charcha me| 

होम -> सियासत

बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 21 नवम्बर, 2021 02:58 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
  • Total Shares

कृषि कानूनों के रद्द किये जाने घोषणा के बाद होने वाले असर के रुझान आने लगे हैं. कानूनों की वापसी का क्रेडिट भले न मिले, लेकिन कांग्रेस के लिए मोदी सरकार का ये फैसला हौसला बढ़ाने वाला लगता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) तीन दिन के यूपी दौरे पर हैं. लखनऊ में 56वां डीजीपी सम्मेलन हो रहा है. प्रधानमंत्री मोदी के साथ साथ अमित शाह भी डीजीपी कांफ्रेंस में हिस्सा ले रहे हैं - जाहिर है केंद्रीय गृह राज्य मंत्री होने के नाते अजय मिश्र टेनी (Ajay Mishra Teni) को भी डीजीपी कांफ्रेंस में शामिल होना ही होगा. आखिर उनके विभाग का कार्यक्रम जो है और इसलिए भी क्योंकि ये यूपी में हो रहा है जहां 2022 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं.

लखीमपुर खीरी हिंसा में चार किसानों सहित आठ लोगों की हुई मौत के बाद से प्रियंका गांधी वाड्रा (Priyanka Gandhi) यूपी के चुनावी माहौल में 'न्याय' की लड़ाई लड़ रही हैं. घटना के बाद से ही हर मौके पर प्रियंका गांधी वाड्रा ये याद दिलाना नहीं भूलतीं कि कैसे मोदी सरकार के एक मंत्री के बेटे ने किसानों को कुचल डाला था - और मंत्री मोदी कैबिनेट में बने हुए हैं.

डीजीपी कांफ्रेंस के बहाने कांग्रेस महासचिव को मोदी सरकार को टारगेट करने का फिर से मौका मिल गया है. ये मौका इसलिए भी मौजूं हो जाता है क्योंकि यूपी दौरे से ठीक पहले ही प्रधानमंत्री मोदी तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर चुके हैं.

प्रियंका गांधी वाड्रा ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को बर्खास्त करने की मांग की है. प्रियंका गांधी की ही तरह एक्शन की मांग बीजेपी भीतर से ही आयी है. वरुण गांधी ने भी प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखी है.

अजय मिश्रा टेनी को लेकर अभी तक मोदी सरकार की तरफ से कन्फ्यूजन ही देखने को मिला है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की हाल में हुई लखनऊ रैली मिसाल है. अब वो वक्त आ चुका है जब प्रधानमंत्री मोदी को कृषि कानूनों की ही तरह लखीमपुर खीरी हिंसा को लेकर सुर्खियों में आये अपने कैबिनेट साथी को लेकर साफ साफ कोई स्टैंड लेना ही होगा - क्योंकि विपक्ष को ये मौका तो प्रधानमंत्री मोदी की ही टीम ने मुहैया कराया है.

जोर पकड़ने लगी केंद्रीय मंत्री के खिलाफ एक्शन की मांग

किसानों के मुद्दे पर विपक्ष के हमलों के बीच मेघालय के गवर्नर सत्यपाल मलिक की ही तरह बीजेपी सांसद वरुण गांधी भी बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ काफी मुखर देखे गये हैं. खास बात ये है कि ये दोनों उत्तर प्रदेश से ही आते हैं - और चुनावी माहौल में दोनों की पार्टीलाइन से अलग बातें सही संदेश तो नहीं ही देतीं.

अपनी चचेरी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा की ही तरह वरुण गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र के जरिये लखीमपुर खीरी हिंसा को लेकर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. वैसे कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अजय मिश्रा को बर्खास्त करने की मांग की है, ताकि लखीमपुर खीरी हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाया जा सके.

priyanka gandhi vadra, narendra modi, varun gandhiअजय मिश्रा भी तो प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के लिए कृषि कानूनों जैसी ही मुसीबत बने हुए हैं!

वरुण गांधी चाहते हैं मोदी एक्शन लें: पीलीभीत से बीजेपी सांसद वरुण गांधी पत्र में लिखते हैं, वरिष्ठ पदों पर बैठे कई नेताओं ने हमारे आंदोलनकारी किसानों के खिलाफ भड़काऊ बयान दिया है - और 3 अक्टूबर की लखीमपुर खीरी हिंसा भी उसी का नतीजा है.

