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Updated: 29 मई, 2022 12:25 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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ऐसा क्यों लगता है जैसे गुजरात में पाटीदार आंदोलन अभी खत्म ही न हुआ हो? आखिर पाटीदार समुदाय को मनाने की जीतोड़ कोशिशें क्यों हो रही हैं? कांग्रेस को तो हार्दिक पटेल की भी फिक्र नहीं, लेकिन बीजेपी न जाने किस बात की चिंता खाये जा रही है. ये तो ऐसा लगता है कि पाटीदार समुदाय ही गुजरात चुनाव 2022 में 'खेला' करने वाला हो!

आखिर क्यों राजकोट पहुंच कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) को सफाई देनी पड़ रही है? प्रधानमंत्री मोदी का ये कहना कि 8 साल ऐसा कुछ नहीं किया जिसकी वजह से जनता को सिर झुकाना पड़े, आखिर क्या कहलाता है?

गुजरात के लोगों को तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर देश के बाकी हिस्से के लोगों से ज्यादा ही गर्व होता होगा. खुद प्रधानमंत्री मोदी कह भी रहे हैं, 'आपने मुझे जो संस्कार और शिक्षा दी... समाज के लिए जीने की बातें सिखाई... उसी की बदौलत मैंने मातृभूमि की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी.'

क्या गुजरात चुनाव को लेकर बीजेपी को अब भी किसी तरह का कोई डर सता रहा है? मुख्यमंत्री बदल डालने जैसा एहतियाती उपाय तो पहले ही किया जा चुका है - फिर किस बात का डर हो सकता है? पांच साल पहले भी तो ऐसे ही मुख्यमंत्री बदला गया था, लेकिन तब असली वजह पाटीदार समुदाय का आंदोलन ही रहा.

ये ठीक है कि 2017 में गुजरात चुनाव (Gujarat Election 2022) के आखिरी दौर में प्रधानमंत्री मोदी को ही मोर्चा संभालना पड़ा था. फिर भी बीजेपी की चुनावी वैतरणी जैसे तैसे ही पार लग सकी थी. शायद इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने शुरू से ही गुजरात का मोर्चा संभाल लिया है - और हर कदम पर राजनीति में उनके हमकदम अमित शाह भी साथ साथ चल रहे हैं. यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के अगले ही दिन मोदी-शाह गुजरात के दौरे पर निकल गये थे. 28 मई का कार्यक्रम भी वैसे ही बनाया गया था.

अहमदाबाद में प्रधानमंत्री मोदी के रोड शो से लेकर अब तक उनके करीब डेढ़ दर्जन कार्यक्रम हुए हैं - और सबसे खास बात ये है कि करीब एक तिहाई कार्यक्रमों का किसी न किसी रूप में पाटीदार समुदाय (Patidar Vote Bank) से सीधा संबंध रहा है.

अभी अभी पाटीदारों के गढ़ राजकोट के आटकोट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 50 करोड़ की लागत से बने मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल का लोकार्पण किया है. राजकोट गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में आता है और यही वो इलाका है जहां 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी कांग्रेस से पिछड़ गयी थी. कांग्रेस गुजरात में फिर से एक्टिव हो चुकी है. पहले की ही तरह राहुल गांधी विदेशी दौरे से तरोताजा होकर गुजरात का चुनाव कैंपेन संभालने आ रहे हैं - और यही वजह लगती है कि मोदी-शाह ने पहले से ही गुजरात में मोर्चा संभाल लिया है.

पाटीदार समुदाय ही निर्णायक रहा है, रहेगा भी!

अप्रैल, 2022 के आखिर में प्रधानमंत्री मोदी गुजरात पाटीदार बिजनेस समिट को संबोधित कर रहे थे - और तभी बगैर किसी का नाम लिये बोले, 'आपके इलाके में कुछ लड़के हैं... जो हमारे खिलाफ झंडा फहराते हैं... उन्हें पता भी नहीं होगा कि आपने अपने दिन कैसे अंधेरे में गुजारे थे... तब क्या स्थिति रही?'

narendra modiगुजरात में पाटीदार समुदाय को मनाने में जुटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

राजकोट में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी सरकार की 8 साल की उपलब्धियां भी गिनायीं, '...6 करोड़ परिवारों को नल से जल दिया है... गरीबों की गरिमा सुनिश्चित की गई है... 3 करोड़ से ज्यादा गरीबों को घर दिये गये हैं... किसानों के खाते में सीधे पैसा जमा किये गये हैं... जब कोरोना के दौरान इलाज की जरूत बढ़ी तो हमने टेस्टिंग तेज कर दी... जब वैक्सीन की जरूरत आई तो हमने फ्री उपलब्ध कराया... आपने मुझे जो संस्कार और शिक्षा दी... समाज के लिए जीने की बातें सिखाई... उसकी की बदौलत मैंने मातृभूमि की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी है.'

