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Updated: 26 मई, 2019 06:18 PM
स्नेहांशु शेखर
स्नेहांशु शेखर
  @snehanshu.shekhar
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23 मई को लेकर देश के राजनीतिक गलियारे में या इसमें दिलचस्पी रखने वालों में जितनी बेसब्री थी, 23 मई की दोपहर आते-आते सब ठंडा पड़ गया. विरोधी सदमे में थे, पक्षकार आंकड़ों की बढ़ती संख्या देखकर स्तब्ध थे, सोशल मीडिया पर एकतरफा युद्धविराम की स्थिति पैदा हो गई और लुटे-पिटे समीक्षक बहानों की तलाश में जुट गए. हर मीडिया नेटवर्क से देश भर का दौरा कर लौटे राजनीतिक समीक्षक एक-दूसरे से पूछने में व्यस्त थे कि ऐसा क्या हुआ कि जो देश देख रहा था, उसे वो नहीं देख नहीं पाए. और दूसरी तरफ, निराश और स्तब्ध राजनीतिक दल तीन दिन से इस दल-दल से कैसे बाहर निकले, इसी जुगाड़-चिंतन में लगे हुए हैं. इस्तीफे की पेशकश की सूचनाएं आ रही हैं, उसे मना करने की औपचारिकताएं भी पूरी कर ली गई हैं, फिर भी मनाने की कोशिशें चल रही हैं, पर इस तमाम मान-मनौव्वल के बीच सवाल तो बनता है कि ऐसी शून्यता या सन्नाटे की नौबत क्यों आई?

समीक्षक सन्नाटे में क्यों?

दरअसल, तस्वीर उन्हें स्पष्ट नहीं थी, जो अमूमन चुनाव आयोग की वेबसाइट से दो-तीन बार के आम चुनावों के आंकड़ों के आधार पर अपनी राय तय करते हैं, अपनी पूर्वाग्रही समीक्षा के पक्ष में तर्क तैयार करते हैं, संपादकीय लिखते-पढ़ते हैं और शाम को टीवी चैनलों पर अपना ज्ञान उड़ेल कर टाइमपास करते हैं. शब्द थोड़े कड़वे हैं, पर हकीकत के करीब हैं. कमोवेश यही पैमाने थे, जिसके आधार पर लुटियन समीक्षक यह मान बैठे थे, कि जब उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-आरएलडी ने हाथ मिला लिया, लिहाजा मुस्लिम, दलित, यादव, जाट वोट एक हो गए, और जब इनका वोट 47 फीसदी तक पहुंच गया, तो कौन ताकत इनके खिलाफ जीत सकती है. यह भी बताने की कोशिशें हुई कि पिछली बार 71 सीट पाने वाली बीजेपी को 43 फीसदी ही वोट मिले थे, और गठबंधन होने की वजह से गोरखपुर, फूलपूर और कैराना उपचुनाव बीजेपी हार चुकी है, लिहाजा इस बार तो खात्मा तय.

हिसाब भी साफ, उनके नतीजे भी स्पष्ट और काम खत्म. यही आकलन बिहार को लेकर भी लगाए गए, जहां कांग्रेस के साथ यादव, मुस्लिम, कुशवाहा, मांझी, साहनी सब एक साथ आ गए. मत बनाया गया कि कागजी आंकड़ों में गठबंधन मजबूत दिख रहा है, ऐसे में बीजेपी-जनता दल-लोजपा का निपटना तय है. कहानी सुनाई जा रही थी कि पश्चिम बंगाल में 2014 लोकसभा में बीजेपी को 17 फीसदी वोट मिले थे, पर 2017 में विधानसभा चुनावों के दौरान तो सिर्फ 10 फीसदी ही वोट मिले, ऐसे में कोई बड़े चमत्कार की कोई उम्मीद भी कैसे कर सकता था. तर्क दिए जा रहे थे, कि महाराष्ट्र में पिछली बार एनसीपी-कांग्रेस अलग-अलग थे, इस बार एक साथ हैं लिहाजा, बीजेपी-शिवसेना के लिए पिछला प्रदर्शन दोहराना संभव नहीं है. कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) साथ है, दलित-मुस्लिम, ओबीसी फैक्टर चल गया तो बीजेपी साफ. कमोवेश इसी तरह की समीक्षाएं अखबारों में, टीवी चैनलों पर, तकरार में देखने-सुनने को मिलती थी औऱ इस आधार पर तय यह किया जा रहा था, नई सरकार का आना-बनना तय है, सोशल मीडिया पर उलटी गिनती चलाई जा रही थी कि मोदी सरकार के कितने दिन बचे हुए हैं. परिणाम जब से आए, तो अब सब सन्नाटे में हैं. अब उन्हीं सब तमाम कुर्तकों के लिए तर्क ढूंढे जा रहे हैं.

