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Updated: 22 जुलाई, 2022 07:16 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने हाल फिलहाल जो रवैया दिखाया है, वो सब पिछले एक साल की उनकी राजनीति से बिलकुल अलग है - जुलाई, 2021 में ही ममता बनर्जी ने कोलकाता की शहीद रैली से दिल्ली कूच का औपचारिक ऐलान किया था - और एक साल के भीतर ही लग रहा है जैसे सब कुछ समेट लिया हो.

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष (Opposition Politics) के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा से परहेज और उपराष्ट्रपति चुनाव से दूर रहने की ममता बनर्जी की घोषणा एकबारगी तो हैरान ही करती है. अगर ममता बनर्जी किसी नयी रणनीति पर काम कर रही हों तो बात और है.

राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू से सहानुभूति और उपराष्ट्रपति चुनाव में ममता बनर्जी का हिस्सा न लेना तो बीजेपी के पक्ष में ही जाता है. वो विपक्षी नेताओं के साथ भी नहीं हैं और 2024 के आम चुनाव में बीजेपी के सत्ता से बाहर हो जाने जैसे दावे कर रही हैं - आखिर ममता बनर्जी के इशारे के कैसे समझा जाये?

लेकिन ये सब अकेले दम पर कैसे हो सकेगा? 2019 के आम चुनाव से करीब साल भर पहले सोनिया गांधी का भी ऐसा ही दावा रहा - बीजेपी को सत्ता में आने ही नहीं देंगे. लेकिन नतीजा क्या निकला? कांग्रेस नेतृत्व को भी विपक्षी खेमे के सीनियर नेता गठबंधन के साथ बीजेपी के खिलाफ मैदान में उतरने की सलाह देते रहे, लेकिन राहुल गांधी को लगा कि चौकीदार को चोर साबित कर देंगे और लोग मान लेंगे. लोगों ने अमेठी में ही गच्चा दे दिया. और पहले हल्के फुल्के सिर दर्द के रूप में सताने वाली स्मृति ईरानी माइग्रेन जैसा नियमित दर्द देने लगी हैं.

ममता बनर्जी सोनिया गांधी से दूरी बना लेती है. जो शरद पवार दिल्ली में रहते मिलने का वक्त नहीं दिये थे, उनसे मिलने के लिए मौका खोज कर मुंबई पहुंच गयी थीं - उनको भी अब फोन पर कम भाव देने लगी हैं.

आज की राजनीति में बीजेपी से लड़ते रहने से कहीं ज्यादा जरूरी जैसे भी मुमकिन हो अस्तित्व बचाये रखना हो गया है - वरना, जिस तरीके का 'खेला' होने लगा है, किसी के भी घर में एकनाथ शिंदे पैदा हो सकते हैं - और ऐसा होने पर तो कोई भी उद्धव ठाकरे बन सकता ही है.

जिस तरीके से ममता बनर्जी ने शहीद रैली के मंच से बीजेपी पर हमला बोला है, अभी ऐसा तो नहीं लगता कि ममता बनर्जी भी ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के सीएम जगन मोहन के रास्ते चल पड़ी हैं, या फिर नीतीश कुमार की तरह हालात से समझौता करके, सेक्युलर छवि की भी फिक्र न करते हुए कुर्सी बचाने के लिए बीजेपी से समझौता कर लेने की बात सोच रही हों.

ममता बनर्जी को तो नीतीश कुमार की राह अपनाने की जरूरत भी नहीं है क्योंकि ममता बनर्जी ज्यादा मजबूत स्थिति में हैं - और पश्चिम बंगाल की जीत के बाद ये बात फिर से साबित हो चुकी है. नीतीश कुमार के लिए जहां बीजेपी के साथ होकर भी 2020 में विधानसभा चुनाव जीतना मुश्किल हो रहा था, वहीं ममता बनर्जी ने बीजेपी को शिकस्त देते हुए अपने दम पर तृणमूल कांग्रेस को चुनाव जिता दिया था.

ममता बनर्जी का लोगों से ये कहना कि 2024 में बीजेपी के कब्जे से मुक्त हो जाइये और 'जनता की सरकार' लाइये - मतलब, तो यही हुआ कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) को अगली बार सत्ता में आने से रोकने पर आमादा हैं.

आखिर 'एकला' चल कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कौन सा 'खेला' करने का प्लान बना रही हैं?

