शिकस्त दी थी. इसके बाद 1998 के आम चुनाव में बीजेपी कैंडिडेट डॉ. संजय सिंह ने कांग्रेस के कैप्टन सतीश शर्मा को हराया था.

इस सीट पर कांग्रेस की पकड़ कितनी मजबूत थी इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि अमूमन इस सीट पर बाकी पार्टियों द्वारा कांग्रेस को वॉकओवर दे दिया जाता था. मगर जब हम इस सीट को 2014 के मद्देनजर देखें तो मिलता है कि तब यहां बीजेपी ने स्मृति इरानी पर दाव खेला था जिन्होंने मुकाबले को रोमांचक बना दिया था. 2014 में स्मृति ने राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी थी और राहुल की जीत का अंतर घटकर करीब 1 लाख 7 हजार वोट पहुंच गया था. राहुल को कुल वैध मतों में से 4 लाख 8 हजार 651 और स्मृति को 3 लाख 748 वोट हासिल हुए थे.

वायनाड का फैसला पलायन ही साबित हुआ

2014 में भले ही राहुल चुनाव जीते हों. मगर कहीं न कहीं उन्हें भी इस बात का अंदाजा था कि अगर वो 2019 में भी कुछ तूफानी करने का प्लान कर रहे हैं तो ये खुद से बेमानी होगी. अमेठी से जुड़ी जिस तरह की ख़बरें और तस्वीरें मीडिया लगातार पेश कर रहा था. आधी कहानी तो उन्होंने बता दी. यदि आज भी अमेठी का अवलोकन किया जाए तो यही मिलता है कि एक लम्बे समय तक शासन करने के बावजूद कांग्रेस ने यहां की जनता के लिए कुछ नहीं किया.

राहुल को अपनी कमियां पता थीं और जिस तरह वो अमेठी के विकास और कल्याण को छोड़कर भगे इसने इस बात को साफ कर दिया कि गंभीर राजनीति कभी भी राहुल का मकसद नहीं थी. पुश्तैनी सीट होने बावजूद जिस तरह का रवैया अमेठी के प्रति राहुल गांधी का रहा है वही इस हार का कारण है.

भले ही आज मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर राहुल केरल पलायन कर गए हों मगर जैसे वो रण को बीच में छोड़कर भागे उसने स्मृति ईरानी की जीत की सम्भावना को और ज्यादा प्रबल कर दिया. जनता को एक बड़ा सन्देश मिला कि यदि वो राहुल को इस चुनाव में जिता भी देती हैं तो कहीं न कहीं उसके भाग्य में केवल धोखा ही आएगा.

प्रेस कान्‍फ्रेंस: हार हुई तो हुई...

जैसे ही खबर लगी कि मिशन 2019 में कांग्रेस नाकाम हुई है  पार्टी की तरफ से प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया. इस बड़ी हार के बाद मीडिया से संबोधित होते हुए राहुल गांधी ने कहा कि,'मैंने चुनाव अभियान में कहा था कि जनता मालिक है. आज जनता ने अपना फैसला दे दिया है. मैं पीएम मोदी को बधाई देता हूं. हमारे जो उम्मीदवार लड़े, उनका धन्यवाद करता हूं. हमारी लड़ाई विचारधारा की लड़ाई है. हमें मानना पड़ेगा कि इस चुनाव में मोदी जीते हैं.

पत्रकार वार्ता में जब राहुल से अमेठी को लेकर सवाल हुआ तो उन्होंने बेफिक्री दिखाते हुए कहा कि, अमेठी में स्मृति ईरानी जीत गई हैं. मैं चाहता हूं कि प्यार से अमेठी की जनता की देखभाल करें. इसके अलावा भाजपा की इस जीत पर तंज करते हुए राहुल ने ये भी कहा है कि, 'क्या गलत हुआ है इस पर मैं आज कुछ नहीं कहूंगा, आज ही रिजल्ट आया है, इस पर आज मैं टिप्पणी नहीं करूंगा. जनता मालिक है जनता ने साफ फैसला दिया है.'

भले ही इस प्रेस कांफ्रेंस में राहुल ने अपनी हार स्वीकार कर ली हो मगर जब उनके बातचीत करने के अंदाज पर गौर किया जाए तो मिलता है कि जैसे उन्हें इस हार का कोई फर्क ही नहीं पड़ता है और ये चुनाव, चुनाव न होकर कोई हंसी खेल की बात हो.

उत्‍तर भारत से कांग्रेस का सफाया

2019 के चुनाव में भले ही जनता ने भाजपा को भारी मैंडेट दिया हो. मगर जब हम कांग्रेस को देखें तो मिल रहा है कि क्या राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और क्या उत्तराखंड और बिहार सम्पूर्ण उत्तर भारत में जैसा हाल है मिल रहा है कि जनता ने राहुल गांधी और उनकी पार्टी को उसकी नीतियों के कारण सिरे से खारिज कर दिया है.

जनादेश बता रहा है कि उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो चुका है और जो बढ़त कांग्रेस ने बनाई है वो भी दक्षिण के केरल में बनाई है.

विपक्ष का नेता होना भी है एक बड़ी चुनौती

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व के कारण कांग्रेस और राहुल गांधी का क्या हाल हुआ है. इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि अब विपक्ष को अपना नेता चुनने में तमाम तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. चूंकि विपक्ष का नेता चुने जाने के लिए कांग्रेस को 55 सीटों की दरकार थी और वो 50 सीट ही ला पाई है इसलिए 2019 के इन चुनावों के बाद उसे ठीक वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ेगा जैसा उसके साथ 2014 के बाद हुआ था.

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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