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Updated: 20 नवम्बर, 2021 03:39 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) के कृषि कानूनों को वापस लेने के ऐलान के बाद ट्विटर पर 'मास्टर स्ट्रोक' ट्रेंड करने लगा था. बेशक ये किसान आंदोलन की जीत है और कदम पीछे खींचने का ये फैसला मोदी सरकार के सरेंडर जैसा ही है, लेकिन बीजेपी के लिए ये राजनीतिक तौर पर काफी फायदेमंद भी हो सकता है.

बड़े दिनों बाद टीवी पर अचानक प्रकट होकर ब्रेकिंग न्यूज देने के लिए प्रधानमंत्री ने काफी सोच समझ कर गुरु परब का मौका चुना. जब सिख समुदाय गुरुनानक देव का प्रकाश पर्व मना रहा हो उसी बीच किसानों के लिए इतनी राहत भरी खबर दी. मौके का महत्व समझते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी तपस्या में चूक की तो बात की ही, लगे हाथ पहले ही क्षमा याचना भी कर डाली. ये बात अलग है कि विपक्ष के कुछ नेता बाद में कैमरे के सामने आये तो मोदी को देश से माफी मांगने की सलाह दे रहे थे.

पंजाब में करतारपुर कॉरिडोर खोलने के बाद मोदी सरकार का ये फैसला किसानों के साथ साथ बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए भी राहत देने वाला है. पंजाब शुरू हुए किसान आंदोलन के साल भर से ज्यादा हो चुके हैं और हालत ये हो गयी थी कि बीजेपी नेताओं के लिए गांवों में घुसना तक मुश्किल हो गया था - अब स्थितियां बदल सकती हैं, ऐसा लगता है.

कैप्टन अमरिंदर सिंह (Capt. Amrinder Singh) तो मोदी सरकार के फैसले का स्वागत करने वालों में सबसे आगे देखे गये. बीजेपी के साथ चुनावी तालमेल की की बात तो वो पहले ही कर चुके थे, बीच में कृषि कानून रोड़ा बन रहे थे और अब तो वो भी खत्म हो गया है. जाहिर है मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने के बाद पहली बार कैप्टन को तबीयत से खुश होने का मौका मिला है.

चुनावी राज्य यूपी में बीजेपी को कितना फायदा मिल पाएगा अभी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बड़ा नुकसान तो टल ही गया है - और नुकसान कम हो जाना भी भी तो फायदे की ही कैटेगरी में आता है.

जो बीजेपी पंजाब में जीरो बैलेंस महसूस कर रही थी, कृषि कानूनों के वापस लिये जाने की घोषणा के बाद उसके पुराने साथी अकाली दल (Akali Dal) की एनडीए में वापसी के भी द्वार खुल गये हैं - और कांग्रेस का अब तक जो हाल है बीजेपी के लिए तो जैसे सत्ता की सीढ़ियां करीब नजर आने लगी हैं.

एक साधे सब सधे

कृषि कानूनों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ऐलान अगर वास्तव में मास्टर स्ट्रोक है तो पंजाब में बीजेपी को फायदा ही फायदा नजर आ रहा होगा. दिल्ली बॉर्डर पर तो किसान बाद में आये थे, पंजाब में तो किसानों का आंदोलन शुरू हुए सवा साल हो चुके हैं - और इसका सबसे ज्यादा अगर किसी को नुकसान उठाना पड़ा है तो वो बीजेपी ही है. बताते हैं कि पंजाब में बीजेपी नेताओं के लिए चुनाव प्रचार की कौन कहे, गांवों में उनका घुसना तक भारी पड़ रहा था. पब्लिक मीटिंग करना भी मुश्किल हो रहा था.

मोदी सरकार के फैसले से बीजेपी की चुनावी राह तो थोड़ी आसान हो ही गयी है, कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए भी बीजेपी के साथ खड़े होने में कृषि कानून ही सबसे बड़ी बाधा साबित हो रहे थे. कांग्रेस छोड़ने और अपनी नयी पार्टी बना लेने के बाद कैप्टन भी किसानों के मुद्दे पर बीजेपी के साथ खुल कर सहमति नहीं जता पा रहे थे. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साफ तौर पर बोल दिया था कि किसानों की समस्याओं का हल निकलते ही वो बीजेपी के साथ मिल कर चुनाव लड़ने को तैयार मिलेंगे. अब तो ये रास्ता भी साफ हो चुका है.

narendra modi, capt amrinder singh, sukhbir badalराजनीतिक फायदे के हिसाब से देखें तो यूपी के मुकाबले बीजेपी को पंजाब में शुद्ध मुनाफा ज्यादा मिल सकता है

अभी तक पंजाब में सर्वे के मुताबिक त्रिकोणीय विधानसभा की ही संभावना जतायी गयी है, लेकिन सबसे ऊपर अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के होने का ही अनुमान लगाया जाता रहा है. कांग्रेस अपने झगड़े की वजह से पिछड़ कर दूसरे नंबर पर पहुंच जाती है - और बीजेपी का तो बस जैसे तैसे नाममात्र हाजिरी की संभावना ही जतायी गयी है.

