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Updated: 14 अगस्त, 2022 11:13 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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केंद्र की सत्ता को अलग रख कर भी देखें, तो बतौर विपक्ष बीजेपी बिहार में बड़ी ही मजबूत स्थिति में है. फर्ज कीजिये केंद्र में सत्ता राहुल गांधी के हाथ में होती और बीजेपी बिहार वाली स्थिति में संसद में भी होती - क्या वो राहुल गांधी का हाल भी उद्धव ठाकरे जैसा नहीं कर चुकी होती?

हेमंत सोरेन के साथ तो झारखंड में बीजेपी वैसे ही पेश आ रही है, अगर यूपी में अखिलेश यादव सत्ता में वापसी कर भी लिये होते तो उनका हाल भी उद्धव ठाकरे जैसा ही हो सकता था - और नीतीश कुमार के मन में भी ऐसे ही मिलते जुलते ख्यालात चल रहे होंगे.

दरअसल, ये सिर्फ ईडी-सीबीआई-आईटी का ही डर नहीं है, ये तो कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का दबदबा है जिसकी बदौलत शिवसेना ने राजनीति में जगह बनायी और एक दिन ऐसा भी आया जब एक शिवसैनिक के रूप में उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर खुद ही बैठ गये.

जरा अरविंद केजरीवाल की तरफ भी देखिये. आये थे राजनीति में भ्रष्टाचार खत्म करने और जय श्रीराम के नारे लगाने लगे. ये हिंदुत्व की राजनीति का प्रभाव नहीं है तो क्या है. केजरीवाल ने ये चीज पहले ही समझ ली है - और प्रधानमंत्री पद के साथी दावेदारों में सबसे सफल माने भी जा सकते हैं.

ये भी समझ लेना चाहिये कि बीजेपी परिवारवाद की राजनीति पर हमला सिर्फ इसलिए ही नहीं बोल रही है - क्योंकि लोगों को ये सब समझाना काफी आसान है. बल्कि, इसलिए क्योंकि परिवारवाद की बदौलत राजनीति में आये नेता बड़े ही कच्चे खिलाड़ी होते हैं - चिराग पासवान और उद्धव ठाकरे ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरण हैं.

दिमाग तो बीजेपी वाले तमिलनाडु पर भी लगा ही रहे होंगे क्योंकि एमके स्टालिन भी तो परिवारवाद की राजनीति से ही सीएम की कुर्सी तक पहुंचे हैं, लेकिन स्टालिन के साथ हिंदी विरोध की ताकत है - और बीजेपी दक्षिण की कल्ट-पॉलिटिक्स में अपनेआप बाहरी बन जाती है.

खानदानी सियासत के वारिसों में तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) अगर 2020 में मुख्यमंत्री बने होते तो शायद बीजेपी के लिए थोड़ा मुश्किल होता - तब भी जबकि मोदी-शाह (Modi and Shah) ने भूपेंद्र यादव से लेकर नित्यानंद राय जैसे नेताओं को मोर्चे पर तैनात कर रखा है, ताकि लालू परिवार की राजनीति को नेस्तनाबूद किया जा सके. बिहार के राजनीतिक मैदान में भूपेंद्र यादव दुधारी तलवार लेकर उतरे थे. एक तरफ लालू यादव की राजनीतिक विरासत खत्म करने तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार को ठिकाने लगाने.

अपने खिलाफ बीजेपी की साजिशों से तो नीतीश कुमार (Nitish Kumar) रू-ब-रू थे ही, अपने जैसे बीजेपी पीड़ितों के साथ जो कुछ हो रहा था उससे भी बखूबी वाकिफ थे - लिहाजा चुपचाप अपने मिशन में जुट गये और तब तक सांस नहीं लिये जब तक की पक्का बंदोबस्त नहीं कर लिये.

बिहार में नीतीश का सीक्रेट मिशन

एक स्वाभाविक सवाल है जो बहुतों के मन में उठा होगा. जब नीतीश कुमार बीजेपी की हरकतों से इतने ही परेशान थे तो 2020 के विधानसभा चुनावों के तत्काल बाद गठबंधन क्यों नहीं तोड़ लिये? आखिर उद्धव ठाकरे ने तो ऐसा ही किया था. नीतीश कुमार ने वही काम तब जाकर किया जब बीजेपी ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की सरकार गिरा दी.

अगर नीतीश भी बिलकुल वैसा ही करते तो उद्धव ठाकरे और उनकी राजनीति में फर्क ही क्या होता?

Nitish Kumar, narendra modi, amit shah2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार पर थाली खींच लेने का आरोप लगाया था, इस बार तो पैरों तले जमीन ही खींच ली है.

असल में नीतीश कुमार बारीकी से बीजेपी की हर चाल पर गौर फरमा रहे थे और सब कुछ अपने संदर्भ में कैलकुलेट भी करते जा रहे थे. बीजेपी किस हद तक जा सकती है, इसका भी लगातार आकलन कर रहे थे. जैसे शतरंज की बाजी में हर खिलाड़ी की नजर घोड़े की चाल पर टिकी होती है, नीतीश कुमार भी बीजेपी की हर संभावित रणनीति का ध्यान रखते हुए धीरे धीरे अपनी चाल चल रहे थे.

