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Updated: 09 सितम्बर, 2019 04:59 PM
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ममता बनर्जी ने NRC यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस को पश्चिम बंगाल में एंट्री नहीं देने का फैसला किया है. हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मैदान में ममता बनर्जी अब अकेले पड़ती नजर आ रही हैं. ममता बनर्जी 'चंद्रयान 2' को जहां देश खराब आर्थिक स्थिति से ध्यान भटकाने की कोशिश बता रही हैं, अरविंद केजरीवाल उम्मीद जता चुके हैं कि मोदी सरकार सुधार ही लेगी.

वैसे NRC के मामले में ममता बनर्जी नीतीश कुमार के भी साथ खड़े होने का दावा कर रही हैं. नोटबंदी के बाद से तो ममता बनर्जी कभी नीतीश कुमार की बात नहीं कर रही थीं - और तो और पटना जाकर नीतीश कुमार को ललकारते हुए रैली भी कर आयी थीं. लगता से राजनीतिक बयार अलग बहने लगी है.

वैसे नीतीश कुमार ने तो एनआरसी को लेकर खुद कुछ नहीं कहा है लेकिन बिहार में जेडीयू और बीजेपी इस मुद्दे पर आमने सामने आ गये हैं. इसी तरह का टकराव धारा 370 और तीन तलाक के मुद्दे पर भी रहा - लेकिन नीतीश कुमार ने जैसे तैसे बच बचाकर बीजेपी को नाराज करने की जहमत नहीं उठायी. धारा 370 लागू होने के बाद तो एक जेडीयू नेता का कहना रहा कि अब जब कानून बन ही गया तो विरोध करने से क्या फायदा?

क्या NRC के मामले में भी नीतीश कुमार का वैसा ही रवैया रहेगा? अगर ऐसा होता है तो नारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.

NRC पर बीजेपी नेता बढ़ा रहे हैं नीतीश की मुश्किल

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का दावा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार में NRC को कभी लागू नहीं करेंगे. पश्चिम बंगाल में NRC को लेकर मीडिया से बात करते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस मुद्दे पर उनकी बात हुई है - और नीतीश कुमार ने भी कहा है कि वो एनआरसी को स्वीकार नहीं करेंगे.

31 अगस्त को एनआरसी की आखिरी सूची जारी हुई थी जिससे मालूम हुआ कि 19,06,657 लोगों के नाम सूची में शामिल नहीं है. इसके बाद इस पर राजनीति शुरू हो गयी.

सबसे हैरानी की बात तो ये रही कि असम बीजेपी में ही विरोध शुरू हो गया. असम की बीजेपी सरकार के मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तो फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की भी बात कह डाली है. मगर, बीजेपी का इस मुद्दे पर एक ही स्टैंड नहीं है. पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली बीजेपी के नेता असम की तरह अपने अपने राज्यों में भी NRC पर अमल किये जाने की मांग करने लगे हैं.

बिहार बीजेपी नेता और नीतीश सरकार में मंत्री विनोद सिंह चाहते हैं कि बिहार में ‘बांग्लादेशी घुसपैठियों’ को खदेड़ने के लिए राज्य में एनआरसी लागू किया जाना चाहिये. दूसरी तरफ, एनआरसी के विरोध में खड़े जेडीयू नेताओं का कहना है कि सूबे में कोई अवैध अप्रवासी है ही नहीं.

nitish with pm modi2020 में मोदी लहर चुनेंगे नीतीश कुमार या नया रास्ता तलाशेंगे?

जेडीयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर भले ही बिहार की प्रत्यक्ष राजनीति से दूर हों, लेकिन ट्वीट कर अपना विरोध जाहिर जरूर किया, 'एनआरसी की अंतिम सूची ने लाखों लोगों को उनके अपने ही देश में विदेशी बना दिया है.'

इस ट्वीट में प्रशांत किशोर सीधे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को टारगेट करते लगते हैं. प्रशांत किशोर समझाना चाहते हैं कि जब असल चुनौतियों को दरकिनार कर बगैर कारगर रणनीति के जटिल मुद्दों पर कोई भी समाधान पेश कर दिया जाता है तो लोगों को इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है.

NRC पर बुरी तरह घिर चुके हैं नीतीश कुमार

नीतीश कुमार की राजनीति कितने मुश्किल दौर से गुजर रही है, सिर्फ इसी बात से समझा जा सकता है कि लोक सभा का पूरा चुनाव बीत गया लेकिन जेडीयू अपना मैनिफेस्टो तक जारी नहीं कर पायी. ऐसा न करने की वजह भी वे ही मसले रहे जिनके चलते नीतीश कुमार ने 2013 में एनडीए छोड़ दिया था और आगे चलकर लालू प्रसाद से हाथ मिलाकर महागठबंधन में शामिल हो गये थे.

एनडीए में होने के बावजूद नीतीश कुमार जब भी मौका मिलता है खुद को अपने सिद्धांतों पर कायम बताते रहते हैं - कहते भी हैं कि हमलोग बदलने वाले नहीं हैं. नीतीश की ही बात को जेडीयू नेता भी आगे बढ़ाते हैं लेकिन बीजेपी के साथ रिश्तों का ख्याल रखते हुए बचाव भी करते रहे हैं.

कुछ बातें ऐसी भी है जो नीतीश को ताकतवर बनाती हैं. बीजेपी भी जानती है कि नीतीश कुमार के बगैर बिहार में उसके लिए राजनीति करना आसान नहीं है. आम चुनाव में भले ही जातीय राजनीति धराशायी हो गयी हो, लेकिन विधानसभा में भी वही हाल रहेगा जरूरी नहीं है. यही वजह है कि जेडीयू नेता मौका मिलते ही समझाने लगते हैं कि विधानसभा चुनाव में राष्ट्रवाद या मोदी लहर नहीं काम करेगी - तब नीतीश कुमार और उनका सुशासन ही बेड़ा पार लगाएगा. जेडीयू नेता चाहते हैं कि जैसे भी हो नीतीश कुमार बीजेपी को इस बात का एहसास जरूर करायें.

आम चुनाव से पहले भी जेडीयू नेता नीतीश कुमार को बिहार में बड़े भाई के तौर पर पेश करना चाहते थे. वैसा बिलकुल तो नहीं हुआ लेकिन जेडीयू के साथ बराबर सीटें शेयर करने के लिए बीजेपी का राजी होना भी तो कई चीजें साफ कर ही रहा है.

आम चुनाव में अपने हिस्से की 17 में से 16 सीटें जीतकर नीतीश कुमार ने ये तो साफ कर ही दिया है कि जेडीयू को बीजेपी बहुत हल्के में लेने की गलती न करे - लेकिन अगर धारा 370 और तीन तलाक की तरह एनआरसी पर भी नीतीश कुमार समझौते का रास्ता अख्तियार करते हैं तो चुनाव वो भले ही जीत जायें लेकिन उनका राजनीतिक भविष्य बहुत लंबा तो नहीं ही चल सकेगा.

सबसे बड़ी मुश्किल तो नीतीश कुमार की ये है कि अरुण जेटली रहे नहीं

- और प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल में जमे हुए हैं. ऐसे में अब तो नीतीश कुमार को ये सब अकेले ही तय करना होगा कि बीजेपी के साथी होने के चलते वो मोदी लहर का फायदा उठाते हुए तात्कालिक लाभ लेना चाहते हैं या फिर अपने राजनीतिक भविष्य को देखते हुए अलग रास्ता अख्तियार करते हैं.

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