प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश आने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने स्वागत तो किया ही, कुछ हद तक क्रेडिट लेने की भी कोशिश शुरू कर दी, 'मैं इस मामले को एक साल से ज्यादा वक्त से उठा रहा था... इसे लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिला... गुजारिश करता रहा कि वो अन्नदाता की आवाज सुनें... खुशी की बात है कि किसानों की बात सुनी और हमारी चिंताओं को समझा गया.'

कैप्टन अमरिंदर सिंह के हवाले से उनके प्रवक्ता रवीन ठुकराल ने पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री को लेकर ट्विटर पर लिखा है - 'बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के साथ किसानों के विकास के लिए काम करेंगे... तब तक आराम नहीं करेंगे, जब तक पंजाब के हर एक आदमी की आंखों के आंसू न पोंछ दें.'

अकाली दल की एनडीए में वापसी की संभावना

कृषि कानूनों के विरोध में और किसानों के साथ खड़े होने की बात करते हुए हरसिमरत कौर बादल ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था - और फिर सुखबीर बादल ने अकाली दल के एनडीए छोड़ देने की भी घोषणा कर दी थी - और ऐसा 24 साल के बाद हुआ था जब दोनों पार्टियां अलग हो गयीं.

अकाली दल की मजबूरी थी कि जिस चीज के लिए किसान बीजेपी का विरोध कर रहे हों, उसके साथ वो कैसे रहे. हरियाणा में भी ऐसी मुश्किल डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला के साथ आयी थी, लेकिन दायें-बायें करके वो बीजेपी के साथ बने रहे. अपनी पार्टी के विधायकों के विरोध के चलते दुष्यंत चौटाला दबाव में जरूर आ गये थे लेकिन जैसे तैसे टालमटोल करके निकल गये.

हरसिमरत कौर ने जिस उम्मीद के साथ मंत्री पद छोड़ा था वो मकसद पूरा नहीं हो सका क्योंकि उनके राजनीतिक विरोधी लोगों को ये समझा दिये कि कानूनों को मंजूरी देने के वक्त वो विरोध नहीं कर सकी थीं. सबसे ज्यादा निराशा अकाली दल को पंचायत चुनावों में हुई जब सारी सीटें कांग्रेस के हिस्से में चली गयीं.

अब तो वो मुद्दा ही नहीं बचा जिसके विरोध में अकाली दल को एनडीए छोड़ना पड़ा था, फिर तो मान कर चलना चाहिये कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश के साथ ही अकाली दल को घर वापसी का न्योता भी दे दिया है.

अकाली दल और बीजेपी का गठजोड़ सफल रहा है और दस साल तक गठबंधन सरकार चली भी है. दरअसल, अपने अपने वोट बैंक के साथ दोनों पार्टियां एक दूसरे की पूरक हैं और मिल कर मजबूत बन जाती है. अकाली दल के पास कोई हिंदू चेहरा नहीं है और बीजेपी इसकी भरपाई कर देती है. सिख पंथक पार्टी की अपनी छवि और वोट बैंक के चलते अकाली दल नेतृत्व करता है और बीजेपी को फॉलो करना पड़ता है.

वैसे 2017 के विधानसभा चुनाव में ऐसा लगा था जैसे बीजेपी की गठबंधन में कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गयी हो. बीजेपी नेतृत्व की तरफ से चुनाव प्रचार में भी रस्मअदायगी ही देखने को मिली थी - और सत्ता विरोधी लहर के चलते कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस की सरकार बनवाने में कामयाब रहे.

अब तो पंजाब में सारे राजनीतिक समीकरण ही बदल चुके हैं. अकाली दल के एनडीए में लौटने की संभावनाओं के बीच कैप्टन अमरिंदर सिंह भी बीजेपी के साथ हो गये हैं - दिक्कत बस यही है कि अब वो पुराने कैप्टन नहीं हैं.

2012 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल और बीजेपी गठबंधन ने पंजाब की 117 में से 68 सीटों पर जीत हासिल की थी. अकाली दल को 56 सीटें मिली थीं, जबकि बीजेपी के हिस्से में 12 सीटें आयी थीं. 2017 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन के हाथ से सत्ता की चाबी फिसल गयी थी और दो पार्टियां 18 सीटों पर ही सिमट गयी थीं जिसमें अकाली दल के हिस्से 15 और बीजेपी के हिस्से में सिर्फ तीन सीटें मिल पायी थीं. दूसरे नंबर पर आम आदमी पार्टी रही और वो सबसे बड़ा विपक्षी दल बनी.

पंजाब के मौजूदा सियासी समीकरणों को समझें तो फिलहाल जितनी अकाली दल को बीजेपी की जरूरत है उतनी ही अकाली दल को बीजेपी की - और थोड़ा आगे बढ़ कर देखें तो कैप्टन को भी दोनों के साथ की जरूरत है ताकि वो कांग्रेस तो सत्ता से बेदखल कर बदला तो ले पायें ही, आम आदमी पार्टी को भी बहुमत से दूर रोक सकें.

अब अगर कैप्टन अमरिंदर सिंह और बीजेपी के बीच अच्छी तालमेल बन जाये और अकाली दल भी साथ आ जाये तो नये सत्ता समीकरण फिर से खड़े होने की गारंटी नहीं तो संभावना तो बढ़ ही जाती है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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