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Updated: 31 जनवरी, 2019 11:51 AM
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ममता बनर्जी को लेकर कहा जा रहा है कि एक बार फिर वो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं. यूनाइटेड इंडिया रैली की कामयाबी के बाद ये धारणा खास तौर पर बनती नजर आ रही है. पश्चिम बंगाल में तो इस वक्त मोदी-मोदी की तरह दीदी-दीदी ही होने लगा है.

कोलकाता रैली में न तो राहुल गांधी गये और न ही मायावती - दोनों ही नेताओं ने अपने प्रतिनिधियों को भेजा था. ऐसा करने के पीछे उनके खुद के रिजर्वेशन थे. ममता बनर्जी को जिस तरह का सपोर्ट मंच पर हासिल हुआ वो तो ठीक है, पर रैली से दूर रहे दोनों नेता - मायावती और राहुल गांधी तो ऐसे प्रोजेक्ट करने लगे हैं जैसे वे सरकार बनाने ही जा रहे हों.

इसका ताजातरीन उदाहरण है - राहुल गांधी का गरीबी हटाओ फॉर्मूला और मायावती का उस पर कड़ा ऐतराज. कहीं इसके पीछे कांग्रेस प्रियंका गांधी वाड्रा की एंट्री तो नहीं है?

मायावती हमेशा ऐसे तो रिएक्ट नहीं करतीं

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की ओर से आभार रैली बुलायी गयी थी. लोक सभा चुनाव तक लोगों का मन बदल न जाये इसलिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही जनता से जुड़े रहने के लिए ऐसे तरीके अपना रहे हैं.

मध्य प्रदेश में राहुल गांधी ने सरकार बनने पर 10 दिन के भीतर किसानों की कर्जमाफी का वादा किया था. कमलनाथ सरकार का दावा तो है कि वादा निभाया जा रहा है, लेकिन सब कुछ सवालों के घेरे से बाहर नहीं हो रहा है. बहरहाल, राहुल गांधी ने नयी घोषणा के लिए छत्तीसगढ़ का मैदान चुना - नजर निश्चित तौर पर लोक सभा चुनाव पर ही है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने घोषणा की, 'हम एक ऐतिहासिक फैसला लेने जा रहे हैं, जो दुनिया की किसी भी सरकार ने नहीं लिया है. 2019 का चुनाव जीतने के बाद देश के हर गरीब को कांग्रेस पार्टी की सरकार न्यूनतम आमदनी की गारंटी देगी. हर गरीब व्यक्ति के बैंक खाते में न्यूनतम आमदनी रहेगी.'

किसानों की कर्जमाफी के बाद वोट जुटाने के लिए निश्चित तौर पर ये राहुल गांधी की ओर से बड़ी घोषणा है. राहुल के इस बयान पर पॉलिटिकल रिएक्शन तो लाजिमी रहा - लेकिन हैरानी हुई है मायावती के कड़े ऐतराज से.

राजनीतिक रस्मअदायगी की बात और है, वरना मायावती ने तो कुछ बीट निर्धारित कर रखे हैं और उसी दायरे में उनके बयान आते रहते हैं - दलितों से जुड़े मुद्दे, सवर्ण आरक्षण या फिर एससी-एसटी एक्ट से जुड़ी कोई बात हो.

mayawati, sonia, rahul gandhiसंभावित विपक्षी गठबंधन से मायावती ने अभी पूरी तरह पल्ला तो नहीं झाड़ा है, कांग्रेस को बस यूपी गठबंधन से दूर रखा है

सवाल उठता है कि मायावती ने आगे बढ़ कर राहुल गांधी के इस ऐलान पर इस तरीके से प्रतिक्रिया क्यों दी?

वैसे तो मायावती ने अपनी प्रतिक्रिया में कांग्रेस के साथ ही बीजेपी को भी लपेटा है, कहती हैं, 'कहीं ये भी पूर्व की कांग्रेस सरकार के गरीबी हटाओ और मौजूदा सरकार के काले धन, 15 लाख और अच्छे दिन की तरह नकली वादा तो नहीं?'

