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Updated: 04 जनवरी, 2021 10:52 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी (Pirzada Abbas Siddiqui) से हाथ मिलाने को ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के लिए लगातार दूसरे बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है. पहला बड़ा झटका रहा ममता बनर्जी के मुकुल रॉय जैसे करीबी रहे शुभेंदु अधिकारी का अमित शाह की मौजूदगी में 9 विधायकों और एक सांसद के साथ बीजेपी ज्वाइन कर लेना. पूरे अधिकारी परिवार का बीजेपी ज्वाइन कर लेना इस कड़ी में तीसरा बड़ा झटका हो सकता है, जिसकी आशंका बनी हुई है.

ओवैसी को सपोर्ट का वादा करने वाले अब्बास सिद्दीकी हुगली जिले की फुरफुरा शरीफ दरगाह से जुड़े धार्मिक मुस्लिम नेता हैं, लेकिन कुछ दिनों से उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी जाग उठी है. वो अपनी राजनीतिक पार्टी लांच करने वाले हैं और असदुद्दीन ओवैसी से मुलाकात के बाद विधानसभा चुनाव में एक मुस्लिम मोर्चा खड़ा किये जाने की संभावना नजर आने लगी है.

माना जाता है कि अधिकारी परिवार का पश्चिम बंगाल की 80 सीटों पर सीधा प्रभाव है - और बिलकुल वैसे ही ये भी मान्यता है कि सूबे की करीब 100 सीटों के नतीजों में फुरफुरा शरीफ दरगाह की निर्णायक भूमिका होती है. हालांकि, इसका मतलब ये भी नहीं कि पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 180 सीटों से ममता बनर्जी हाथ धो बैठेंगी - कुछ सीटें कॉमन भी होंगी और जो फैक्टर कहीं नुकसान पहुंचाएंगे, वे ही कहीं फायदेमंद भी साबित हो सकते हैं.

ये राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही है, वरना अब्बास सिद्दीकी ममता बनर्जी के कट्टर सपोर्टर रहे हैं - और ममता के सत्ता की सीढ़ी तय करने में अब्बास सिद्दीकी के दरगाह की भी शुभेंदु अधिकारी परिवार के बराबर ही भूमिका रही है. निश्चित तौर पर ममता बनर्जी के लिए ये मुश्किल घड़ी आ गयी है जब उनके सपोर्ट वाले दो मजबूत खंभों का झुकाव राजनीति की दूसरी छोर की तरफ हो गया है.

वैसे अब्बास सिद्दीकी जिस वोट बैंक और दरगाह के दबदबे की बदौलत राजनीतिक अंगड़ाई ले रहे हैं, उसकी निष्ठा भी गुजरते वक्त के साथ बदलती रही है. लेफ्ट शासन के बरसों बरस बंगाल में शासन जमाये रखने के पीछे भी दरगाह के धार्मिक नेताओं का ही सपोर्ट हुआ करता था, लेकिन, बताते हैं, 2006 में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में बंगाली मुसलमानों की अच्छी तस्वीर न दिखाने से नाराज होकर ये लोग अपना समर्थन लेफ्ट से शिफ्ट कर ममता बनर्जी की तरफ कर दिया - और ममता बनर्जी को राइटर्स बिल्डिंग में डायरेक्ट एंट्री मिल गयी. अब ममता बनर्जी से भी मोहभंग हो गया है क्योंकि अब परोक्ष राजनीति से प्रत्यक्ष राजनीतिक भूमिका आकर्षित करने लगी है.

अब अगर ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के नेता असदुद्दीन ओवैसी और अब्बास सिद्दीकी की मुलाकात और मिल कर चुनाव लड़ने के ऐलान को ज्यादा अहमियत नहीं दे रहे हैं तो उसकी एक बड़ी वजह भी है. दरअसल, अब्बास सिद्दीकी को पूरे फुरफुरा शरीफ दरगाह का सपोर्ट हासिल नहीं है. अब्बास सिद्दीकी के चाचा ही उनके विरोध में उतर आये हैं, जिनका अलग और सिद्दीकी परिवार में कहीं ज्यादा सम्मान है.

निश्चित तौर पर अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी मिल कर ममता बनर्जी के खिलाफ एक माहौल तो बनाएंगे ही, लेकिन तब क्या होगा जब अमित शाह की तरह ही असदुद्दीन ओवैसी को बाहरी बता कर ममता बनर्जी ने अपनी बात समझा दी - और साथ देने के लिए अब्बास सिद्दीकी भी नप गये?

ममता के खिलाफ अब्बास सिद्दीका का मोर्चा

उत्तर और दक्षिण 24 परगना में पिछले करीब छह महीने में पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने जगह जगह 50 से ज्यादा रैलियां की है - ये रैलियां कहने को तो धार्मिक समागम जैसी होती हैं, लेकिन बातें वहां सिर्फ सियासत की होती हैं. अब्बास सिद्दीकी भी इसे कोई चुपके चुपके नहीं करते, बल्कि हर बात डंके की चोट पर करते हैं.

