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Updated: 28 मार्च, 2021 06:25 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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दिल्ली में सरकारी कामकाज की हदें तय करने वाला बिल संसद से पास हो गया है. 24 मार्च, 2021 को ये बिल राज्य सभा से भी पास हो गया तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया. लोक सभा से ये बिल उससे दो दिन पहले 22 मार्च, 2021 को ही पास हो गया था.

व्यावहारिक तौर पर देखा जाये तो अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) अब महज प्रोटोकॉल भर के मुख्यमंत्री रह गये हैं - क्योंकि आगे से कोई भी महत्वपूर्ण काम दिल्ली के उप राज्यपाल की मंजूरी के बगैर नामुमकिन होगा. केंद्र शासित प्रदेश होने के बावजूद अरविंद केजरीवाल बाकी यूनियन टेरिटरी के मुकाबले कुछ ज्यादा कर पाते थे तो वो अब बीते दिनों की बात हो चुकी है.

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को पांच साल से ज्यादा सरकार चलाने का मौका मिला. इस दौरान अरविंद केजरीवाल को तीन बार मुख्यमंत्री बनने और भारी बहुमत से लगातार दो चुनाव जीतने का शानदार मौका भी मिला, लेकिन वो मौके का सही इस्तेमाल नहीं कर सके.

अगर अरविंद केजरीवाल वास्तव में 'वो परेशान करते रहे, हम काम करते रहे' वाली हवाबाजी की जगह दिल्ली पर फोकस होकर जितना भी संभव था किये होते तो आज दिल्ली के लोग रामलीला आंदोलन की तरह उनके साथ सड़कों पर उतर चुके होते - और आप नेता को महज ट्विटर पर विरोध जता कर खामोश नहीं रह जाना पड़ता. जन लोकपाल बनाने के मकसद से राजनीति में आये अरविंद केजरीवाल बाद में दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की बात करने लगे थे, लेकिन सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति की तरफ कदम बढ़ाने के चक्कर में माया भी गंवा दिये और 'राम' भी अब तक काम नहीं आ पाये हैं. ऐसा लगता है जैसे पूरा पाने की कोशिश में जो पास में आधा था उसे भी गंवा दिया और अब हाथ मलते रह जाने के अलावा कोई उपाय नहीं है.

बीजेपी नेतृत्व विधानसभा चुनाव में बेशक मात खा गया, लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कोरोना वायरस के चरम प्रकोप के वक्त जिस तरह अरविंद केजरीवाल को इशारों पर नचा रहे थे - और 'हनमान चालीसा' पढ़ते हुए अक्षरधाम में दिवाली मना रहे थे, बीजेपी को राजनीतिक कदम बढ़ाने का मौका मिल गया. जिस तरह से गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने 2013 के बाद दिल्ली में बदले राजनीतिक समीकरण की तरफ इशारा किया है, साफ है कि रूटीन की राजनीति में बीजेपी नेतृत्व ने चुनावी शिकस्त का बदला ले लिया है.

दिल्ली को लेकर केंद्र का कानूनी संशोधन अगर अरविंद केजरीवाल के लिए आपदा जैसा है तो उनके सामने अब भी अवसरों की कमी नहीं है, बशर्ते अब भी वो गंभीरता से अपनी प्राथमिकता तय कर पायें - सबसे बड़ा मौका बन कर तो अगले साल होने जा रहा एमसीडी चुनाव ही है. जो बात वो खुद और बैठे बैठे सोशल मीडिया पर उनके साथी कह रहे हैं, अगर वही सब लोगों के बीच जाकर कर बातचीत करें, उनकी समस्याओं को समझें और फिर अपनी बात रखें तो बीजेपी को सबक सिखाना, इतना मुश्किल भी नहीं है.

दिल्ली के डिप्टी सीएम और अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी और भरोसेमंद साथी, मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) अगर अपने नेता में पीएम मैटीरियल जैसी छवि देखते हैं तो कोई बुराई वाली बात नहीं है. अगर कांग्रेस नेता राहुल गांधी कदम कदम पर फेल होकर भी खुद की पोजीशन मेंटेन किये हुए हैं तो अरविंद केजरीवाल ने तो रामलीला मैदान आंदोलन से लेकर दिल्ली चुनाव में दोबारा भारी बहुमत हासिल कर अपनी क्षमता को साबित भी किया है.

