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Updated: 12 सितम्बर, 2019 04:41 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का पूरा जोर अभी महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड की चुनावी राजनीति पर है. स्वाभाविक भी है, चुनाव भी तो पहले वहीं होने हैं - लेकिन मौजूदा बीजेपी नेतृत्व बड़े दूरगामी सोच के साथ आगे बढ़ रहा है. तभी तो प्रधानमंत्री मथुरा में होते हैं और बिहार से लेकर बंगाल तक को भी अपने सियासी निशाने पर बड़े आराम से साथ लेते हैं - आखिर 'गाय' और 'ऊं' तो सर्वव्यापी हैं ही. अब जिसे जब करंट लगे वो अपनी खैर की सोचे और उसके हिसाब से तैयारी करता फिरे.

महाराष्ट्र में आदित्य ठाकरे के अरमानों पर पानी फेरते हुए सस्ते में निबटाने के बाद मोदी और शाह ने थोड़ी सी दिव्य दृष्टि बिहार की ओर भी बढ़ाई. बिहार में बीजेपी एमएलसी संजय पासवान को इसमें 'राणा की पुतली फिरी नहीं तब तक चेतक मुड़ जाता था' वाली फीलिंग दिखी और फटाफट नीतीश कुमार के खिलाफ शुरू हो गये. कुछ देर के लिए बीजेपी हाईकमान ने दिल्ली से डोर ढीली कर छोड़े रखी. नीतीश कुमार की टीम भी हरकत में आ चुकी थी. बता भी डाला कि संजय पासवान होते ही कौन हैं - बीजेपी की ओर से कोई कहे तब तो सोचा जाये?

मौके की नजाकत को देखते हुए सुशील मोदी ने एंट्री मारी - और संजय पासवान के दिये जख्मों पर मरहम लगाते हुए साफ साफ कह दिया - 'बिहार में तो NDA के कैप्टन नीतीश कुमार ही हैं.' नीतीश के जेडीयू साथी तो यही बात बीजेपी को आम चुनाव के पहले से समझा रहे हैं - सोच रहे होंगे, पहली बार में कोई समझता क्यों नहीं?

नीतीश कुमार और उद्धव ठाकरे में बड़ा फर्क है

2013 में जब नीतीश कुमार की नरेंद्र मोदी से शुरुआती खटपट चल रही थी तो किसी ने चाय बेचने को लेकर उनकी राय जाननी चाही. नीतीश कुमार का जवाब था - 'आते तो हम लोग भी साधारण परिवार से ही हैं... अब चाय बेचने का कोई अनुभव तो नहीं हैं!' नीतीश कुमार का मैसेज साफ था - हम जैसे हैं वैसे ही हैं उससे अलग नहीं हो सकते. नीतीश कुमार अपनी सुविधा के हिसाब से एनडीए में बने हुए हैं और बीजेपी नेतृत्व को भी उनकी अहमियत अच्छी तरह पता है.

मुमकिन है बिहार में नीतीश कुमार को चाणक्य कहे जाने की बात को मोदी-शाह हल्के में लेते हों - लेकिन हकीकत तो यही है कि नीतीश कुमार एक बार फिर ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं कि एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए ही महत्वपूर्ण बने हुए हैं.

नीतीश कुमार आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह और शिवानंद तिवारी के तीखे हमलों के सदाबहार टारगेट हुआ करते हैं - लेकिन ये दोनों ही इन दिनों खुलेआम जेडीयू नेता को महागठबंधन का न्योता दे रहे हैं. रघुवंश प्रसाद सिंह तो एक तरह से लालू प्रसाद की जबान ही माने जाते हैं. नीतीश कुमार जब महागठबंधन में हुआ करते थे तब भी लालू प्रसाद का संदेश रघुवंश प्रसाद की जबान से होकर ही गुजरता था. अब भी यही लगता है कि रघुवंश प्रसाद और शिवानंद तिवारी के बयान लालू प्रसाद ने ही अप्रूव किये होंगे - और इसमें तस्वीर का दूसरा पहलू भी काफी दिलचस्प लगता है. तेजस्वी यादव भले ही ट्विटर पर नीतीश कुमार से सवाल पूछा करें - और जेडीयू के पोस्टर का जवाब भी पोस्टर से ही दिलवायें, लेकिन महागठबंधन में लालू प्रसाद खुद की गैरमौजूदगी और नीतीश कुमार की कमी शिद्दत से महसूस कर रहे हैं.