ओवैसी से मुलाकात से पहले से ही वो कहते आ रहे हैं, 'हमे ममता बनर्जी की कोई जरूरत नहीं है... मैंने उनसे पहले से ही बोल रखा है कि अगर बीजेपी को रोकना है तो हमारी पार्टी के साथ उनको आना होगा.' खबर है कि अब्बास सिद्दीकी चुनाव आयोग के फैसले का इंतजार कर रहे हैं और जल्द ही अपनी राजनीतिक पार्टी शुरू कर सकते हैं.

अपना राजनीतिक दल शुरू करने से पहले से ही पीरजादा अब्बास सिद्दीकी तृणमूल कांग्रेस से मोलभाव शुरू कर चुके थे - ममता बनर्जी से अपनी पार्टी के लिए अब्बास सिद्दीकी ने, खबरों के मुताबिक, 44 सीटें मांगी थी.

asaduddin owaisi, mamata banerjeeममता बनर्जी को चुनाव से पहले भले ही जोरदार झटके मिल रहे हों, लेकिन उनको न्यूट्रलाइज करने के उपाय खत्म नहीं हुए हैं

ममता बनर्जी के लिए अब्बास सिद्दीकी खतरा तो पहले से ही महसूस किये जा रहे हैं, आखिर तभी तो तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने 24 परगना के भांगर में हो रही उनकी धार्मिक सभा पर धावा बोल दिया था. अब तो तृणमूल कार्यकर्ता शुभेंदु अधिकारी के समर्थकों के साथ भी ऐसे ही हिंसक तरीके से पेश आने लगे हैं.

ममता बनर्जी से अब्बास सिद्दीकी सार्वजनिक तौर पर सबसे ज्यादा खफा 2019 में संसद में लाये गये नागरिकता संशोधन बिल के दौरान खफा नजर आये. अब्बास सिद्दीकी नागरिकता संशोधन बिल पेश होने के दौरान तृणमूल कांग्रेस के 8 सांसदों की गैरहाजिरी से बेहद खफा थे - और तब भी ममता बनर्जी के खिलाफ सख्त तेवर दिखाये थे.

गुस्से में लाल अब्बास सिद्दीकी ने तभी कहा था, 'मुख्यमंत्री को ऐसी लड़कियों को संसद में भेजने की क्या जरूरत थी जो किसी काम की नहीं हैं?' अब्बास सिद्दीकी टीएमसी की उन सांसदों की बात कर रहे थे जो फिल्म एक्टर हैं.

ओवैसी को पीरजादा की मदद क्यों चाहिये?

AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी ने अब्बास सिद्दीकी से मुलाकात के बाद मीडिया से कहा - 'अब्बास सिद्दीकी का समर्थन हमें हासिल है - और जो फैसला वो लेंगे, वही हमें मंजूर होगा.' ओवैसी ने बताया कि उनकी फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के अलावा पीरजादा नौशाद सिद्दीकी, पीरजादा बैजीद अमीन, सब्बीर गफ्फार सहित कई प्रभावशाली मुस्लिम नेताओं से मुलाकात और बात हुई है.

असदुद्दीन ओवैसी और अब्बास सिद्दीकी की मुलाकात को लेकर कुछ सवाल भी हैं, जिनके जवाब ये दोनों शायद न दे पायें, इसलिए चुनाव नतीजों से ही मालूम हो सकेगा.

सवाल ये है कि आखिर असदुद्दीन ओवैसी को अब्बास सिद्दीकी की उस पार्टी से समझौते की जरूरत क्यों पड़ी जिसके वजूद का भी अभी नहीं मालूम? सवाल ये भी है कि असदुद्दीन ओवैसी और अब्बास सिद्दीकी मिल कर क्या ममता बनर्जी को वास्तव में चैलेंज कर पाएंगे?

और दोनों के मिल कर ममता बनर्जी के चैलेंज करने का मतलब कुछ सीटें भी हासिल करना है या महज वोटकटवा बन कर रह जाना है?

ये सवाल यूं ही नहीं उपजे हैं - मौजूदा राजनीतिक हालात और ओवैसी की राजनीतिक पहुंच की सीमाएं भी ऐसे सवालों को जन्म दे रही हैं. बिहार में विधानसभा की पांच सीटें जीतने के बाद ही ओवैसी ने पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था.

तृणमूल कांग्रेस ने ओवैसी के चुनाव लड़ने के ऐलान के साथ ही AIMIM के पश्चिम बंगाल प्रदेश अध्यक्ष अनवर पाशा को अपने पाले में खींच कर पहला ही जोरदार झटका दिया था. तभी अनवर पाशा का कहना रहा, AIMIM ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने का सपना देख रही है और वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर बीजेपी को फायदा पहुंचा रही है. ओवैसी को लेकर टीएमसी की राजनीतिक लाइन यही है और अनवर पाशा भी तो पार्टी ज्वाइन करने के बाद वही तो बोलेंगे.

