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Updated: 14 जनवरी, 2021 07:25 PM
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ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के साथियों पर लगता है बीजेपी नेतृत्व का माइंड गेम हावी होने लगा है. बीजेपी नेता अमित शाह (Amit Shah) के पश्चिम बंगाल चुनाव से काफी पहले ही शुभेंदु अधिकारी सहित दर्जन भर नेताओं के टीएमसी से झटक लेने का तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर साफ साफ असर दिखने लगा है.

ममता बनर्जी कहां अभी पार्टी संभालने में लगी थीं और कहां घर में ही बगावत शुरू होने लगी है. ममता बनर्जी के भाई ने तृणमूल कांग्रेस नेता पर वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है. अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के पार्टी में बढ़ते दखल को लेकर ममता बनर्जी पहले से ही तृणमूल नेताओं के निशाने पर हैं. तृणमूल कांग्रेस छोड़ने की शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के लिए अभिषेक बनर्जी के तौर तरीके ही बड़ा कारण बने हैं.

सीनियर तृणमूल कांग्रेस नेता सौगत रॉय ने पश्चिम बंगाल की सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर बीजेपी का विरोध करने की अपील की है - और ऐसा करने के लिए सबको ममता बनर्जी का साथ देना होगा. सौगत रॉय का सुझाव भी यही है कि लेफ्ट और कांग्रेस मिलकर ममता बनर्जी का सपोर्ट करें.

तृणमूल कांग्रेस की ये कोशिश 2019 के आम चुनाव जैसी ही लगती है, जब पूरे विपक्ष को बीजेपी के खिलाफ एक प्लेटफॉर्म पर लाकर ममता बनर्जी केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी को चैलेंज करने की कोशिश कर रही थीं. तब तो ममता बनर्जी का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंचने जैसा ही महसूस हो रहा था क्योंकि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक्सपाइरी डेट पीएम कह कर बुलाने लगी थीं.

लेफ्ट को सत्ता से बेदखल करने के बाद ही ममता बनर्जी को राइटर्स बिल्डिंग में एंट्री मिली - और अब उसी वाम मोर्चे से मदद की गुहार लगाने को भला कैसे समझा जाना चाहिये? सौगत रॉय लेफ्ट के साथ साथ कांग्रेस का भी साथ मांग रहे हैं, ये तो ऐसे ही लग रहा है जैसे तृणमूल कांग्रेस नेताओं के मन में भी ममता बनर्जी के एक्सपाइरी डेट सीएम जैसा डर घर करने लगा है.

ममता बनर्जी के टीम लगता है अब बीजेपी की तरफ से दबाव महसूस करने लगी है. अगर बीजेपी के माइंड गेस के चलते ऐसा हुआ है तो, इसमें पिछड़ना ममता बनर्जी के लिए घातक हो सकता है - अब जिस तरीके से बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की अपील हो रही है, आशंका तो ऐसी ही होगी कि नतीजे भी कहीं आम चुनाव जैसे ही न हों?

सौगत रॉय की अपील काफी नुकसानदेह है

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कोशिश केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी नेता अमित शाह के हर प्रयास को काउंटर करने की है - जैसे बाउल गायक बासुदेव दास को स्टेज पर बुलाकर अपनी तारीफ करा लेना. या अमित शाह के घरों में जाकर लंच करने को काउंटर करने के लिए चलते चलते लोगों के बीच पहुंच कर खाने पकाने लगना, लेकिन ये कार्यकर्ताओं की हौसलाअफजाई के लिए प्रदर्शन भर लगता है जो ऊपरी प्रदर्शन से ज्यादा कुछ नहीं लगता.