विपक्ष कहां चूका?

परिणाम आने के बाद कुछ राजनीतिक प्रतिक्रियाएं आई, जिन्हें समझना जरूरी है. कांग्रेस के पुराने नेता अनिल शास्त्री हो या जर्नादन दिवेदी, उनका बयान आया कि पार्टी का नकारात्मक प्रचार लोगों को पसंद नहीं आया. आम आदमी पार्टी के संजय सिंह की राय थी कि प्रधानमंत्री पर केंद्रित प्रचार लोगों को रास नहीं आया. ध्यान असल मुद्दों से हटकर मोदी पर केंद्रित हो गया और विपक्ष उनका बेहतर विकल्प देश के सामने नहीं दे पाया. बिहार के राजद के एक पुराने नेता ऱघुवंश बाबू ने फरमाया कि लोगों को लालू जी की कमी बहुत खली. उत्तर प्रदेश में नेता जी के पुत्र तो लगता है कि अब तक सदमे से बाहर नहीं निकल पाए हैं. बेचारे शालीनता में अब तक प्रधानमंत्री तक को जीत की बधाई नहीं दे पाए हैं. कमोवेश यही स्थिति बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक और गुजरात में भी है. जबाव तलाशने की कोशिश हो रही है कि गलती कहां हुई.

विपक्ष की नीतियों में भारी कमी रह गई.विपक्ष की नीतियों में भारी कमी रह गई.

कमजोर प्रचार और तालमेल का अभाव..

कमोवेश जो तीन-चार बड़ी बातें समझ में आ रही हैं, उनकी समीक्षा जरूरी है. पहली, प्रमुख विपक्षी दल यानि कांग्रेस की रणनीति किसी के समझ में अब तक नहीं आई. कांग्रेस की पूरी प्रचार प्रणाली दो मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रही थी, एक “अब होगा न्याय” और दूसरा “चौकीदार चोर है”. राहुल गांधी के तमाम भाषणों में ये दो मुद्दें ही हावी थे, लेकिन इन दोनों मुद्दों पर पार्टी में आत्मविश्वास की कमी दिख रही थी. फरवरी में गांधीनगर में हुए अधिवेशन में “न्याय” योजना को प्रमुख चुनावी हथियार बनाने की बात तय की गई थी, पर चुनाव के अंत में कुछ एजेंसियों ने जो सर्वे किए, उसमें जो मोटी-मोटी बातें उभर कर आई, उनमें एक बात यह भी थी, कि यह योजना केवल 4-5 फीसदी लोगों के पल्ले पड़ी थी. यानि, प्रचार तंत्र कमजोर था. दूसरी बात यह भी उभर कर आई कि “चौकीदार चोर है” के नारे पर “मैं भी चौकीदार” ज्यादा भारी पड़ा, चाहे वह रैलियों के प्रचार में हो, या फिर सोशल मीडिया पर. हालात ऐसे हो गए कि पांचवे फेज के आते-आते “चौकीदार चोर है” के नारे की हवा निकल चुकी थी. प्रधानमंत्री हर फेज के साथ नया एजेंडा सेट करने में लगे थे, राज्य के हिसाब विपक्ष को घेरने में लगे थे, उधर, कांग्रेस दो मुद्दों से आगे बढ़ ही नहीं पाई. ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी–शाह रैलियों और और बीजेपी सोशल मीडिया के जरिए एजेंडा सेट करने में लगी थी और पूरी कांग्रेस सिर्फ प्रतिक्रिया देने में जुटी रही. जिस प्रधानमंत्री पर मीडिया की अनदेखी के आरोप लगे, इस चुनाव में सबसे ज्यादा इंटरव्यू सारे चैनलों पर उनके ही दिखे.

उधर, प्रियंका को तुरूप के पत्ते के तौर पर उतारा गया, पर ऐसा लगा कि बिना किसी प्लानिंग या ठोस योजना के. उनकी ज्यादा ताकत साख बचाने के चक्कर में अमेठी और रायबरेली में ही खप गई. दूसरे राज्यों में जहां भी गईं, उसका खास असर भी नहीं दिखा. आंकड़ों के मुताबिक, जिन 38 सीटों पर वह प्रचार के लिए गई, 36 पर पार्टी को हार को मुंह देखना पड़ा. हद तो तब हुई की अमेठी का किला भी धराशायी हो गया. दिसंबर में जिन राज्यों में पार्टी ने जीत हासिल कर थोड़ा पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश थी, वहां आपसी मार-काट ने ये हाल किया कि राजस्थान में सूपड़ा साफ हो गया और मध्य प्रदेश में तो ज्योतिरादित्य सिंधिया भी गुना नहीं बचा पाए. इन राज्यों में क्षेत्रीय क्षत्रपों में घमासान चल रहा था, पर समय रहते न तो उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश हुई, और न ही तालमेल बैठाने का प्रयास, नतीजा हार पर हार और सफाया.

महागठबंधन बनाम महामिलावट...

दूसरा, गठबंधन के लेकर भी अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिली. कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद शपथ ग्रहण समारोह में जो एकता की तस्वीर के जरिए एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की गई, चुनाव नजदीक आते-आते वह भावना ताश के पत्ते की तरह बिखर गई. कहीं हाथ मिले तो दिल नहीं, तो कहीं सिर्फ दिल मिलने की तस्वीरें दीवालों पर टंगी दिखी. यही कारण था कि, लुंज-पुंज, आधे-अधूरे मन से बन रहे महागठबंधन के प्रयासों को मोदी ने जो महामिलावटी का नाम दिया, तो उसे लोग स्वीकार करने लगे. पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा था कि एक इतनी पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस कुछ राज्यों में गठबंधन को लेकर लगभग घुटनों के बल बैठने को तैयार थी. दिल्ली जैसे छोटे राज्य में, पूरी पार्टी दो धड़े में बंटी पड़ी थी और एक महीने तक संस्पेंस बना रहा कि आम आदमी पार्टी से समझौता करना है या नहीं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अंतिम समय तक इंतजार करती है कि सपा-बसपा सरकार में थोड़ी जगह मिल जाए औऱ जब बसपा के विरोध के कारण गठबंधन में स्थान नहीं मिला, तब जाकर पार्टी मैदान में उतरी.

बिहार में हालात यह थी कि पार्टी को तमाम नूराकुश्ती के बाद मात्र 7 सीट पर ही संतोष करना पड़ा और जो गठबंधन हुआ भी, पूरे चुनाव में कहीं कोई तालमेल नहीं दिख रहा था. पूरे चुनाव के दौरान ऐसा लग रहा था कि गठबंधन के नेता ही एक-दूसरे को निपटाने में ही पूरी ताकत लगाए पड़े थे. कर्नाटक में जनता-दल (सेक्यूलर) के साथ गठबंधन तो हुआ, पर राज्य में सरकार बनने के बाद से दोनों दलों में जो खींचतान चल रही थी, उसका असर चुनाव परिणामों पर भी देखने को मिला. आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू यूं तो साल भर से महागठबंधन के मुद्दे पर, ईवीएम के मुद्दे पर कांग्रेस से लेकर हर विपक्षी दल के दरवाजे पर दस्तक देते दिख रहे थे, लेकिन चुनाव में गठबंधन की बात आई तो कांग्रेस से छिटककर दूर जा बैठे. मजे की बात है कि जब तेलंगाना विधानसभा के चुनाव हो रहे थे, तो कांग्रेस-नायडू दोनों साथ लड़े और जब मात मिली, तब आंध्र में धीरे से अलग हो गए, नतीजा यह निकला कि आंध्र में दोनों अंधेरे में लिप्त हो गए. दूसरी तरफ, तमाम अटकलों के बीच बीजेपी ने चाहे बिहार, महाराष्ट्र हो या फिर उत्तर प्रदेश, पार्टी ने समय रहते न सिर्फ सीटों का बंटवारा किया, बल्कि प्रचार में भी तालमेल का ख्याल रखा और परिणामों में उसका असर देश ने देखा. पहली बार ऐसा हुआ कि लालू का पार्टी का बिहार में खाता तक नहीं खुल पाया.