देश में फिलहाल विपक्ष का जो हाल हो रखा है, उसमें अरविंद केजरीवाल के पास बेहतरीन मौका है, खुद को प्रोजेक्ट करने का - और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) सरकार ने तो काम न करने का स्थायी बहाना भी दे दिया है. अभी तो अरविंद केजरीवाल के पास राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष की भूमिका निभाने का भरपूर मौका और खुला मैदान भी है - बात बस इतनी ही है कि वो स्वयं भी इस चीत की अहमियत को समझने की कोशिश करें.

बीजेपी ने ऐसा जोखिम क्यों उठाया

दिल्ली बीजेपी ने उप राज्यपाल के अधिकार बढ़ाने वाले केंद्र सरकार का बिल पास हो जाने का स्वागत किया है. दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने कहा है कि ऐसा होने से दिल्ली में अधिकारों को लेकर दुविधा खत्म हो जाएगी, लेकिन ये राजधानी में बीजेपी के सभी नेताओं की राय नहीं है. ऐसे काफी बीजेपी नेता हैं जिनको मोदी सरकार का ये कदम बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा है - और वे मानते हैं कि बीजेपी को इससे नुकसान भी हो सकता है क्योंकि ये बैकफायर भी कर सकता है.

अमर उजाला अखबार से बातचीत में बीजेपी नेता जगदीश ममगाई कहते हैं, ये कानून पास कर पार्टी ने केजरीवाल को हमेशा के लिए एक बहाना दे दिया है, 'अब वो कोई भी काम नहीं भी करेंगे तो भी जनता के सामने उनके पास हमेशा यही बहाना होगा कि उप राज्यपाल और केंद्र सरकार उनको कोई काम करने की इजाजत ही नहीं दे रहे हैं.'

बीजेपी के एक अन्य नेता ने अखबार से कहा कि साल भर के भीतर ही नगर निगम के चुनाव होने हैं और हमें जनता के बीच जाना है. बीजेपी नेता का कहना है - अब हम जनता के सामने ये बात कैसे सही साबित कर पाएंगे कि जिस काम के लिए हमने 30 साल धरना-प्रदर्शन किया, हमारी ही सरकार ने अब उसी चीज को गलत साबित कर दिया.

सवाल ये है कि बीजेपी ने आखिर इतना बड़ा जोखिम उठाया ही क्यों?

arvind kejriwalमोदी सरकार ने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली में काम न करने का बहाना दे दिया है, वो चाहें तो मौके का फायदा उठा सकते हैं

लोक सभा में विधेयक पर चर्चा का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने कहा था, 'संविधान के अनुसार दिल्ली, विधानसभा से जुड़े सीमित अधिकारों वाला एक केंद्र शासित राज्य है... सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा है कि ये केंद्र शासित राज्य है - सभी संशोधन कोर्ट के फैसले के मुताबिक हैं.'

लेकिन उसके साथ ही जी किशन रेड्डी ने ये भी कहा कि 2013 तक दिल्ली का शासन सुचारू रूप से चलता था और सभी मामलों का हल बातचीत से हो जाता था. गृह राज्य मंत्री ने कहा, 'पिछले कुछ वर्षों में विषयों को लेकर हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में जाना पड़ा क्योंकि कुछ अधिकारों को लेकर कोई स्पष्टता नहीं थी.'

जी किशन रेड्डी की बातों को समझें तो 2013 तक दिल्ली के पहले के दस साल में केंद्र और दिल्ली दोनों जगह कांग्रेस की ही सरकारें थीं, लिहाजा टकराव का सवाल ही पैदा नहीं होता. उससे पहले दिल्ली भी दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित मुख्यमंत्री रहीं और केंद्र में एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार हुआ करती थी.

2013 वाली बात करके केंद्रीय मंत्री ने ये तो जता ही दिया है कि दिल्ली को लेकर बीजेपी नेतृत्व ने जो कदम बढ़ाया है उसके पीछे खास सोच है. एक तरीके से आम आदमी पार्टी के खिलाफ बीजेपी की तरफ से राजनीतिक हथौड़े का ही इस्तेमाल किया गया है.

तो क्या ये समझा जाये कि दिल्ली की समस्या की वजह बीजेपी के पैरामीटर के हिसाब से डबल इंजन सरकार न होना ही है - और क्या दिल्ली में 2013 से पहले जैसी व्यवस्था बनाये रखने के लिए ही बीजेपी की केंद्र सरकार ने ये काम किया है.