बीजेपी पर हमला, विपक्ष से दूरी

2021 की शहीद रैली में ममता बनर्जी का आत्मविश्वास देखते ही बन रहा था. जब कोलकाता में वो रैली कर रही थीं तो दिल्ली में विपक्ष के कई नेता वर्चुअल तरीके से जुड़े हुए थे. कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम और एनसीपी नेता शरद पवार भी उनमें शामिल थे. ममता बनर्जी ने कोलकाता से ही दोनों नेताओं से दिल्ली में विपक्षी दलों की मीटिंग बुलाने को कहा था, लेकिन पहुंची तो मालूम हुआ कि राहुल गांधी खुद विपक्षी नेताओं को बुलाकर कर मीटिंग करने लगे हैं.

sonia gandhi, mamata banerjee, narendra modiममता बनर्जी आखिर किस बूते बीजपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2024 में चैलेंज करने का ऐलान कर रही हैं?

शरद पवार से ममता बनर्जी को काफी उम्मीद रही, लेकिन तब से लेकर अब तक जो कुछ देखा निराशा ही हाथ लगी है. सबसे पहले तो ममता को गुस्सा इसी बात पर आया होगा कि शरद पवार दिल्ली में रह कर भी उनसे मिलने को तैयार नहीं हुए. बाद में जब वो मुंबई जाकर मिलीं और कांग्रेस को विपक्षी गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी तो भी शरद पवार नहीं माने - और बाद में मीडिया के सामने जाकर बोल दिये कि कांग्रेस के बगैर विपक्षी एकता का कोई मतलब ही नहीं रह जाता. ये भी ममता बनर्जी के प्रस्ताव को ठुकराना ही रहा.

ममता बनर्जी ने शरद पवार के सामने राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार बनने का भी प्रस्ताव रखा, जिसे वो साफ तौर पर ठुकरा दिये. शरद पवार ही नहीं गोपाल कृष्ण गांधी और फारूक अब्दुल्ला तक ने ममता को सम्मानपूर्वक मना कर दिया.

यशवंत सिन्हा को ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस में उपाध्यक्ष जरूर बनाया था, लेकिन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में वो पसंद नहीं थे. बताते हैं कि उनके नाम का सुझाव भी सीपीएम की तरफ से आया था. ऐसा भी नहीं कि वो कांग्रेस के भी पसंदीदा उम्मीदवार थे - और ये बात तो एनडीए के उम्मीदवार का नाम सामने आने के बाद और भी साफ हो गया.

अब तो ये भी साफ हो चुका है कि ममता बनर्जी कांग्रेस ही नहीं, शरद पवार से भी दूरी बनाने लगी हैं. अरविंद केजरीवाल राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साथ जरूर खड़े रहे, लेकिन ममता बनर्जी और उनके बीच भी अब संबंध पहले जैसा नहीं लगता. एक बड़ी वजह तो ये भी है कि दोनों ही 2024 में अपने अपने को प्रधानमंत्री मोदी के सामने सबसे बड़े चैलेंजर के तौर पर पेश करने की मंशा रखते हैं.

ऐसे में जबकि दिल्ली सरकार की एक्साइज पॉलिसी को लेकर बीजेपी सवाल उठा रही है, दिल्ली के उपराज्यपाल सीबीआई जांच की संस्तुति कर चुके हैं अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी बीजेपी के खिलाफ आक्रामक हो चुकी है - कोलकाता में ममता बनर्जी भी बीजेपी के खिलाफ उसी रंग में नजर आयीं.

राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के लिए गुंजाइश ही कहां थी: रैली में ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव का भी जिक्र किया - और ये भी समझाने की कोशिश कीं कि वो क्या क्या कर सकती थीं, लेकिन ये नहीं बताया कि जो कर सकती थीं, उतना भी क्यों नहीं किया?

ममता बनर्जी का कहना रहा, 'अगर मैं चाहती तो बीजेपी के खेमे से भी विपक्षी उम्मीदवार के पक्ष में एक्स्ट्रा वोट हासिल कर लेती - लेकिन मैंने जानबूझकर इससे परहेज किया.'

जिस परहेज की बात ममता बनर्जी कर रही हैं, अब तक सिर्फ इतना ही बताया है कि वो द्रौपदी मुर्मू का विरोध नहीं करना चाहतीं. ममता बनर्जी के ऐसा करने के पीछे पश्चिम बंगाल के आदिवासी वोटर हैं जिनमें 80 फीसदी मुर्मू की ट्राइब संथाल ही हैं - लेकिन ममता बनर्जी के हाल के एक्शन से ऐसा तो नहीं लगता कि सिर्फ मुर्मू की वजह से वो विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को पश्चिम बंगाल में अपने लिए वोट तक नहीं मांगने दिया.