मायावती का कहना है कि दोनों फेल हो चुके हैं - कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही एक ही सिक्के के दो पहलू साबित हुए हैं. एक बात नहीं समझ में आ रही कि जिस तरह का रिएक्शन बीजेपी की ओर से आना चाहिये वो मायावती की तरफ से क्यों आया?

कहीं ये प्रियंका गांधी वाड्रा का असर तो नहीं

राहुल गांधी को मायावती की सलाह है कि पहले जनहित, जनकल्याण और गरीबी उन्मूलन वाली स्कीम कांग्रेस शासित राज्यों में आजमायी जानी चाहिये. कांग्रेस को राजस्थान, पंजाब, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में ऐसी स्कीम लागू करके दिखाना चाहिये था, ताकि लोगों को इस प्रकार की घोषणाएं छलावा और हवा-हवाई न लगें.

ऐसा लगता है जैसे राहुल गांधी धीरे धीरे कांग्रेस का चुनावी घोषणा पत्र पेश करते जा रहे हैं. किसानों की कर्जमाफी का नुस्खा तो विधानसभा चुनावों में आजमा ही चुके हैं. अब कह रहे हैं कि यदि 2019 लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में आती है तो महिला आरक्षण विधेयक पूरी तत्परता से पास कराया जाएगा. अब गरीबों के लिए आय गारंटी स्कीम भी उसी का हिस्सा है. ये कुछ कुछ ऐसे ही है जैसे मनरेगा के तहत गरीबों को साल में कम से कम 100 दिन रोजगार की गारंटी दी जाती है. पहले बीजेपी इस स्कीम का माखौल उड़ाती थी - बाद में खुद ही जोर देने लगी. 2009 में यूपीए सरकार की सत्ता में वापसी के पीछे ये भी एक बड़ा कारण रहा.

कहीं मायावती को ऐसा तो नहीं लग रहा है कि अगर प्रियंका राहुल गांधी के वादे को आगे बढ़ाने लगीं तो उनका वोट बैंक हाथ से निकल जाये. एक तो पहले से ही प्रियंका गांधी में लोग इंदिरा गांधी की छवि देखने की बात करने लगे हैं, मायावती को ये डर तो नहीं कि नयी पैकेजिंग के साथ गरीबी हटाओ का वादा मुश्किलें न खड़ी कर दे.

क्या प्रियंका गांधी खुल कर राजनीति में नहीं आयी होतीं या यूपी में प्रभारी नहीं बनी होतीं तो भी मायावती का यही रिएक्शन होता?

ये तो साफ है कि प्रियंका गांधी वाड्रा के यूपी में धावा बोलने से बीजेपी के साथ साथ मायावती और अखिलेश यादव भी परेशान हैं - लेकिन मायावती ने इस मामले में लीड क्यों ली ये थोड़ा अलग मैसेज दे रहा है.

आखिर मायावती को किस बात का डर सता रहा है? कहीं मायावती को ये तो नहीं लग रहा है कि जिस तरह कांग्रेस मनरेगा लागू कर 2009 में वोट बटोर ले गयी और दोबारा सरकार बना ली, उसी तरह कर्जमाफी के बाद नयी गरीबी हटाओ स्कीम लाकर कांग्रेस उनके वोट बैंक में तो सेंध नहीं लगा लेगी?

जिस वोट बैंक को लेकर यूपी में अभी गठबंधन हुआ वे कभी कांग्रेस के ही वोटर रहे हैं. 2014 और 2017 में तो इसीका कुछ हिस्सा बीजेपी के खाते में भी चला गया लगता है. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बीजेपी के साथ साथ मायावती भी तो कांग्रेस के कर्जमाफी दांव से दूध की तरह जली हुई हैं - और अब यूपी में भी शायद उसे ही छाछ की तरह फूंक फूंक कर पी रही हैं. वैसे भी प्रियंका गांधी का यूपी प्रभाव तो 2022 में ही देखने को मिलने वाला है.

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