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Updated: 06 अक्टूबर, 2019 07:38 PM
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यूपी और बिहार में बाढ़ से तबाही के बीच दो शहरों में बारिश से हुए जलजमाव की तस्वीरें खूब शेयर की जा रही हैं - एक वाराणसी और दो पटना की. वाराणसी में तो स्थिति ज्यादा खराब नहीं रही, उसके मुकाबले पटना में बहुत बुरा हाल हो गया है. इससे बुरा क्या कहा जाये कि शहर में नाव चल रही हो और लोग घरों में कैद होकर रह जायें - और कई लोगों को तो NDRF की टीम को पहुंच कर सुरक्षित निकालना पड़ा है.

चमकी बुखार से बच्चों की हुई मौत के बाद, पटना की हालत को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार निशाने पर हैं. मुश्किल ये है कि नीतीश कुमार ऐसी समस्याओं से जुड़े सवालों का या तो जवाब नहीं देते या फिर सवाल पर ही सवाल खड़े कर देते हैं. ऐसे हालात में नीतीश कुमार और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के समस्याओं को खारिज करने का अंदाज एक जैसा होता है. गोरखपुर में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत पर योगी आदित्यनाथ और चमकी बुखार पर नीतीश कुमार के रिएक्शन एक ही जैसे देखे गये.

नवरात्र के आखिरी दिन पटना में देवी दर्शन करने निकले नीतीश कुमार से जब शहर की हालत पर सवाल हुए तो खुद खामोश हो गये और सुरक्षाकर्मियों को आगे कर दिये. नीतीश कुमार को मालूम होना चाहिये कि वो योगी आदित्यनाथ नहीं हैं, जिन पर हाथ डालने से पहले बीजेपी नेतृत्व को दो बार सोचना होगा - नीतीश को तो किनारे लगाने की बीजेपी में कब से रणनीतियां तैयार हो रही हैं - और गिरिराज सिंह के ट्वीट तो मिसाल भर हैं.

बेहतर तो ये होता कि बिहार विधानसभा के 2020 के चुनाव की तैयारी कर रहे नीतीश कुमार ऐसे नाजुक मौके पर अपने दोस्त नवीन पटनायक से कुछ टिप्स लेते. ध्यान रहे एनडीए का हिस्सा नहीं होने के बावजूद नवीन पटनायक ने राज्य सभा के उपसभापति चुनाव में जेडीयू कोटे से एनडीए उम्मीदवार हरिवंश सिंह का सपोर्ट किया था. नीतीश के लिए नवीन पटनायक से सीखने वाली बात चुनावों से पहले ओडिशा में फानी तूफान के आने से पहले बचाव के एहतियाती उपाय हैं जिसकी पार्टी लाइन से अलग हटते हुए देश में तो तारीफ हुई ही - दुनिया भर में उसका गुणगान हुआ.

शारदा सिन्हा और सुशील मोदी बचा लिये गये, बाकियों को कौन पूछे

ओडिशा के फानी तूफान और पटना में बारिश का पानी जमा होने की चुनौतियों में जमीन आसमान का फर्क है. तूफान को लेकर पहले से सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन उसके खिलाफ बांध नहीं बनाया जा सकता. बाढ़ को भी बांध बनाकर रोका जा सकता है, लेकिन तूफान को नहीं. मगर, इसमें तो कोई शक नहीं होना चाहिये कि शहर में ऐसे उपाय किये जा सकते हैं जिससे बारिश का पानी तो निकल ही जाये. हो सकता है बारिश की मात्रा इतनी हो कि पानी निकलने में थोड़ा वक्त लग जाये लेकिन तब क्या कहा जाये जब बारिश का पानी बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दे. ये तो ऐसे ही माना जाएगा कि सुशासन के नाम पर प्रशासन सोता रहा और जब आम लोगों की नींद खुली मालूम हुआ वे तो घरों से बाहर जा भी नहीं सकते.

पिछले हफ्ते की ही बात है. खबर आयी कि मशहूर भोजपुरी गायिका शारदा सिन्हा अपने घर में फंस गयी हैं. फेसबुक पर अपील कर शारदा सिन्हा ने बताया कि कैसे वो अपने घर में घिरी हुई हैं - उनकी दवाइयां खत्म हो गयी हैं और चारों तरफ से आ रहे बदबू के मारे वहां रहना मुश्किल हो रहा है. बहरहाल, बचावकर्मी पहुंचे और शारदा सिन्हा और उनके पति को सुरक्षित निकाल लिया गया.

sushil modi also a flood victimजब सुशील मोदी को घर छोड़ कर निकलना पड़े तो पटना की हालत समझी जा सकती है

