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Updated: 12 जनवरी, 2021 04:47 PM
मशाहिद अब्बास
मशाहिद अब्बास
  @masahid.abbas
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नेपाल के प्रधानमंत्री (KP Oli) की जिस तरह से कुर्सी डोल रही है वैसे ही उनकी ज़बान भी, अयोध्या जैसे भारत के पवित्र शहर के नेपाल में होने का दावा करने वाले नेपाली प्रधानमंत्री ने एक बार फिर Kalapani, Limpiyadhura और Lipulekh पर दावा जता दिया है. नेपाल में इस समय राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है. सियासी संकट के बीच ही प्रधानमंत्री ओली को नेशनल असेंबली को संबोधित करने का मौका मिला. इसमें उन्हें देश के सियासी संकट पर बात करनी थी. 20 दिसंबर 2020 को ही नेपाल के राष्ट्रपति विधा देवी भंडारी ने प्रधानमंत्री ओली के ही सिफारिश पर संसद को भंग कर दिया था और अप्रैल-मई 2021 में चुनावों का ऐलान कर दिया था. नेपाल में इस समय राजनीतिक हलचल तेज़ है. दरअसल संसद को भंग करने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि सत्ता पर काबिज कम्युनिस्ट पार्टी दो धड़ों में बंट चुकी है, एक धड़े की लगाम माधव कुमार नेपाल के हाथों में है तो दुसरे धड़े की कमान केपी शर्मा ओली के हाथ. और दावा दोनों ही नेताओं का है कि वही कम्युनिस्ट पार्टी के असली नेता हैं.

India, Nepal, KP Oli, Narendra Modi, China, Parliament, Indian Governmentकेपी ओली के साथ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

राजनीतिक गतिरोध तेज़ हुआ तो ओली ने संसद को ही भंग करवा दिया. अब उनके खिलाफ जमकर आऱोप लग रहे हैं कि उन्होंने संविधान को ताक पर रखकर देश में गैरकानूनी तरीके से संसद को भंग करने का काम किया है.अब इसी सबके बीच जब प्रधानमंत्री ओली को मौका मिला नेशनल असेंबली के सत्र को संबोधित करने का तो वह भारतीय हिस्से के कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख पर अपने कब्ज़े का दावा जताने लगे.

उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली भारत के दौरे पर जाने वाले हैं जहां इस मुद्दे पर भी चर्चा की जाएगी औऱ इसको कूटनीतिक तरीके से वापस पाने के लिए रास्ते खोजे जाएंगे.नेपाल के प्रधानमंत्री इस बात पर भी जोर देते हैं कि उन्हें भारत से सच्ची दोस्ती करनी है लेकिन नेपाल का भारत के साथ पिछले वर्ष से ही खराब रिश्ते होने में सबसे बड़ा कारण भी पीएम ओली ही हैं.

क्योंकि पीएम ओली की ही सरकार ने पिछले साल नक्शा जारी करते हुए भारतीय हिस्से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया था. इसके बाद से ही भारत और नेपाल के बीच विवाद बढ़ गया था जो अब सामान्य होने लगा था.कई भारतीय अधिकारियों के नेपाल के दौरे के बाद अब हालात सामान्य हो जाने की बात पर मुहर भी लग ही चुकी थी लेकिन नेपाली प्रधानमंत्री के ताजा बयान ने सारी कोशिशों को धड़ा बता दिया औऱ विवाद जहां से शुरू हुआ था एक बार फिर से वहीं पहुंचने की ओर दिखाई दे रहा है.

प्रधानमंत्री ओली का यह भी आरोप है कि जबसे उन्होंने नया नक्शा जारी किया है तबसे ही भारत, नेपाल की सरकार को गिराने की भूमिका में काम कर रहा है.आज नेपाल में जो राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है उसमें भारत की भी भूमिका है जबकि भारत इसे हमेशा नेपाल का अंदरूनी मामला बताते हुए इस आरोप को खारिज करता नज़र आता है.

अब बात करते हैं कि आखिर जिस हिस्से पर नेपाल अपना दावा ठोक रहा है उसकी हकीकत क्या है. जिस कालापानी पर नेपाल अपना दावा ठोंक रहा है वह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का एक हिस्सा है.यह विवाद वर्ष 1816 से ही चला आ रहा है. साल 1816 में ब्रिटिश इंडिया और नेपाल के बीच एक सुगौली समझौता हुआ था.

इस समझौते में माना गया था कि कालापानी इलाके से होकर बहने वाली महाकाली नदी को भारत और नेपाल की सीमा है. इस समझौते में शामिल एक ब्रिटिशी अधिकारी ने नक्शे में उन स्थानों को भी चिन्हित कर दिया जिसमें कई जगहों पर सहायक नदियां आकर महाकाली नदी से मिलती है, नेपाल इसी के ज़रिए कालापानी पर अपना दावा जता रहा है जबकि वास्तविक नदी का कालापानी से कोई लेना देना ही नहीं है.

कालापानी से सहायक नदी जाकर महाकाली नदी से मिलती है. भारत अपने नक्शे में कालापानी को शामिल करता आया है. भारत ने जबसे ही कालापानी को अपना हिस्सा बताया है तबसे ही नेपाल में राजनीतिक गतिरोध समय समय पर देखने को मिलता आया है. इसमें उसको चीन का अंदरूनी समर्थन भी मिलता रहा है. इसी कालापानी इलाके में ही लिपुलेख भी पड़ता है जोकि भारत को चीन पर नज़र रखने के लिए मुफीद इलाका माना जाता है.

भारत चीन की गतिविधियों पर यहीं से आसानी से नज़र रखता है यही वजह है कि चीन नेपाल को उकसाता है कि वह यह इलाका भारत से लेकर अपने कब्ज़े में कर ले. नेपाल को भारत के अलावा चीन भी आर्थिक मदद मुहैया कराता है लेकिन मौजूदा समय में नेपाल चीन के इशारों पर नाचता हुआ दिखाई पड़ता है. जिससे भारत के साथ तनाव बढ़ा हुआ है.

एक वजह ये भी हो सकती है कि नेपाल में एंटी इंडिया मूवमेंट बढ़ा है, नेपाल में इन विवादित क्षेत्रों की वजह से भारत के खिलाफ नफरती माहौल खड़ा करने की भी कोशिश की जाती है. पीएम ओली को चुनाव में जाना है जहां उन्हें सत्ता जाने का डर भी सता रहा है ऐसे में ये बयान राजनीतिक भी हो सकता है लेकिन पीएम ओली को ये समझना होगा कि राजनीतिक बयानों के चलते भारत से दुश्मनी मोल लेना किसी भी सूरत में नेपाल जैसे देश के लिए नुकसानदेह ही साबित होगा.

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लेखक

मशाहिद अब्बास मशाहिद अब्बास @masahid.abbas

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं

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