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Updated: 03 मई, 2021 07:04 PM
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पश्चिम बंगाल चुनाव नतीजों को लेकर एग्जिट पोल भले ही गलत साबित हुए हों, लेकिन चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की भविष्यवाणी सौ फीसदी सच साबित हुई है. प्रशांत किशोर ने डंके की चोट पर कहा था कि अगर बीजेपी की सीटें 100 का आंकड़ा पार कर गयीं तो वो इलेक्शन कैंपेन का काम छोड़ देंगे. चूंकि बीजेपी 100 के आंकड़े को पार करने की कौन कहे वो तो उसे छू भी न सकी, लिहाजा प्रशांत किशोर को अपना काम छोड़ने की जरूरत नहीं थी, लेकिन फिर भी उनका कहना है कि अब वो ये काम नहीं करेंगे.

जब क्लबहाउस का ऑडियो चैट वायरल हुआ था उसके बाद प्रशांत किशोर ने कुछ इंटरव्यू में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बात की थी. ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) और नरेंद्र मोदी को लोकप्रियता बंगाल में लोकप्रियता के मामले में बराबर बताया था, लेकिन बात जब राहुल गांधी (Rahul Gandhi) से तुलना की चली तो जमीन आसमान का फर्क बताया था.

क्या क्लब हाउस की चर्चा और फिर इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता की बातें करना प्रशांत किशोर के किसी प्रयोजन का हिस्सा रहा? कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रशांत किशोर ने ये सब किसी खास रणनीति के तहत ये चर्चा आगे बढ़ाई हो और ये भी ममता बनर्जी को चुनाव जिताने के लिए उनकी किसी रणनीति का हिस्सा रहा?

प्रशांत किशोर के क्लब हाउस चैट का ऑडियो कोई लीक नहीं हुआ था क्योंकि वो पूरी बातचीत सार्वजनिक ही थी, लेकिन प्रशांत किशोर ने बातचीत के दौरान पूछ लिया था - क्या ये सब सार्वजनिक तौर पर हो रहा है?

प्रशांत किशोर के उसी एक सवाल को लेकर बीजेपी के आईटी सेल के चीफ अमित मालवीय ने खूब उछालने की कोशिश की. एक सार्वजनिक बातचीत को अमित मालवीय ने किसी लीक ऑडियो की तरह पेश किया.

ऐसा क्यों लगता है जैसे अमित मालवीय का प्रशांत किशोर ने अपने चुनाव कैंपेन में ममता बनर्जी के पक्ष में इस्तेमाल कर लिया है?

ये तो हुआ ही कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करके प्रशांत किशोर ने बीजेपी की पूरी टीम को खुश होने का मौका दे दिया. कई दिन तक इस बात पर चर्चा होती रही कि लोकप्रियता के मामले में प्रधानमंत्री मोदी का कोई मुकाबला नहीं है.

बीजेपी के चुनावी रणनीतिकार अमित शाह तो वैसे भी ब्रांड मोदी के बूते ही पश्चिम बंगाल चुनाव लड़ ही रहे थे. प्रशांत किशोर की बातें सामने आने के बाद बीजेपी में भी खुशी की लहर कुछ कुछ इंडिया शाइनिंग जैसी दौड़ी ही होगी - अमित शाह से लेकर उनके साथी भी वाजपेयी के जमाने के प्रमोद महाजन और दूसरे पोल मैनेजरों की तरह थोड़े ढीले तो पड़े ही.

प्रशांत किशोर ने ऑडियो चैट का मुद्दा चर्चा में आने के बाद मीडिया को इंटरव्यू देना शुरू कर दिया. प्रशांत किशोर ने इंटरव्यू में भी वैसी ही बातें की. कह सकते हैं मिलती जुलती बातों में उलझाये रहा.

नतीजा ये हुआ कि कोरोना के नाम पर राहुल गांधी और ममता बनर्जी के रैलियां रद्द करने की घोषणा करते ही बीजेपी दबाव में आ गयी - और मोदी-शाह सहित दूसरे बड़े बीजेपी नेताओं की रैलियां भी रद्द कर दी गयीं. ये भी तो हो सकता है फील गुड फैक्टर हावी हो गया हो, वरना, ये जरूरी भी तो नहीं कि राहुल गांधी और ममता बनर्जी के कदम बढ़ाने के बाद बीजेपी नेतृत्व वैसा करता ही. लेकिन जब लगे कि चुनाव तो जीत ही रहे हैं, फिर तो ऐसा हो ही सकता है. इंडिया शाइनिंग में भी तो यही हुआ था. प्रशांत किशोर ने अरविंद केजरीवाल को जिताने के लिए अलग तरकीब अपनायी थी, ममता बनर्जी के मामले में नया नुस्खा आजमा लिया और कामयाब रहे.

narendra modi, mamata banerjee, amit shahबंगाल की हार का मोदी-शाह की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है

रही बात बंगाल के चुनाव नतीजों की तो बीजेपी भले हार गयी हो, लेकिन लगता तो नहीं कि इसका मोदी-शाह (Modi-Shah) की सेहत पर कोई खास फर्क पड़ने वाला है. हां, कांग्रेस नेता राहुल गांधी के लिए ये चिंता वाली बात जरूर हो सकती है - लेकिन अगर लोगों को कोविड के प्रकोप के चलते ऐसे ही ऑक्सीजन और दवाइयों से लेकर दूसरी चीजों के लिए कुछ दिन और जूझना पड़ा तो मोदी-शाह के लिए बहुत मुश्किल होने वाली है.