वरुण गांधी का कहना है कि नेताओं के भड़काऊ बयानों की वजह से ही किसान आंदोलन को लेकर ऐसा माहौल बना कि लखीमपुर खीरी में किसानों को गाड़ियों से कुचल कर मार डाला गया. वरुण गांधी ने इसे दिल दहला देने वाली घटना बताया है और लोकतंत्र पर एक कलंक माना है.

वरुण गांधी ने भी शक जताया है कि अजय मिश्रा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रहते लखीमपुर खीरी हिंसा की निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती है. प्रधानमंत्री को पत्र में वरुण गांधी लिखते हैं घटना से जुड़े केंद्रीय मंत्री के खिलाफ उचित कार्रवाई करने की प्रधानमंत्री मोदी से मांग की है ताकि जांच निष्पक्ष हो सके.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की प्रभारी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने तो सीधे केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त करने की ही मांग की है, लेकिन उससे पहले प्रधानमंत्री मोदी से ये भी कहा है कि डीजीपी कांफ्रेंस में वो लखीमपुर खीरी की घटना को लेकर निशाने पर आये मंत्री अजय मिश्रा के साथ मंच न शेयर करें.

1. मोदी को मंच शेयर न करने की सलाह: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रियंका गांधी की सलाह है कि डीजीपी कांफ्रेंस में वो अजय मिश्रा के साथ मंच शेयर करने से परहेज करें.

2. केंद्रीय मंत्री को बर्खास्त किया जाय: प्रियंका गांधी वाड्रा ने अजय मिश्रा को केंद्रीय मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की फिर से मांग की है. प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में रैली के मंच से भी प्रियंका गांधी की यही डिमांड रही - और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात करने वाले कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के ज्ञापन में भी यही मांग की गयी थी.

3. किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस हों: चिट्ठी के जरिये कांग्रेस नेता ने आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज किये गये मुकदमे भी वापस लेने की मांग की है. ऐसी ही मांग किसान नेता राकेश टिकैत की भी है - और पंजाब की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी तो 26 जनवरी की दिल्ली हिंसा के 83 आरोपियों को दो-दो लाख मुआवजा देने की भी मांग कर चुके हैं.

4. जान गंवाने वालों को मुआवजा मिले: कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने किसान आंदोलन के दौरान जान गंवाने वालों को आर्थिक अनुदान दिये जाने की भी मांग की है. विपक्ष का दावा है कि किसान आंदोलन के दौरान 700 किसानों की मौत हुई है.

ये चिट्ठी तो अमित शाह ने ही लिखवा डाली है

प्रियंका गांधी के ऐसी चिट्ठी लिखने मौका तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ही मुहैया कराया है. लिहाजा चिट्ठी लिखवाने का पूरा श्रेय भी उनको ही मिलना चाहिये. मीडिया रिपोर्ट से तो ये सबको मालूम होता ही रहा है कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ने लखीमपुर खीरी हिंसा की घटना के बाद अमित शाह से मुलाकात की और फिर दफ्तर भी गये. महत्वपूर्ण बैठकों में अफसरों के साथ उनके शामिल होने की जानकारी भी मीडिया में आई रिपोर्टों से मिलती ही रही.

प्रियंका गांधी वाड्रा लखीमपुर खीरी में मारे गये किसानों (शायद बीजेपी कार्यकर्ताओं को छोड़ कर) को न्याय दिलाने की लड़ाई भी लड़ती रहीं और अजय मिश्रा अपनी सरकारी जिम्मेदारियों का पहले की ही तरह निर्वहन भी करते रहे - राजनीति भी चलती रही, साथ में सरकारी कामकाज भी चलता रहा.

दिक्कत तो तब हुई जब अमित शाह के साथ मंच पर खड़े अजय मिश्रा की तस्वीर वायरल हो गयी. ऐसी दो ही तस्वीरें सामने आयी थीं. एक तस्वीर में अमित शाह और अजय मिश्रा के साथ यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह देखे गये. ये स्वतंत्रदेव सिंह के 'फॉर्च्यूनर से कुचलने' वाले बयान के काफी बाद की बात है जब अमित शाह लखनऊ में रैली करने पहुंचे थे. एक अन्य तस्वीर में जब अजय मिश्रा पीछे खड़े थे तो अमित शाह के साथ योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे.