शारदा सिन्हा वाली घटना के ही आस-पास एक तस्वीर वायरल हुई. बिहार के डिप्टी सीएम अपने परिवार के साथ सूटकेस लेकर बचाव दल के साथ सुरक्षित स्थान पर शरण लेने जा रहे थे. ये तो आलम है सूबे का डिप्टी सीएम अपने घर में फंस जाता है - और बचाव दल को मदद के लिए पहुंचना पड़ता है. अब ये सवाल दीगर है कि डिप्टी सीएम अपने परिवार के साथ किसी सुरक्षित स्थान पर चला जाता है और उसके आवास पर तैनात कर्मचारी अपनी किस्मत को कोस रहे होते हैं. ठीक वैसा ही हाल डिप्टी सीएम के मोहल्ले के लोगों का भी होता है - जो बाद में भी मुश्किलों से दो-चार होते रहे.

पटना के दानापुर इलाके के लोगों ने गोला रोड पर सड़क जाम कर विरोध जताया. गुस्से में लोगों ने टायर जलाये और नीतीश सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की - लेकिन फर्क क्या पड़ता है.

भागलपुर में तो एक जगह गुस्से से बेकाबू बाढ़ पीड़ितों ने एसडीएम पर ही हमला बोल दिया और सुरक्षा गार्डो को जैसे तैसे अफसर को सुरक्षित निकालना पड़ा. ये तब की घटना है जब एसडीएम बाढ़ की स्थिति का जायजा लेने जा रहे थे.

लोगों का ये गुस्सा छिटपुट नजर आ रहा है - सड़क पर फूटा नहीं है शायद इसलिए भी क्योंकि सड़क तो पानी से डूबी हुई है और वहां नाव चल रही है.

लोग अपने हाल पर लेकिन राजनीति शबाब पर है

नवरात्र के आखिरी दिन नीतीश कुमार पटना के मंदिरों में दर्शन के लिए निकले थे. नीतीश कुमार ने शहर के मां शीतला मंदिर, बड़ी पटना देवी, छोटी पटना देवी मंदिरों में विधि विधान से पूजा अर्चना की.

जब बिहार में बाढ़ और पटना की दुर्दशा को लेकर मीडिया ने सवाल किया तो नीतीश कुमार खामोश हो गये और उनके सुरक्षकर्मियों की ताकत बोलने लगी. सवालों के जवाब सुरक्षाकर्मियों ने बलपूर्वक दिया और चलते बने.

वैसे भी नीतीश कुमार ने जब भी ऐसे सवालों के जवाब दिये हैं वो तो बस जैसे तैसे पल्ला झाड़ कर बच निकलने की तरकीब ही लगती है. नीतीश कुमार के ऐसे दो जवाबों पर गौर फरमाया जा सकता है -

1. "मैं बस आप लोगों से इतना पूछना चाहता हूं कि कि देश के साथ-साथ विश्व के किन-किन हिस्सों में बाढ़ आई थी? क्या पटना के कुछ इलाकों में बारिश के बाद जमा पानी ही हमारे लिए अकेली और सबसे बड़ी समस्या है? अमेरिका में क्या हुआ?"

2. "मुंबई भी डूबती है तब कोई क्यों नहीं बोलता है?"

चमकी बुखार के वक्त जेडीयू नेताओं को जरूर इस बात से ताज्जुब होता रहा कि जब स्वास्थ्य मंत्री बीजेपी कोटे से हैं तो सवाल सिर्फ नीतीश कुमार पर ही क्यों उठाये जा रहे हैं. अब तो बाढ़ और बारिश को लेकर जिसकी जिम्मेदारी बनती है - संजय झा, वो तो जेडीयू से ही आते हैं.

राजनीति तो होनी ही है. बीजेपी नेता जल जमाव का सारा ठीकरा नीतीश कुमार के सिर पर इसलिए भी फोड़ना चाहते हैं क्योंकि नगर विकास मंत्रालय बीजेपी के कोटे में हैं, नगर निगम की मेयर और शहर के विधायक भी तो बीजेपी के ही हैं. हो सकता है नीतीश कुमार और उनके साथ ये सब सबूत इकट्ठा करके रखे हों चुनावों में बीजेपी को कठघरे में खड़ा करने के लिए.

बड़ी से मुसीबत से लोग आखिरकार उबर ही जाते हैं. वक्त हर घाव भर देता है क्योंकि राजनीति को भले न परवाह हो कुदरत ख्याल जरूर रखती है. मुश्किल तो ये है कि लोगों को ये बात वोट देते वक्त याद नहीं रहती और राजनीतिक दल इसी बात का सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं - क्या हो अगर 2020 में EVM का बटन दबाने से पहले ये मुश्किलें अचानक याद आ जायें!

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