सौगत रॉय के बयान में वो झलक दिखायी दे रही है जो अब तक ममता बनर्जी के रुख में कभी नहीं देखने को मिली है. लेफ्ट के साथ अब तक शिद्दत से दुश्मनी निभाती आयीं ममता बनर्जी ने हमेशा ही अपनी भावना एक्शन के रूप में प्रदर्शित की है. 2019 के आम चुनाव की तरह विपक्ष को बीजेपी के खिलाफ एकजुट करने की कोशिश में भी ममता बनर्जी लेफ्ट की दुश्मनी नहीं भुला पायीं थी - याद कीजिये ब्रिगेड परेड ग्राउंड की रैली में भी ममता बनर्जी ने लेफ्ट के नेताओं को न्योता नहीं दिया था. जब तमिलनाडु से जम्मू-कश्मीर तक के नेताओं को जुटाया था, लेकिन वाम मोर्चे से दूरी बनाये रखी.

mamata banerjee, saugat roy, amit shahअगर तृणमूल कांग्रेस बीजेपी से घिरा हुआ महसूस कर रही है तो ये ममता बनर्जी के समर्थकों को लिए ठीक नहीं है

ये ममता बनर्जी ही हैं जो चाहती थीं कि कांग्रेस दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन कर ले, लेकिन वो खुद कभी पश्चिम बंगाल में लेफ्ट का साथ लेने को राजी नहीं हुईं. ममता बनर्जी का ये गुस्सा आम चुनाव के नतीजे आने तक हाई हो चला था. टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू चाहते थे कि राहुल गांधी के साथ विपक्षी दलों की मीटिंग में ममता बनर्जी भी शामिल हों, लेकिन ममता तैयार नहीं हुईं.

अब वही तृणमूल कांग्रेस चाहती है कि वाम मोर्चा और कांग्रेस मिलकर बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में ममता बनर्जी का साथ दें, लेकिन ममता बनर्जी के साथियों को ऐसा लगता क्यों है कि पार्टी को ऐसा सपोर्ट मिल भी पाएगा. 2016 के विधानसभा चुनाव के बाद जितने भी पंचायत और निकायों के चुनाव हुए हैं, हर बार भारी हिंसा हुई है. लेफ्ट और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों की शिकायत रही है कि तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता उनके उम्मीदवारों को धमकाते हैं और मारते पीटते भी रहते हैं. हत्याओं तक के इ्ल्जाम लगे हैं.

तृणमूल कांग्रेस सांसद सौगत रॉय ने मीडिया से बातचीत में कहा, 'अगर वाम मोर्चा और कांग्रेस वास्तव में बीजेपी के खिलाफ हैं तो उनको भगवा दल की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ लड़ाई में ममता बनर्जी का साथ देना चाहिये.' सौगत रॉय का दावा है कि सिर्फ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही बीजेपी के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष राजनीति का असली चेहरा हैं.

लेफ्ट और कांग्रेस ही नहीं बीजेपी की तरफ से भी कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसा, हमला और हत्या जैसे संगीन आरोप लगाने के बावजूद क्या कभी कहीं कोई सुनवाई हुई है. ये तो अब मान कर चला जाने लगा है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान हिंसा होनी ही है - लेकिन क्या ममता बनर्जी ने कभी किसी की ऐसी कोई अपील सुनी है?

ममता बनर्जी तो हिंसा के लिए बाहरी तत्वों को जिम्मेदार बताने लगती हैं, जिस राज्य में कानून व्यवस्था लागू करने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पर हो, वही कहे कि ये सब बाहरी तत्व हैं तो कितना अजीब लगेगा.

सौगत रॉय से पहले सीपीआई-एमएल महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या ने भी भी सभी वाम दलों को सलाह दी थी कि वे मिल कर बीजेपी का विरोध करें और इसके लिए ममता बनर्जी का साथ दें, लेकिन वो सलाह सिरे से खारिज कर दी गयी.

दरअसल, पश्चिम बंगाल का विपक्ष बीजेपी के पश्चिम बंगाल में दिनों दिन मजबूत होते जाने के लिए किसी और को नहीं बल्कि ममता बनर्जी को ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार मानता है.

2016 में हुए विधानसभा चुनाव से पहले काफी दिनों तक ऐसा लग रहा था जैसे ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करना चाहती हैं. असल में, 2011 के चुनाव में ममता बनर्जी ने कांग्रेस के साथ मिल कर ही चार दशक पुरानी वाम मोर्चे की सरकार को सत्ता से बेदखल किया था, लेकिन मुख्यमंत्री बनने के करीब साल भर बाद ही ममता ने मौका देख कर केंद्र की यूपीए सरकार से सपोर्ट वापस ले लिया, प्रतिक्रिया में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने भी वैसा ही किया. केंद्र में तो कांग्रेस को कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के कई विधायक तृणमूल कांग्रेस में चले गये और कांग्रेस को ये बात बहुत ही ज्यादा बुरी लगी.