अगर ममता बनर्जी के पीछे हटने की वजह एनडीए उम्मीदवार ही रहीं तो सोनिया गांधी के सपोर्ट में साझा बयान से परहेज की वजह क्या हो सकती है? साफ है, ममता बनर्जी के राष्ट्रपति चुनाव में हाथ पीछे खींच लेने के और भी कारण हैं जिन्हें अभी वो खुल कर शेयर नहीं कर रही हैं.

ममता बनर्जी के दावे पर जवाब आया है, बीजेपी के आईटी सेल वाले अमित मालवीय की तरफ से. ट्विटर पर अमित मालवीय ने लिखा है - तृणमूल कांग्रेस के दो सांसद और एक विधायक ने क्रॉस वोटिंग की - और टीएमसी के दो सांसदों और चार विधायकों के वोट अवैध घोषित कर दिये गये.

तृणमूल कांग्रेस नेता के जानी दुश्मन माने जाने वाले कांग्रेस नेता अधीर रंजन का कहना है कि ममता बनर्जी दिल्ली में कुछ और कहती हैं और बंगाल जाकर कुछ और ही बात निकल कर आती है. चौधरी ने ममता बनर्जी राजनीति में दुविधा का ऐंगल भी खोज लिया है.

देखा जाये तो ममता बनर्जी के ताजा स्टैंड का फायदा तो बीजेपी को ही मिला है या मिलने वाला है - और अधीर रंजन चौधरी इशारों में ही सही वैसे ही आरोप लगा रहे हैं. कहते है, 'कुछ न कुछ मजबूरी जरूर है... आपको याद होगा कुछ दिनों पहले दार्जिलिंग हिल्स में मुलाकात हुई थी... एनडीए के उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ और हिमंत बिस्वा सरमा के साथ... उसके बाद ही उपराष्ट्रपति पद के कैंडिडेट का ऐलान हुआ... दो दुना चार कर लीजिये, आपको सब पता लग जाएगा... एक तरफ बीजेपी को खुश करना है और दूसरी तरफ बेमतलब विपक्ष पर आरोप लगाना है.'

कांग्रेस नेता का सीधा आरोप है, 'तृणमूल कांग्रेस जगदीप धनखड़ का विरोध नहीं करेगी... ये ममता बनर्जी की खुद की मजबूरियां हैं... वो खुद को बचाना चाहती हैं.'

ऐसा क्या? सच तो सच होता है. आज नहीं कल तो सामने आएगा ही - और ये भी सही है कि ममता बनर्जी को अपने एक्शन से ही सच का संकेत देना होगा - और तब तक सच का सामना तो करना ही होगा.

जनता की सरकार लाने की लोगों से अपील: शहीद रैली में ही ममता बनर्जी ने लोगों से ये अपील भी की कि अगले आम चुनाव में वो पूरी ताकत से बीजेपी को सत्ता से बेदखल कर दें. हो सकता है ममता बनर्जी की अपील का बंगाल के लोगों पर असर हुआ हो, लेकिन बंगाल के बाहर ऐसी कोई आवाज नहीं सुनायी दे रही है. ऐसा करके ममता बनर्जी 2024 में 2019 के मुकाबले अपनी सीटें तो बढ़ा सकती हैं, लेकिन बीजेपी को दिल्ली से दूर भला कैसे कर सकती हैं?

रैली में ममता बनर्जी कह रही थीं, 'बीजेपी को 2024 में सत्ता से हटा दिया जाएगा... उनको हरा दिया जाएगा... मैं दावे के साथ कहती हूं कि बीजेपी को अकेले अपने दम पर बहुमत नहीं मिलेगा.'

मालूम नहीं ममता बनर्जी के ऐसे दावों का आधार क्या है? जो राजनीतिक हालात और समीकरण दिखायी दे रहे हैं, तृणमूल कांग्रेस नेता के दावे तो हवा हवाई ही लग रहे हैं.

फिर भी रैली में उत्साहित लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच ममता बनर्जी की तरफ से अपील की जाती है, 'बीजेपी की कैद से मुक्त हो जाइये... 2024 में जनता की सरकार लाइये.'

जीएसटी को लेकर भी ममता बनर्जी मोदी सरकार पर अटैक करती हैं, 'जब बीजेपी हर चीज... मूड़ी और मिल्क पाउडर पर जीएसटी लगा रही है तो लोग क्या खाएंगे? देश में गरीब कैसे जीएगा?'

गरीबी के नाम पर ममता की राजनीति ऐसी लग रही है, जैसे लोग भाषण सुन कर गाने लगे हों - 'गरीबों की सुनो...'

सबसे पहले तो ममता बनर्जी को अपनी राजनीतिक गरीबी से निजात पाना होगा. गुरबत सियासत को भी सलामत नहीं छोड़ती.

ममता के सामने भी तो महाराष्ट्र जैसी चुनौती है ही

अभी तो ममता बनर्जी और हेमंत सोरेन दोनों ही देश की राजनीति में एक ही छोर पर खड़े हैं. जाहिर है ममता बनर्जी के मन भी तो आशंकाएं घर कर ही रही होंगी. जैसा हेमंत सोरेन को डर सता रहा है - और अपने हिसाब से वो समझौते के संकेत देने लगे हैं.

राष्ट्रपति चुनाव में तो द्रौपदी मुर्मू का सपोर्ट करने के पीछे मजबूत दलील भी रही, लेकिन मोदी के हाल के झारखंड दौरे में हेमंत सोरेन ने जो गर्मजोशी दिखायी थी, वो तो किसी भी विरोधी पार्टी के मुख्यमंत्री जैसा बिलकुल नहीं था. मोदी के भाषण में भी हेमंत सोरेन के खिलाफ कुछ सुनने को नहीं मिला - और सोरेन तो तौ मोदी के साथ मिल कर ही नया झारखंड बनाने के दावे करने लगे.

हेमंत सोरेन को मालूम है कि महाराष्ट्र जैसी स्थिति से बचने का कोई उपाय भी नहीं बचा है. मालूम नहीं ममता बनर्जी के पास कितना आत्मविश्वास बचा हुआ है? जैसे महाराष्ट्र में हुए तख्तापलट में केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका की चर्चा रही, झारखंड में भी तो हेमंत सोरेन के करीबी धीरे धीरे पकड़े ही जा रहे हैं. न जाने और कितने कतार में हैं.

ये जांच एजेंसियां ममता बनर्जी के खिलाफ तो कुछ नहीं कर पातीं, लेकिन कभी उनके अफसरों के खिलाफ, तो कभी उनके भतीजे अभिषेक के करीबियों और कभी उनकी पत्नी को मुश्किलों से दो चार होना ही पड़ता है. मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं के पाला बदलने के पीछे भी यही कारण सामने आये थे. नारदा से शारदा घोटाले तक सारे ही ममता बनर्जी के लिए जी का जंजाल बने रहे. ममता बनर्जी के कई सहयोगियों को जेल तक जाना पड़ा है - जांच और पूछताछ की तलवार अक्सर ही लटकी रहती है.

ऐसे में अगर बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस में भी कोई एकनाथ शिंदे ढूंढ निकाला तो लड़ने को बचेगा ही क्या? वैसे उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी की राजनीतिक समझ और अनुभव में बड़ा फासला है, फिर भी दुश्मन बर्बाद करने पर उतर ही आये तो लड़ाई मुश्किल हो जाती है

अगर विधानसभा चुनाव के बाद अपने नेताओं के लौट आने की वजह से, ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस के विधायकों को लेकर किसी तरह का गुमान है तो इसमें कोई समझदारी नहीं लगती. जिस लालच में टीएमसी विधायकों ने चुनाव के दौरान पाला बदला था, फिर से वैसी ही स्थिति और सपना दिखाया जाये तो भला वे कब तक खुद पर काबू रख सकेंगे.

आज के दौर में विधायक तो सबसे बड़े सॉफ्ट टारगेट हैं - कोई भी राज्य हो, विधायकों से किसी न किसी बहाने डील करना मुश्किल नहीं रह गया है. बस, मुद्दा ये है कि डील बड़ी होनी चाहिये, ताकि उसके आगे सारे सिद्धांत, निष्ठा और रिश्ता फीके लगने लगें.

कोलकाता में शहीद रैली का आयोजन ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा मौका होता है. ममता इस मंच से खुल कर अपने विरोधियों को चेतावनी देती रही हैं - और कई बार तो ऐसा लगता है जैसे वो आगे के साल भर का अपना एजेंडा भी साफ कर देती हैं.

कोलकाता रैली के मंच से ममता बनर्जी ने बीजेपी नेतृत्व को भी आगाह करने की कोशिश की कि वे बंगाल में महाराष्ट्र जैसे सपने न देखने की कोशिश करें - 'मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा.'

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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