भला ये नजारा किसी को नहीं दिखा होता तो प्रियंका गांधी को चिट्ठी लिखने का बहाना कैसे मिलता. एक और लोचा ये हुआ कि अजय मिश्रा दो तस्वीरों के अलावा पूरे कार्यक्रम में कहीं नहीं नजर आये - ये देखकर सबको समझ में आ गया कि बीजेपी नेतृत्व अजय मिश्रा को लेकर राजनीतिक उलझन से निकल नहीं पा रहा है.

मतलब, ये कि मोदी-शाह अजय मिश्रा को मंत्रिमंडल से हटाकर झुक जाने का मैसेज भी नहीं देना चाहते क्योंकि फिर तो गलती को छुपाने को लेकर भी सवाल खड़े होंगे, लेकिन असमंजस की स्थिति के कारण अजय मिश्रा को लेकर सही संदेश भी नहीं जा पा रहा है.

अजय मिश्रा पर मोदी सरकार में असमंजस क्यों

अब तक तो यही समझ में आया है कि अजय मिश्रा टेनी के गृह मंत्री होने से ज्यादा बीजेपी को उनकी जरूरत यूपी चुनाव को लेकर है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि यूपी से ब्राह्मण चेहरे के तौर पर ही उनको जुलाई, 2021 में हुए मोदी कैबिनेट में शामिल किया गया था. शुरू में तो सब ठीक ही चल रहा था कि लखीमपुर खीरी हिंसा में केंद्रीय मंत्री के बेटे अजय मिश्रा मोनू का नाम आ गया. अजय मिश्रा ने बेटे का पूरी ताकत से बचाव किया, लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार की यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

आशीष मिश्रा की गिरफ्तारी से ये तो पहले ही साफ हो गया था कि आरोप गंभीर हैं, वरना यूपी पुलिस तो सुप्रीम कोर्ट के डंडे का भी कोई काट खोजने में ही जुटी होती. पूछताछ के लिए नोटिस भेजने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में यूपी पुलिस को जवाब देते नहीं बन रहा था.

मोदी सरकार के कृषि कानूनों के वापस लेने के बाद भले ही बीजेपी इसे अपने फायदे के हिसाब से प्रचारित करने में जुट गयी हो, लेकिन विपक्ष को तो घेरने का मौका मिल ही गया है. जिस तरीके से तीनों कानूनों के फायदे समझाये जा रहे थे, वैसे ही तो कोरोना संटक के दौरान लापरवाही के बावजूद योगी आदित्यनाथ को क्लीन चिट भी दिये गये - सवाल उठाने का मौका तो बीजेपी नेतृत्व ही दे रहा है.

कुछ महीनों ने यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर राजनीति जोर पकड़े हुए हैं और मायावती, अखिलेश यादव से लेकर सत्ताधारी बीजेपी तक कोई भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं है. सवाल ये है कि क्या ब्राह्मण वोट के लिए यूपी की राजनीति में दो ही किरदार बचे हुए हैं - अजय मिश्रा टेनी और विकास दूबे. एक केंद्रीय मंत्री जो अपने बेटे को बचाने के लिए पूरी ताकत झोंक देता है और सरेआम कहता है कि वो कुछ ऐसा वैसा नहीं होने देंगे - और दूसरा एक गैंगस्टर जो एनकाउंटर में मारे जाने से पहले अपनी ड्यूटी कर रहे एक बड़े पुलिस अफसर सहित कई पुलिसकर्मियों की जान ले लेता है.

ये तो यूपी के ब्राह्मण समुदाय को भी सोचना चाहिये कि क्या राजनीतिक दलों की लड़ाई में उभर कर आये ये दो नाम ही उनके हीरो हैं - और क्या ऐसे ही लोगों के नाम पर अपना कीमती वोट किसे देना है तय करेंगे?

इन्हें भी पढ़ें :

Farm Laws withdrawn: चुनावों से पहले ये तो मोदी सरकार का सरेंडर ही है

कृषि कानून वापस लेकर पीएम नरेंद्र मोदी ने बड़ी गलती की है

मोदी के 'मास्टर स्ट्रोक' से पंजाब में बढ़ी बीजेपी सरकार की संभावना!

लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय