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Updated: 10 जुलाई, 2022 10:39 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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मां काली (Goddess Kaali) के पोस्टर से बढ़े विवाद के बाद लगता है ममता बनर्जी को भी बचाव की मुद्रा में आना पड़ेगा, वैसे ही जैसे नुपुर शर्मा के मोहम्मद साहब पर विवादित बयान के बाद बीजेपी को - और ऐसा होने की एक ही वजह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) का बगैर किसी का नाम लिए काली की महिमा का बखान करना.

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण वाला वीडियो ट्विटर पर शेयर करते हुए बीजेपी के आईटी सेल के चीफ अमित मालवीय ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को टारगेट किया है, जिस पर तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कहा गया है कि काली पर किसी और को लेक्चर देने की जरूरत नहीं है.

स्वामी आत्मस्थानानंद जी जन्म शताब्दी के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने मां काली को लेकर कहा है कि वो बंगाल ही नहीं बल्कि पूरे भारत की भक्ति का केंद्र हैं... मां काली का असीम आशीर्वाद हमेशा भारत के साथ है - और उसी आध्यात्मिक ऊर्जा को लेकर भारत आज विश्व कल्याण की भावना से आगे बढ़ रहा है.

अमित मालवीय के ममता बनर्जी को टारगेट किये जाने की वजह महुआ मोइत्रा का वो बयान है, जो तृणमूल कांग्रेस सांसद ने इंडिया टुडे के एक कार्यक्रम में लीला मणिमेकलाई की फिल्म के पोस्टर की प्रतिक्रिया में कहा था. ये भी देखा गया कि महुआ और लीना दोनों ही विवाद बढ़ने के बावजूद अपने अपने स्टैंड पर कायम हैं - और विवाद को खत्म करने की जगह दोनों ही उसे आगे बढ़ाने की ही कोशिश कर रही हैं.

महुआ मोइत्रा को ममता बनर्जी ने संयम बरतने की सलाह तो दी है, लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया है. बीजेपी की तरफ से इसी बात को लेकर ममता बनर्जी से सवाल पूछे जा रहे हैं. अमित मालवीय भी असल में वही डिमांड दोहरा रहे हैं.

ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) अभी तक इसलिए भी बेपरवाह रही होंगी क्योंकि उनको लगता होगा कि बीजेपी तो पहले से ही नुपुर शर्मा के बयान को लेकर घिरी है और ऐसे में तो प्रधानमंत्री मोदी भी चुप्पी ही साधे रखेंगे, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने सही मौका देख कर बगैर ममता बनर्जी या महुआ मोइत्रा का नाम लिये ही अपना काम कर दिया है.

महुआ मोइत्रा का बयान उनके मुस्लिम बहुल संसदीय क्षेत्र कृष्णानगर को तो सूट करता है, लेकिन इलाके से बाहर पूरे बंगाल में काली की पूजा होती है. काली के उपासक तो रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद भी रहे हैं - और प्रधानमंत्री मोदी ये सारी बातें याद दिला रहे हैं.

और कुछ हो न हो, लेकिन ममता बनर्जी को ये तो खुल कर समझाना ही पड़ेगा कि क्या वो भी मां काली को उसी रूप में देखती हैं, जिस स्वरूप का वर्णन उनकी पार्टी की सांसद महुआ मोइत्रा कर रही हैं - या फिर फिल्ममेकर लीना मणिमेकलाई की तरफ से जैसा प्रदर्शित करने की कोशिश हो रही है?

मां काली को लेकर मोदी का बयान

राष्ट्रपति चुनाव में पहले ही बैकफुट पर जा चुकीं, ममता बनर्जी की राजनीति के लिए काली के पोस्टर पर विवाद स्वाभाविक तौर पर परेशान करने वाला रहा होगा - और तभी टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने अपने हिसाब से काली की एक अलग ही रूप रेख खींच कर मुसीबत खड़ी कर दी. अब तक तो ममता बनर्जी काली के मुद्दे पर विवाद में पड़ने के बजाय टाइमपास पॉलिटिक्स के सहारे वक्त गुजर जाने का इंतजार कर रही थीं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के बयान के बाद कोई न कोई कदम तो उठाना ही पड़ेगा.

mamata banerjee, narendra modiविपक्षी खेमे में ममता बनर्जी अकेले बची हैं - बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में बने रहना है तो बच कर निकलना होगा

काली पोस्टर को लेकर जारी विवाद के बीच, प्रधानमंत्री मोदी का कहना है, 'जब आस्था इतनी पवित्र हो तो शक्ति साक्षात हमारा पथ प्रदर्शन करती है... मां काली का असीमित, असीम आशीर्वाद हमेशा भारत के साथ है... भारत इसी अध्यात्मिक ऊर्जा को लेकर आज विश्व कल्याण की भावना से आगे बढ़ रहा है.'