jdu and rjd poster in patnaबीजेपी को रास नहीं आया पोस्टर के जरिये नीतीश कुमार का बखान

बीजेपी नेतृत्व के लिए उद्धव ठाकरे को हैंडल करना और नीतीश कुमार से पार पाना एक जैसा बिलुकल नहीं है. ये वही नीतीश कुमार हैं जो डंके की चोट पर नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए से अलग होकर और चुनावी मैदान में शिकस्त भी दे चुके हैं.

उद्धव ठाकरे अगर उसी लाइन की राजनीति नहीं करते जो बीजेपी की विचारधारा है, तो लगता नहीं कि मोदी-शाह शिवसेना नेता का लिहाज भी करने के बारे में सोचते. परिवारवाद की राजनीति हमेशा मोदी-शाह के निशाने पर होती है जिसमें नीतीश कुमार को तो छुआ भी नहीं जा सकता, लेकिन उद्धव ठाकरे की पृष्ठभूमि तो वही है.

आखिर उद्धव ठाकरे की राजनीति भी तो अब तक पिता की विरासत संभाले रखने वाली ही है. देखा जाये तो उद्धव ठाकरे से कहीं ज्यादा प्रयोग राहुल गांधी ने राजनीति में किये हैं और उसका खामियाजा भी भुगत रहे हैं. उद्धव ठाकरे ने राहुल गांधी की तरह कोई जोखिम तो कभी उठायी नहीं, इसलिए महाराष्ट्र की राजनीति के मौसम वैज्ञानिक भी बने हुए हैं. अगर राहुल गांधी की तरह उद्धव ठाकरे भी प्रयोग किये होते तो नतीजा वही होता जो राज ठाकरे के खाते में बैलेंस है. माना जा सकता है कि शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे अच्छी तरह जानते थे कि उद्धव की सीमाएं क्या हैं - और राज के तेवर कैसे हैं?

राजनीति में अति सुरक्षित खेल दिखाते हुए उद्धव ठाकरे ने बेटे का डेब्यू फ्लॉप न हो इसका भी इंतजाम कर लिया है. ये समझते हुए कि तात्कालिक तौर पर सपने उतने ही देखने चाहिये जितनी अपनी सीमाएं हों - कुछ सपने भविष्य के लिए भी बचाकर रखे जाने चाहिये. उद्धव को पता है बीजेपी का मौजूदा नेतृत्व सिर्फ 'मन की बात' करता है, मर्जी के खिलाफ कुछ भी बर्दाश्त नहीं कर पाता - फिर चुनाव में जोखिम उठाने की क्या जरूरत है.

फिर तो लगता है उद्धव ठाकरे भी राहुल गांधी के ही थोड़े सुधरे हुए स्वरूप हैं - और मोदी-शाह के साथ साथ वो तेजस्वी यादव या फिर अखिलेश यादव जैसे नेताओं की राजनीति को बारीकी से देखते हैं - लेकिन किसी भी सूरत में नीतीश कुमार बनने की कोशिश नहीं करते हैं. थोड़ी हेकड़ी दिखानी भी होती है तो एक सीमा तक ही - फिर तो यू-टर्न से सुरक्षित तरीका कोई और तो है भी नहीं. ट्रैफिक के नियम ढीले हों या नये तरीके से सख्ती भरे, सियासत के यू-टर्न बेहद सुरक्षित होते हैं.

अभी तो नीतीश और बीजेपी दोनों एक दूसरे की मजबूरी हैं - आगे 'जय श्रीराम' जानें!