ये तो मानना ही पड़ेगा कि नीतीश कुमार ने जो काम अभी किया है, अगर 2020 में ही कर दिये होते तो बीजेपी बिहार में अभी की तरह बेबस नजर नहीं आती. है कि नहीं?

बिहार में बीजेपी आंकड़ों से खेल रही थी, लेकिन नीतीश कुमार बहुत आगे की बाजी प्लान करके चल रहे थे. नंबर गेम पर तो उनकी भी तिरछी नजर थी ही. बीजेपी अपने हिसाब से नंबर गेम में जुटी थी, नीतीश के नंबर गेम का निशाना कहीं और ही था. भनक किसी को नहीं लग सकी.

2020 के चुनाव में बीजेपी को जो करना था कर चुकी थी. बीजेपी के हिस्से में करने के नाम पर बहुत कुछ बचा भी नहीं था. फिर तो बारी नीतीश कुमार की थी. नीतीश कुमार से AIMIM विधायकों का शुरू से ही मिलना जुलना शुरू हो गया था - कई बार तो ऐसा लगा कि वे जेडीयू ज्वाइन कर ही लेंगे. फिर कुछ दिन बीत जाता तो मामला ठंडा लगने लगता.

अगर AIMIM के विधायक नीतीश कुमार की पार्टी ज्वाइन कर लेते तो बीजेपी और जेडीयू के बीच का फासला थोड़ा कम हो सकता था - लेकिन नीतीश कुमार ने ऐसा कुछ नहीं होने दिया. होने ही क्यों देते भला? नीतीश कुमार की नजर तो कहीं और ही टिकी हुई थी.

नीतीश कुमार ने एक काम जरूर किया कि चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी के एकमात्र विधायक को जेडीयू में ले लिया. हो सकता है नीतीश कुमार को लगा हो कि अगर वो चुप रहे तो अकेला विधायक क्या भी करेगा. ये भी संभव था कि कभी न कभी बीजेपी ही उसे अपने साथ ले लेती. ऐसे ख्याल नीतीश कुमार के मन में आने के मजबूत तर्क भी थे. जब बीजेपी बिहार में नीतीश कुमार के साथ चुनावी गठबंधन और सत्ता में साझीदार होते हुए भी अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू के 6 विधायकों को सीधे हजम कर सकती है तो चिराग पासवान के विधायक में ऐसी क्या कमी थी जो यूं ही भटकने के लिए छोड़ देती.

लेकिन ये तो मानना पड़ेगा, नीतीश कुमार ने मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी की तरफ कभी ऐसी नजरों से नहीं देखा. बल्कि उनके आदमी मुकेश सहनी को भड़काते रहे - और अंजाम वही हुआ जो नीतीश कुमार चाहते थे.

नीतीश कुमार ने बीजेपी के कहने पर मुकेश सहनी को मंत्रिमंडल से हटा दिया - और आरजेडी को खुश भी कर दिया. मुकेश सहनी टिकट बंटवारे के मौके पर ही महागठबंधन छोड़ कर निकले थे और तभी बीजेपी ने हाथोंहाथ ले लिया था.

नीतीश कुमार भी ये जानते ही थे कि वीआईपी विधायक थे तो मूल रूप से बीजेपी के ही, मुकेश कुमार ने तो बस चुनाव खर्च वहन किया था. हुआ ये कि वीआईपी विधायकों को साथ लेकर बीजेपी बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन भी गयी.

बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर खुशी से फूले नहीं समा रही होगी और नीतीश कुमार मंद मंद वैसे ही मुस्कुरा रहे होंगे जैसे उनको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक चुनावी मंच पर देखा गया था. उस चुनावी रैली में जब मोदी सहित सारे नेता बीजेपी के पसंदीदा नारे लगा रहे थे तो नीतीश कुमार भी मंच पर बैठे हुए थे. लेकिन नीतीश कुमार ने ममता बनर्जी जैसी कोई हरकत नहीं की, न ही किसी तरह का विरोध ही जताया. मजबूर भी थे. चुप रहे. मजबूरी में चुप्पी बहुत बड़ा सपोर्ट होती है.

नीतीश के धैर्य की एक वजह ये भी हो सकती है कि उनके मन में कुछ और ही चल रहा था - वो तो आरजेडी को बीजेपी से भी बड़ी पार्टी बनाने के मिशन में जुटे हुए थे. बड़ी चीजों के लिए छोटी छोटी बातें तो नजरअंदाज करनी ही पड़ती हैं.