पाटीदार आबादी का दबदबा: गुजरात की मौजूदा आबादी तकरीबन 6 करोड़ है - और प्रधानमंत्री के छह करोड़ लोगों को नल से पानी देने से मतलब सभी गुजरातियों से ही रहा होगा. 2014 से पहले जब मोदी दिल्ली की तरफ कदम बढ़ाने लगे थे तो अक्सर पांच करोड़ गुजरातियों की बात किया करते थे.

बहरहाल, पाटीदार समुदाय के वोट की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि वो आबादी में करीब 12 फीसदी का हिस्सेदार है - और 2017 के विधानसभा चुनाव में पाटीदार समुदाय की नाराजगी का असर साफ साफ देखा गया था.

आलम ये रहा कि सौराष्ट्र क्षेत्र की 54 सीटों में से बीजेपी सिर्फ 23 ही जीत पायी थी, जबकि कांग्रेस के खाते में 30 सीटें पहुंच गयी थीं. 2015 में पाटीदार आंदोलन के दौरान 14 पाटीदार युवकों की मौत हो गई थी - और ये आंदोलन तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदी बेन पर तो भारी पड़ा ही, बीजेपी पर भी काफी बुरा असर हुआ.

2017 के विधानसभा चुनाव से पहले एक पाटीदार मुख्यमंत्री को हटाने के बाद 2022 के चुनाव से पहले बीजेपी ने एक पाटीदार को मुख्यमंत्री बना कर अपनी तरफ से भरपाई कर दी है - फिर ऐसा क्यों है कि बीजेपी को पाटीदार समुदाय को खुश करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है?

पिछले चुनाव से पहले आनंदी बेन पटेल को हटा दिया गया था और अब अगले चुनाव से पहले भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बना दिया गया है. भूपेंद्र पटेल भी फिलहाल यूपी की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की पसंद बताये जाते हैं. पिछली बार आनंदी बेन पटेल चाहती थीं कि नितिन पटेल को कुर्सी सौंपें, लेकिन तब अमित शाह के पसंदीदा विजय रुपाणी भारी पड़े और नितिन पटेल डिप्टी सीएम बना दिये गये.

एक पाटीदार नेता के होते हुए भी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे में पाटीदार समुदाय पर प्रभाव रखने वाले दो लोगों की खास चर्चा हो रही है - एक हैं नरेश पटेल और दूसरे परेश गजेरा.

बीजेपी ने पाटीदारों का नेता चुन लिया है: नरेश पटेल ने अभी तक अपनी राजनीतिक पारी को लेकर कुछ भी नहीं कहा है, सिवा इस बात के कि वो 31 मई को अपना इरादा सबके सामने जाहिर करेंगे. फिर भी बीजेपी की तरफ से नरेश पटेल से परहेज किया जा रहा है - और उसका सबसे बड़ा उदाहरण है, प्रधानमंत्री मोदी के कार्यक्रम के इनविटेशन कार्ड पर नरेश पटेल का नाम न होना. जब विवाद होने लगा तो गुजरात बीजेपी उपाध्यक्ष भरत बोधरा ने ये कह कर शांत करने की कोशिश की कि वो नया कार्ड प्रिंट कराएंगे और उसमें नरेश पटेल का नाम जरूर होगा - नया कार्ड तो छप गया लेकिन नरेश पटेल का नाम फिर भी नदारद रहा. सिर्फ नरेश पटेल की कौन कहे, लेउवा पटेल समुदाय की कुल देवी के मंदिर के महंत का नाम भी लोग खोजते रह गये.

असल में नरेश पटेल को लेकर बीजेपी ने मान लिया है कि कांग्रेस के साथ उनकी नजदीकियां बढ़ रही हैं, इसलिए उनको नजरअंदाज किया जा रहा है. हाल ही में गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष जगदीश ठाकोर सहित कई कांग्रेस नेताओं ने नरेश पटेल से नये सिरे से मुलाकात की है. नरेश पटेल का नाम कांग्रेस में तभी से चल रहा है जब प्रशांत किशोर के गुजरात में पार्टी के कैंपेन की चर्चा रही.

वैसे हार्दिक पटेल के भी कांग्रेस छोड़ने को नरेश पटेल के कांग्रेस की नजदीकियों से जोड़ कर देखा जा सकता है. ऐसे में नरेश पटेल को लेकर बीजेपी की सोच गलत भी नहीं लगती. हार्दिक पटेल को कांग्रेस में मौजूदा लोगों से जो दिक्कत थी वो तो थी ही, नरेश पटेल को लेकर उनके मन में ज्यादा दहशत रही.

निश्चित तौर पर हार्दिक पटेल पाटीदार आंदोलन से उभर कर बड़े युवा नेता बन गये, लेकिन पाटीदार समुदाय के लेउवा और कड़वा पटेल दोनों ही तबकों में नरेश पटेल की पैठ गहरी मानी जाती है - और हार्दिक पटेल के लिए ये बड़ी परेशानी रही. अगर नरेश पटेल कांग्रेस में पहले ही आ चुके होते तो हार्दिक पटेल की शंका सही साबित हो सकती थी - और शायद इसीलिए हार्दिक पटेल ने कांग्रेस छोड़ दी है.