बिहार की राजनीति जिस मोड़ से गुजर रही है, नीतीश कुमार और बीजेपी नेतृत्व दोनों के सामने एक ही चुनौती है और एक ही सवाल भी - 'क्या दोनों एक दूसरे के बगैर बिहार में टिके रह सकते हैं?

ये सवाल दोनों के सामने लंबे अरसे से बना हुआ है और अभी तक जवाब 'नहीं' ही है. ये बीजेपी भी जानती है कि 'मोदी लहर' अभी तेजी से चल रही है और दोबारा बहुमत हासिल करने के बाद इसकी शेल्फ लाइफ भी तुलनात्मक रूप से ज्यादा है. ये नीतीश कुमार भी जानते हैं कि महागठबंधन से बार बार न्योता मिलने के बावजूद वो एनडीए में महागठबंधन की तुलना में ज्यादा सहज हैं.

नीतीश कुमार के लिए वैसे भी तेजस्वी और तेज प्रताप यादव के मुकाबले सुशील मोदी और संजय पासवान से डील करना बहुत ही ज्यादा आसान है. महागठबंधन में होने पर तेजस्वी और तेज प्रताप के दखल देने की कोई हद नहीं होती, दूसरी तरफ सुशील मोंदी एक सीमा के बाहर तब तक अपना राजनीतिक दायरा नहीं बढ़ाते जब तक ऊपर से कोई सख्त हिदायत नहीं मिली हो.

नीतीश कुमार की ही तरह बीजेपी के सामने भी कुछ मजबूरियां हैं - कुछ सवाल हैं जिनका जवाब बरसों से नहीं मिल पाया है और न ही निकट भविष्य में कहीं दिखायी दे रहा है.

क्या बीजेपी के पास नीतीश कुमार का विकल्प तैयार हो चुका है और वो चुनाव में उतरने से पहले ही उसे आजमाने की तैयारी कर रही है? और क्या बीजेपी नीतीश कुमार के संभावित तात्कालिक विकल्प पर इतना यकीन कर सकती है कि वो बड़ा जोखिम उठा सके?

संजय पासवान के बहस में कूदने से पहले बीजेपी के सीनियर नेता डॉ. सीपी ठाकुर ने जेडीयू और आरजेडी के पोस्टर वार पर कड़े लहजे में रिएक्ट किया था. सीपी ठाकुर को आरजेडी के पोस्टर से ज्यादा जेडीयू के पोस्टर से आपत्ति रही. सीपी ठाकुर का कहना रहा कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर अच्छा काम कर रहे हैं फिर नीतीश कुमार को नये सिरे से गढ़ने का कोई तुक नहीं बनता.

संजय पासवान ने तो नीतीश कुमार की लंबी पारी की दुहाई देते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने की ही सलाह दे डाली थी. हालांकि, उसे अपनी निजी राय भी बताया था. संजय पासवान की दलील रही कि लगातार तीन कार्यकाल तक बीजेपी नीतीश कुमार के लिए खड़ी रही - अब वक्त आ चुका है कि वो बदले में बीजेपी को भी एक मौका दें. साथ में, ये इशारा भी रहा कि लोक सभा चुनाव में जीत के लिए नीतीश कुमार को भी प्रधानमंत्री मोदी के नाम की जरूरत रही और तभी जेडीयू अपने हिस्से की 17 में से 16 सीटें जीत भी पायी. बीजेपी ने सभी 17 सीटें जीती थी.

जब नीतीश कुमार को लेकर बहस बिहार में मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बनने लगी तो डिप्टी सीएम और बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी डैमेज कंट्रोल वाले अंदाज में सामने आये और जेडीयू नेताओं की अपेक्षा के अनुरूप ट्विटर पर बयान जारी किया - 'बिहार में एनडीए के कैप्टन नीतीश कुमार हैं और 2020 के विधानसभा चुनाव में भी वही कैप्टन रहेंगे. जब कैप्टन अपनी पारी में विरोधियों को हरा रहा है तो बदलाव का सवाल कहां पैदा होता है?'

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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