...और आरजेडी फिर से बीजेपी से बड़ी हो गयी

2020 के चुनाव में बीजेपी आरजेडी से पिछड़ गयी थी, सिर्फ एक सीट से. जैसे ही मौका मिला बिहार विधानसभा वीआईपी का जीरो बैलेंस कर बीजेपी ने आरजेडी को पछाड़ भी दिया - और कुछ ही दिन बाद खेल ऐसा हुआ कि असदुद्दीन ओवैसी के विधायकों ने बाजी एक बार फिर पलट दी. आरजेडी फिर से बिहार की सबसे बड़ी पार्टी हो गयी.

बेशक तेजस्वी यादव काफी मैच्योर हो चुके हैं - और लालू के बेटे होने के साये से निकलने की कोशिश भी कर रहे हैं. काफी हद तक कामयाब भी हो रहे हैं - और ये सब चुनावी पोस्टर से लालू-राबड़ी की तस्वीर हटाने भर से नहीं या फिर जंगलराज के लिए माफी मांगने भर से नहीं बल्कि 'पलटू' चाचा नीतीश कुमार के परदे के पीछे मुहैया कराये गये सपोर्ट से.

तेजस्वी यादव आखिर नीतीश कुमार के भाई जैसे दोस्त के बेटे जो हैं - विधानसभा में गुस्से में तमतमाये नीतीश कुमार ने तेजस्वी के लिए ऐसा ही बोल कर क्रोध पर काबू पाने की कोशिश की थी. ये तब की बात है जब नीतीश कुमार के चुनावी भाषणों को लेकर तेजस्वी यादव निजी हमलों पर उतर आये थे.

असल बात तो ये है कि AIMIM विधायकों के आरजेडी ज्वाइन कराने वाले मास्टरमाइंड नीतीश कुमार ही हैं - और बताते हैं कि ऐसा करने से पहले नीतीश ने बाकायदा ओवैसी की मंजूरी भी ली थी. और ये कोई छिपी हुई बात नहीं है, मीडिया में भी अब ये जानकारी आ चुकी है.

एकबारगी तो ये बात हैरान करती है कि नीतीश कुमार ने AIMIM विधायकों को जेडीयू में शामिल कराने के बजाय आरजेडी के हिस्से में क्यों जाने दिया? जाने क्या दिया, बल्कि जाने का पूरा प्रबंध भी नीतीश कुमार ने खुद ही किया था.

क्या ये सब करके नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव को गठबंधन के लिए राजी करने के मकसद से भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे थे? हो सकता है तब नीतीश कुमार ने ये बात किसी को बतायी भी न हो कि AIMIM विधायकों को आरजेडी के साथ जाने देने के पीछे उनके दिमाग में चल क्या रहा है?

असल बात तो ये रही कि नीतीश कुमार बीजेपी के हाथ पैर बांध कर बिहार की सत्ता से दूर करने का पुख्ता बंदोबस्त कर चुके थे - और ऐसा कोई लूपहोल नहीं छोड़ना चाहते थे जिसकी वजह से बीजेपी नेतृत्व उनके खुफिया मिशन में अड़ंगा डालने की कोशिश भी कर पाये.

नीतीश कुमार के दिमाग में ये बात रही होगी कि केंद्र की सत्ता पर काबिज लोगों के पास जांच एजेंसियों के अलावा राज्यपाल नाम का एक ब्रह्मास्त्र भी होता है जो विशेष परिस्थितियों में काम आता है. जब हर दांव फेल हो जाये, तब काम भी वही जुगाड़ आता है.

नीतीश कुमार के मन में ये डर भी बना हुआ था कि कहीं ऐसा न हो जाये कि मामला राज्यपाल के हाथ में चला जाये और वो केंद्र सरकार के पास राष्ट्रपति शासन की सिफारिश न भेज दें. केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के पास विपक्ष को सत्ता से दूर रखने के मामले में ये बेहतरीन तकनीकी रास्ता होता है.

ऐसे में नीतीश को सबसे पहले हर संभव प्रतिकूल परिस्थिति के लिए सेफगार्ड तैयार करने थे. नीतीश कुमार अपने लंबे राजनीतिक जीवन में राज भवन में होने वाले कारनामों को काफी करीब से देख चुके हैं - और बूटा सिंह को तो बिहार के राज्यपाल के रूप में ही ज्यादा याद किया जाता है.

राजनीति के पक्के खिलाड़ी नीतीश कुमार जानते थे कि मुख्यमंत्री पद से उनके इस्तीफे की सूरत में राज्यपाल फागू चौहान सबसे बड़ी पार्टी को ही सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे. नियम भी तो यही कहता है. अगर नीतीश गठबंधन का नेता होने के आधार पर भी दावा पेश करते तो भी तरजीह बीजेपी को ही मिलती. जब तक कि बीजेपी बिहार में सबसे बड़ी पार्टी रही.

ये नौबत न आये इसलिए नीतीश कुमार ने आखिरी बाजी चलने से पहले बीजेपी की जगह आरजेडी को सबसे बड़ी पार्टी बना दिया - यूं ही कोई चाणक्य बन भी तो नहीं जाता!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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