कांग्रेस छोड़ देने के बाद भी हार्दिक पटेल न तो बीजेपी में गये हैं और न बीजेपी उनको भाव दे रही हो, ऐसा लगता है - क्योंकि बीजेपी ने नरेश पटेल और हार्दिक पटेल की जगह खोडलधाम संस्थान के ही एक और नेता परेश गजेरा को हाथों हाथ लेने लगी है.

परेश गजेरा सौराष्ट्र के बड़े बिल्डर हैं और बीजेपी के महत्व देने से उनका कद और भी बढ़ गया है - अभी तो यही लगता है कि बीजेपी अब परेश गजेरा के जरिये ही पाटीदार समुदाय को अपने से जोड़े रखने की कोशिश कर रही है - अब अगर नरेश पटेल कांग्रेस में चले भी जाते हैं तो बीजेपी परेश गजेरा के जरिये पाटीदार वोटर से कनेक्ट होने की कोशिश करेगी.

पाटीदार समुदाय का सबसे पसंदीदा कौन?

ऐसा लगता है जैसे गुजरात की राजनीति आजकल केवल पाटीदार समुदाय के इर्द-गिर्द ही घूम रही है - पंजाब में सरकार बनाने के बाद जोश से भरी आम आदमी पार्टी ने तो सूबे में अपनी कमान पाटीदार नेता के हाथ में ही सौंप दी है - गोपाल इटालिया भी युवा पाटीदार नेता ही हैं, लेकिन वो भी हार्दिक पटेल से दस साल बड़े हैं.

कांग्रेस छोड़ चुके हार्दिक पटेल अभी कहीं गये नहीं हैं, लिहाजा बीजेपी के साथ साथ आम आदमी पार्टी में जाने के विकल्प भी खुले हुए हैं. बीजेपी में जाने की संभावना इसलिए जतायी जाने लगी थी क्योंकि हार्दिक पटेल के हाल के बयानों में हिंदुत्व, मंदिर और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों का साफ तौर पर झलक मिलने लगी थी. साथ ही, जिस तरह से चिकन सैंडविच को मुद्दा बनाकर वो राहुल गांधी पर हमला कर रहे थे, बड़ा इशारा समझा ही जाएगा.

फिलहाल परेश गजेरा को जिस तरह बीजेपी की तरफ से महत्व मिलने लगा है, ऐसा लगता है कि बीजेपी अगर हार्दिक पटेल को साथ लेगी भी तो अपनी शर्तों पर ही. जहां तक आम आदमी पार्टी का सवाल है, हार्दिक पटेल तो अरविंद केजरीवाल के पहले से ही फेवरेट रहे हैं - और वो चाहे जितने भी बेअसर हो चुके हों, आम आदमी पार्टी के लिए तो सबसे बड़े नेता हैं ही.

पाटीदार समुदाय को लुभाने वाले तो सभी हैं, लेकिन अब सवाल ये उठता है कि उनको कौन पसंद आता है?

बीजेपी को तो शुरू से ही पाटीदार समुदाय के वोट मिलते रहे हैं. 2017 में बीजेपी से नाराज पाटीदारों ने जरूर कांग्रेस को उसके मुकाबले ज्यादा ही वोट दिया था - अब तो उनके सामने आम आदमी पार्टी रूप में एक नया विकल्प भी है.

आम आदमी पार्टी के साथ मुश्किल ये है कि गुजरात में उसका संगठन नहीं खड़ा हो सका है. बेशक पंजाब की जीत का उत्साह आप कार्यकर्ताओं को एक्टिवेट कर सकता है, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिये कि पंजाब में भी सत्ता हासिल करने से पहले पांच साल विपक्ष में रह कर संघर्ष करने पड़े - और ये भी नहीं भूलना चाहिये कि कांग्रेस अपने झगड़ों की वजह से पहले ही मैदान छोड़ चुकी थी और बीजेपी में कहीं नजर भी नहीं आ रही थी.

गुजरात में पंजाब जैसा कुछ भी नहीं है और संगठन के मामले में अब भी कांग्रेस बेहतर पोजीशन में है, लेकिन बाकी जगहों की तरह गुजरात में भी कांग्रेस की वही समस्या है वो अब तक अपने को बीजेपी के विकल्प के तौर पर नहीं पेश कर सकी है.

ऐसी सूरत में बीजेपी ही सबसे आगे नजर आ रही है, लेकिन जिस तरीके से मोदी-शाह ने पहले से ही गुजरात का मोर्चा संभाल रखा है - और सबसे पहले सारा ध्यान पाटीदार समुदाय के वोट पर ही दिया जा रहा है, बीजेपी की फिक्र भी यूं ही नहीं लगती.

गुजरात के लोग भी रोजाना की दुश्वारियों से वैसे ही जूझ रहे हैं जैसे देश के बाकी हिस्सों में. गुजरात में मंदिर का भी मुद्दा नहीं है जो महंगाई पर भारी पड़ सके - बाकी पाटीदार समुदाय हर तरह से सक्षम है और जाहिर है समझदार भी होगा ही - जो भी फैसला करेगा सोच समझ कर ही करेगा.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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