क्या अरविंद केजरीवाल को आगे भी इस बात के लिए तैयार रहना चाहिये कि कभी भी कुछ भी हो सकता है - अगर दिल्ली का मुख्यमंत्री बने रहना है तो मौजूदा माहौल में उनके पास विकल्प भी काफी कम हैं. एक कारगर विकल्प तो यही है कि वो एनडीए में नीतीश कुमार की ही तरह शामिल हो जायें. वरना, ऑपरेशन लोटस के जाल में कभी भी फंस सकते हैं और वो भी नहीं हो पाया तो केंद्र सरकार राष्ट्रपति को एक्शन लेने की सलाह तो दे ही सकती है.

अगर ये सब संभावनाओं की जगह अगर हकीकत है तो अरविंद केजरीवाल एक बार फिर लोगों के पास जायें - अगर उनकी बातों में दम होगा तो दिल्ली के लोग एमसीडी चुनाव में भी बीजेपी को विधानसभा की तरह ही सबक सिखा देंगे!

विपक्ष के नेता की जगह तो खाली है

दिल्ली के मुख्यमंत्री मंत्री रहते अरविंद केजरीवाल के सामने जम्मू-कश्मीर के नेताओं जैसे चुनौती तो कतई नहीं है. वे भले ही घाटी में लोकप्रिय हों, लेकिन बाहर उनको कोई सपोर्ट नहीं मिलने वाला. अरविंद केजरीवाल का मामला बिलकुल अलग है.

अरविंद केजरीवाल चाहें तो दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद को राजनीति में नये रिसर्च के लिए स्कॉलरशिप के तौर पर भी ले सकते हैं. अब तो कुछ न भी करें या टकराव का रास्ता छोड़ दें तो बड़े आराम से बचे हुए चार साल खींच सकते हैं. बीच में अगर दिल्ली का कोई प्रोजेक्ट पूरा नहीं भी किये तो अगले चुनाव से पहले उनसे थीसिस जमा करने को तो कोई कहने वाला भी नहीं है.

जिस तरह से सूरत और एमसीडी उपचुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को कामयाबी मिली है, वो भविष्य की किरण तो देख ही सकते हैं. अगर अरविंद केजरीवाल उस काम में जुट जायें जिसकी कल्पना उनके साथी मनीष सिसोदिया कर रहे हैं, तो संभावनाएं अपार हैं.

राहुल गांधी की राजनीति सबके सामने ही है. बिहार चुनाव के नतीजे पर जिस तरह कांग्रेस के G-23 नेताओं ने हमला बोला और पश्चिम बंगाल चुनाव से लंबी दूरी बनाकर जिस तरह वो दक्षिण की राजनीति पर फोकस हैं, साफ है राहुल गांधी विपक्ष की राजनीति को बेमन से ढो रहे हैं. वैसे भी तकनीकी तौर पर कांग्रेस के पास केंद्र में वो पद मिला भी नहीं है.

ममता बनर्जी की भूमिका तो 2 मई के बाद ही तय हो पाएगी जब पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों की विधानसभाओं के नतीजे आ जाएंगे. एक के बाद एक आ रहे सर्वे में ममता बनर्जी के लिए लगातार बुरी खबर ही आ रही है.

राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष में एक नेता की जो जगह बच रही है, एनसीपी प्रमुख शरद पवार की भी उस पर कड़ी नजर है. शिवसेना की तरफ से बार बार उनको यूपीए का चेयरमैन बनाये जाने की मांग उठ रही है.

अब लगता है राहुल गांधी भी मान चुके हैं कि उनकी किस्मत तभी खुलेगी और कामयाबी भी तभी मिलेगी जब बीजेपी राजनीतिक मोर्चे पर फेल हो जाये, वरना यूं ही वक्त गुजारते रहना पड़ सकता है - और अगर बीजेपी का जलवा ऐसे ही आगे भी बरकरार रहा तो राहुल गांधी के लिए वक्त भी बर्बाद गया ऐसा ही समझा जाएगा - क्योंकि गांधी परिवार सत्ता की राजनीति का इस कदर आदी हो चुका है कि विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए कोई भी समझौता करना मुनासिब नहीं समझता.

अरविंद केजरीवाल के सामने विपक्षी खेमे में खुद को तराश कर खड़ा करने का पूरा मौका मिल रहा है. अगर पहले की ही तरह वो अब कहें कि केंद्र सरकार उनको काम नहीं करने दे रही तो किसी को ये भी नहीं लगेगा कि वो बहाना बना रहे हैं - आखिर ये आपदा में अवसर नहीं है तो क्या है?

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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