बाद में ममता बनर्जी की कोशिश रही कि भले ही कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में चुनावी गठबंधन न हो लेकिन कांग्रेस किसी भी सूरत में लेफ्ट के साथ तो न ही जाये, लेकिन बिलकुल वैसा ही हुआ - और इस बार भी वही हो रहा है. कांग्रेस ने आम चुनाव के बाद लोक सभा में अधीर रंजन चौधरी को नेता बनाने के बावजूद पश्चिम बंगाल कांग्रेस का दोबारा अध्यक्ष बना कर कोलकाता भेज दिया है.

अधीर रंजन चौधरी के हाथ में कमान रहते हुए तो ममता बनर्जी को पार्टी का सपोर्ट मिलने से रहा - और लेफ्ट नेता जब दीपांकर भट्टाचार्या की नहीं सुने तो सौगत राय की अपील क्या मायने रखती है.

लिहाजा सौगत रॉय की अपील का फायदा तो होने से रहा, नुकसान होने ज्यादा आशंका लग रही है - क्योंकि सौगत रॉय की इस बात का मैसेज काफी गलत जाएगा - जो कोई भी ममता बनर्जी की बीजेपी के मुकाबले हैसियत तौल रहा होगा उसके लिए तो ये भरोसा करना मुश्किल हो सकता है कि ममता बनर्जी कमजोर नहीं पड़ रही हैं - और अगर ऐसा हुआ तो सीधा नुकसान ममता बनर्जी को ही होगा.

वंशवाद की राजनीति पर सफाई

ममता बनर्जी को शुरू से ही हर कोई दीदी कह कर संबोधित करता आ रहा है. यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह तक कटाक्ष करते वक्त भी दीदी कह कर ही संबोधित करते रहे हैं, लेकिन तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी से पार्टी में बढ़ती नाराजगी के बीच ममता बनर्जी के संबोधन के लिए एक और नाम दिया जा चुका है - पीशी. पीशी का मतलब आंटी होता है. विपक्ष इस नाम को और ज्यादा हवा दे रहा है ताकि अभिषेक बनर्जी को टारगेट किया जा सके.

अभी अभी पश्चिम बंगाल के दौरे पर गये बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तो अभिषेक बनर्जी को राजकुमार कह कर संबोधित किया. ये ठीक वैसे ही है जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस नेता राहुल गांधी को युवराज कह कर तंज कसते रहे हैं - या फिर बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान आरजेडी नेता तेजस्वी यादव को जंगलराज का युवराज कह कर संबोधित किया था.

abhishek banerjeeये क्या अभिषेक बनर्जी को बीजेपी 'राजकुमार' कह कर संबोधित कर रही है और ममता बनर्जी को 'पीशी' कह कर निशाना बनाया जाने लगा है.

हाल ही में ममता बनर्जी के एक भाई कार्तिक बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में वंशवाद की राजनीति पर चिंता जताकर ममता बनर्जी को ही टारगेट किया था. अभी कार्तिक बनर्जी ने बीजेपी ज्वाइन करने के संकेत तो नहीं दिये हैं, लेकिन उनका बयान तो जेपी नड्डा की लाइन ही पकड़ रहा है.

कार्तिक बनर्जी का कहना है कि ऐसे राजनेताओं से तंग आ चुके हैं, जो आम लोगों की जिंदगी बेहतर करने का वादा करते हैं लेकिन अंत में सिर्फ अपने परिवार वालों की जिंदगी ही बेहतर बना पाते हैं.

ममता बनर्जी पर वंशवाद के आरोप को लेकर भी सौगत रॉय ने बचाव किया है. सौगत रॉय कहते हैं, 'डायमंड हार्बर के सांसद और टीएमसी की युवा शाखा के प्रमुख अभिषेक बनर्जी को घोष की तुलना में ज्यादा राजनीतिक अनुभव है. वो 2015 से ही राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन उन्होंने कभी तृणमूल का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनने का दावा पेश नहीं किया.' घोष से आशय पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष से है.

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