बीजेपी की राजनीति पर क्या फर्क पड़ सकता है

देखा जाये तो ममता बनर्जी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेता अमित शाह को बिलकुल वैसी ही शिकस्त मिली है, जैसी 2015 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाकर दी थी.

लेकिन जैसे बिहार की हार का मोदी-शाह की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा, वैसे ही बंगाल की फजीहत से भी बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला है. तब तो मार्गदर्शक मंडल से भी कुछ आवाजें उठी थीं, लेकिन अब तो वे भी बेजान पड़ी हैं.

2015 की जीत के बाद नीतीश कुमार की हैसियत जरूर बढ़ गयी थी और ठीक वैसे ही ममता बनर्जी की भी बढ़ सकती है - लेकिन अगले आम चुनाव में अभी तीन साल का लंबा वक्त है और बीजेपी के पास अकेले भी पूरा बहुमत है. ऐसे में ममता बनर्जी सिवा अपनी किसी तैयारी के मोदी-शाह को तो कहीं से कोई भी नुकसान नहीं पहुंचा सकती हैं.

बीजेपी के भीतर भी ऐसी कोई चुनौती कहीं नजर नहीं आती जो मोदी-शाह के वर्चस्व के लिए किसी तरह की मुश्किल खड़ा करने वाली हो. बंगाल जीत लेने की बात और होती, लेकिन आरएसएस को भी मोदी-शाह से कोई खास शिकायत नहीं होने वाली है - क्योंकि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण तो चल ही रहा है. काशी और मथुरा को लेकर अभी कोई खास प्रयोजन भी नहीं लगता.

धारा 370 और तीन तलाक जैसे मामले निपट ही चुके हैं - और अगले साल जहां जहां भी चुनाव होने वाले हैं वहां तक ममता बनर्जी की जीत भी कोई असर नहीं होने वाला है और न ही ममता बनर्जी उन चुनावों को किसी भी तरीके से प्रभावित करने की स्थिति में हैं.

विपक्ष की राजनीति पर असर

संभव है कि ममता बनर्जी की जीत से विपक्षी खेमे के क्षेत्रीय नेताओं का मनोबल जरूर बढ़ेगा. उद्धव ठाकरे, पिनराई विजयन और नवीन पटनायक जैसे नेताओं के मन में अब तक कोई डर बना हुआ होगा तो वो खत्म जरूर हो सकता है. ऐसे नेताओं को ये समझ में आ सकता है कि अगर क्षेत्रीय तौर पर अपने लोगों के बीच वे डिस्कनेक्ट नहीं हुए तो मोदी-शाह उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाएंगे.

शरद पवार जैसे नेताओं को ममता बनर्जी को मुसीबत के वक्त साथ न देने का अफसोस जरूर हो सकता है. मदद तो ममता बनर्जी ने अरविंद केजरीवाल से भी मांगी थी, लेकिन कोई ममता की मदद में न मौके पर जाकर खड़ा हुआ न वोट मांगने गया.

शरद पवार ने ममता के पास अपना प्रतिनिधि भेजा था, लेकिन ममता बनर्जी ने तो उनको खास तौर पर बुलाया था. प्रतिनिधि भेजना रस्म अदायगी होता है, जबकि खुद की मौजूदगी अलग मायने रखती है. अखिलेश यादव ने भी जया बच्चन को भेज दिया था. तेजस्वी यादव और हेमंत सोरेन जरूर पहुंचे थे.

ममता बनर्जी को विपक्षी नेताओं का साथ तो तब भी मिला था जब ममता बनर्जी अपने पुलिस कमिश्नर के लिए कोलकाता में धरने पर बैठ गयी थीं - अभी तो बड़ी ही मुश्किल चुनावी लड़ाई में जीत हासिल की हैं, लिहाजा बधाइयों की बौछार तो होनी बनती ही है.

राष्ट्रीय स्तर पर ममता को पहली चुनौती तो राहुल गांधी से ही मिलेगी, भले ही झारखंड के बाद के सारे विधानसभा चुनाव कांग्रेस हारती आ रही हो. कांग्रेस भी राहुल गांधी के लिए अब ममता बनर्जी को वैसे ही लेगी जैसे छह साल पहले वो नीतीश कुमार के नाम पर बिफर उठती थी.

ममता की ही तरह विपक्षी खेमे से जीत हासिल करने वाले पिनराई विजयन और एमके स्टालिन भी निश्चित तौर पर दिल्ली में अपनी हिस्सेदारी के लिए तत्पर तो होंगे ही, लेकिन विजयन की राह में जहां उम्र आड़े आ सकती है, वहीं स्टालिन का झुकाव ज्यादा राहुल गांधी के प्रति ही है.

अब ममता बनर्जी की राह नीतीश कुमार जैसी कमजोर बुनियाद पर बनी नहीं है, लिहाजा वो अगर किसी के लिए चुनौती बन सकती हैं तो वो राहुल गांधी ही हैं - मुद्दे की बात ये है कि जब तक राहुल गांधी के प्रति विपक्ष का मोहभंग नहीं हो जाता ममता बनर्जी को नेता बनने का मौका नहीं मिलने वाला है.

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