बिहार चुनाव में बेहतरीन स्ट्राइक रेट का प्रदर्शन करने वाले सीपीआई-एमएल नेता दीपांकर भट्टाचार्य ने वाम दलों के सामने ममता बनर्जी के सपोर्ट का प्रस्ताव रखा था, लेकिन वो तत्काल प्रभाव से वो सिरे से खारिज हो गया - ये बोल कर कि बिहार और बंगाल की राजनीति में बुनियादी फर्क है.

असदुद्दीन ओवैसी के मामले में भी यही बात लागू होती है - अगर ओवैसी को लगता है कि बिहार में पांच सीटें जीत लेने के बाद बंगाल की 30 फीसदी आबादी में पहुंच बना कर बंगाल में किंग मेकर बन जाएंगे तो करीब करीब हवाई किला बनाने जैसा ही है. हालांकि, ओवैसी की पार्टी को जो पांच सीटें मिली हैं उनमें चार पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों से सटे पूर्णिया और किशनगंज जिलों से हैं.

बिहार में तो चल गया लेकिन ओवैसी के लिए बंगाल में कुछ हासिल करने के मकसद से पैर खड़े करने में भी मुश्किल आने वाली है. भले ही ओवैसी देश भर में मुसलमानों के नेता बने फिरते हों, लेकिन उर्दू, हिंदी और अंग्रेजी बोल कर बंगाली मुसलमानों के बीच पैठ बनाना काफी मुश्किल काम है. पश्चिम बंगाल में काम कर रहे ज्यादातर AIMIM नेता उर्दू बोलने वाले हैं और शहरी इलाकों से हैं जबकि 90 फीसदी बांग्ला भाषी मुसलमान ग्रामीण इलाकों से आते हैं.

ये आम धारणा रही है कि जिस किसी राजनीतिक दल को फुरफुरा शरीफ का समर्थन हासिल हो गया, चुनाव में उसकी जीत पक्की है - क्योंकि मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तरी दिनाजपुर, बीरभूम, दक्षिण 24 परगना और कूचबिहार जैसे इलाकों में मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं जहां दरगाह के धार्मिक नेताओं का गहरा असर है.

अब्बास सिद्दीकी से हाथ मिलाने के बाद असदुद्दीन ओवैसी भले ही ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन उनके दावे बहुत मजबूत नहीं लगते. सिर्फ टीएमसी या कांग्रेस नेता ही नहीं, बल्कि सिद्दीकी परिवार के लोगों को भी नहीं लग रहा कि पश्चिम बंगाल के मुसलमान किसी के झांसे में आसानी से आने वाले हैं.

असदुद्दीन ओवैसी गुजरात दंगे की याद दिलाकर ममता बनर्जी को घेरने की कोशिश भी करते हैं. पूछते हैं, ममता बनर्जी कहां थी जब गुजरात जल रहा था? असल में असदुद्दीन ओवैसी तब के तृणमूल कांग्रेस के बीजेपी के साथ के गठबंधन की ओर ध्यान खींचना चाहते हैं.

बीबीसी ने ममता सरकार में मंत्री फिरहाद हकीम को ये कहते बताया है, 'बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए 147 सीटों की जरूरत है, लेकिन ओवैसी के पास इतने उम्मीदवार ही नहीं है - उनकी पार्टी बीजेपी की राह आसान बनाने के लिए ही राजनीति में उतर रही है.'

पश्चिम बंगाल कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के साथ फुरफुरा शरीफ का दौरा करने वाले कांग्रेस नेता अब्दुल मन्नान के हवाले से बीबीसी की रिपोर्ट कहती है, 'बंगाल के मुसलनाम इतने मूर्ख नहीं हैं - अगर धर्म के आधार पर राजनीति होती तो मुस्लिम लीक का वजूद खत्म नहीं होता.'

टीएमसी सांसद सौगत रॉय की भी राय तकरीबन ऐसी ही है और वो भी ध्यान दिलाते हैं कि बंगाल में उर्दूभाषी मुसलमानों की तादाद काफी कम है जो ओवैसी जैसे नेताओं का सपोर्ट बंगाल से बाहर सपोर्ट करते होंगे.

फुरफुरा शरीफ के ही पीरजादा ताहा सिद्दीकी, अब्बास सिद्दीकी के चाचा हैं और उनके मुकाबले इलाके में उनका नाम ज्यादा सम्मान के साथ लिया जाता है. पीरजादा ताहा सिद्दीकी को भी अब्बास सिद्दीकी की हरकतें मुनासिब नहीं लग रही हैं. वो ज्यादा कुछ तो नहीं कहते, लेकिन जो भी कह रहे हैं बात जोरदार है, 'धार्मिक नेताओं के लिए सियासत ठीक नहीं है.'

एकबारगी ऐसी संभावना तो बनती ही है कि ओवैसी और सिद्दीकी मिल कर एक दूसरे के लिए पूरक रोल निभा सकते हैं, लेकिन ये दांव कहीं उलटा पड़ गया तो - ममता को हराने के लिए बाहरी ओवैसी से हाथ मिलाने को लेकर मुस्लिम समुदाय खफा हो गया तो क्या होगा? वही होगा जो मंजूर-ए-मुस्लिम मतदाता होगा!

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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