काली के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने स्वामी आत्मस्थानानंद और स्वामी रामकृष्ण परमहंस का भी विशेष रूप से जिक्र किया है. कहते हैं, 'स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने मां काली का स्पष्ट साक्षात्कार किया था... वो कहते थे... ये सम्पूर्ण जगत... ये चर-अचर, सब कुछ मां की चेतना से व्याप्त है... यही चेतना बंगाल की काली पूजा में दिखती है... यही चेतना बंगाल और पूरे भारत की आस्था में दिखती है.'

स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित बेलूर मठ का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है, 'वहां जब भी जाना होता था तो गंगा के तट पर बैठे हुए दूर मां काली का मंदिर दिखाई देता था... तब एक स्वाभाविक लगाव बन जाता था.'

प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का वीडियो शेयर करते हुए अमित मालवीय ने ट्विटर पर लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भक्तिभाव से मां काली के बारे में बात की है और तृणमूल कांग्रेस की एक सांसद मां काली का अपमान करती है - और ममता बनर्जी अपने सांसद के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय बयान का ही बचाव कर रही हैं.

सियासी चक्रव्यूह में फंसती ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी का चंडी पाठ भी काफी चर्चित हुआ था. चुनावों के दौरान ही ममता बनर्जी ने कहा था कि जीतने पर वो कालीघाट मंदिर जाएंगी - और जीत की हैट्रिक लगाने के बाद ममता बनर्जी ने किया भी ऐसा ही.

अपनी सेक्युलर छवि के लिए जानी जाने वाली ममता बनर्जी हमेशा ही बीजेपी के निशाने पर रही हैं. बीजेपी ममता बनर्जी पर भी मुस्लिमों के तुष्टिकरण के आरोप लगाती रही है - और ऐसे में ममता बनर्जी के लिए काली का दर्शन पूजन और चंडी पाठ ही राजनीतिक कवच का भी काम करता है, लेकिन महुआ मोइत्रा के बयान पर साफ स्टैंड न लेने के कारण ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं.

ममता बनर्जी ऐसे राजनीतिक माहौल में अब तक अकेले डटी हुई हैं जब एक एक करके सारे नेता या तो अस्तित्व बचाने के लिए पाला बदल रहे हैं या मैदान छोड़ चुके हैं या भी ताकत इतनी भी नहीं बची है कि अपने बूते खड़े रह सकें. लड़ना तो बहुत दूर की बात लगती है.

एक दौर में ऐसे कम से कम तीन नेता हुआ करते थे - ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल. नीतीश कुमार ने तो राजनीतिक मजबूरियों के चलते पाला बदला और बीजेपी के रंग में पूरी तरह रंग गये. अरविंद केजरीवाल ने भी राजनीतिक हालात और माहौल को करीब से महसूस किया और जय श्रीराम के नारे ही लगाने लगे. ममता बनर्जी अपनी फाइटर अंदाज में अब भी मैदान में डटी हुई हैं.

महाराष्ट्र में सत्ता गंवाने से पहले उद्धव ठाकरे भी अपने और बीजेपी के हिंदुत्व का फर्क समझाते रहे, लेकिन अब तो वो कुछ भी कहने लायक नहीं बचे हैं - ममता बनर्जी के लिए भी उद्धव ठाकरे एक अच्छे सबक ही तरह हैं.

बंगाल चुनाव नतीजे आने के बाद ममता बनर्जी आत्मविश्वास से लबालब नजर आ रही थीं. प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में वो खुद को इतनी ताकतवर समझने लगी थीं कि कांग्रेस को किनारे करके विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में लग गयी थीं, लेकिन एनसीपी नेता शरद पवार ने धीरे से पेंच फंसा दिया और नजर से परदा उतर गया.

राष्ट्रपति चुनाव में भी ममता बनर्जी को बड़े ही आक्रामक तेवर के साथ देखा गया, लेकिन बीजेपी की तरफ से द्रौपदी मुर्मू को एनडीए का उम्मीदवार बनाये जाने के साथ ही वो लड़खड़ाने लगीं. आदिवासी वोटों की चिंता में वो विपक्षी उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को भी अकेले छोड़ चुकी हैं - और आदिवासी समुदाय को अपनी तरफ से ये मैसेज देने की कोशिश कर रही हैं कि वो द्रौपदी मुर्मू के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि बीजेपी ने पहले बता दिया होता तो वो यशवंत सिन्हा को मैदान में उतारती ही नहीं.

अब बहाना जो भी हो, लड़ाई 2024 के आम चुनाव पर फोकस होती जा रही है. ममता बनर्जी भी द्रौपदी मुर्मू के विरोध से पीछे इसीलिए हट रही हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल के संथाल आदिवासी वोटर की नाराजगी वो नहीं मोल लेना चाहतीं - और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ममता बनर्जी को काली के बहाने इसीलिए कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि वो भी चाहते हैं कि अगले चुनाव में बीजेपी की 2019 के कम सीटें न हो जायें - आम चुनाव की तारीख आने तक ऐसे ही बहाने बदलते रहेंगे.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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