बिहार-यूपी में जातीय समीकरण ध्वस्त..

तीसरा, क्षेत्रीय दलों ने भी जो अपनी समझ के हिसाब से गठबंधन किया, वो कागजों पर तो मजबूत दिख रहा था, पर जमीन पर असर फीका साबित हुआ. जो दल जातीय समीकरणों के दम या दंभ पर ऊंची दुकान सजा कर बैठे थे, ऊंचे सपने पाल बैठे थे, नए प्रधानमंत्री बनने-बनाने तक का स्वप्न देख-दिखा रहे थे, उन्हें कोई खरीदार तक नहीं मिला. इसमें सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश की हुई, जहां तीन वर्ष के भीतर समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने दूसरा बड़ा राजनीतिक प्रयोग किया था. पिता-चाचा की अनदेखी कर विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस से और बाद में लोकसभा चुनावों से पहले मायावती से गठबंधन किया. दरअसल, तमाम पुरानी कड़वाहट को भूल कर जो सपा-बसपा ने एक साथ आने का फैसला किया, उसके पीछे उनकी राजनीतिक मजबूरी ज्यादा थी.

मायावती और अखिलेश का गठबंधन उसी तरह फेल हो गया जैसे यूपी में सपा और कांग्रेस का हुआ था.मायावती और अखिलेश का गठबंधन उसी तरह फेल हो गया जैसे यूपी में सपा और कांग्रेस का हुआ था.

शून्य से सन्नाटे तक के सफर से डरी मायावती को लगा कि अगर पुरानी कड़वाहट को पीछे न छोड़ा, तो काशीराम जी की विरासत भी खतरे में पड़ जाएगी. लिहाजा दोनों पार्टियों ने लखनऊ की अपनी हवेलियों में बैठकर जो जातीय समीकरण का लेखा-जोखा, गणित तय किया, तो उम्मीद यह थी कि इस बार तो बस महागठबंधन की सरकार. उन्होंने अपने जातीय शो-रूम के बाहर झांक कर देखने की कोशिश तक नहीं की, किस तरह बीजेपी ने पिछले दो साल के दौरान उज्जवला, प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य (मुफ्त बिजली ), आयुष्मान, मुफ्त शौचालय जैसी योजनाओँ के जरिए उनकी जमीन खिसका ऱखी है. अब चूंकि चुनाव परिणाम सामने आ चुके हैं, तो इसकी समीक्षा करना आसान है कि किस तरह उत्तर प्रदेश के 61 फीसदी दलित, 55 फीसदी जाट, 72 फीसदी ओबीसी, 74 फीसदी ऊंची जातियां, 18 फीसदी यादव, 19 फीसदी जाटव (दलित) और 8 फीसदी मुसलमानों ने बीजेपी के लिए मतदान किया. जातीय समीकरणों की दीवारों टूटी और लगभग 50 फीसदी मत हासिल कर बीजेपी ने महागठबंधन के सपने को बिखेर कर रख दिया.

बिहार में भी लगभग ऐसा ही देखने को मिला और अगर पाटलिपुत्रा, सारण, मधेपुरा, कटिहार, सुपौल, अररिया के चुनाव परिणामों की अगर कोई समीक्षा करेगा तो पाएगा कि किस तरह उत्तर प्रदेश के तर्ज पर जाति-पाति की दीवार टूटी. परिणाम ये रहे कि 2014 की तुलना में राजद को कुल साढ़े चार फीसदी का नुकसान हुआ और उसे सिर्फ 15.5 फीसदी वोट मिले और कांग्रेस को 7.8 फीसदी, जबकि दूसरी तरफ 17-17 सीटों पर लड़ी बीजेपी-जद-यू औऱ लोजपा को लगभग 51 फीसदी से भी ज्यादा मत हासिल हुए.

क्षेत्रीय दलों की राष्ट्रीय महात्वाकांक्षा...

चौथा, राष्ट्रीय स्तर पर कौन-कौन से क्षेत्रीय दलों ने कैसे-कैसे सपने पाल रखे थे, उसने और खेल खराब किया. क्षेत्रीय दलों की बढ़ती राष्ट्रीय महात्वाकांक्षा ने दीवारों पैदा कर दी थी. अलग-अलग मुलाकातें चल रही थी, केसीआर ममता से मिल रहे थे, ममता केजरीवाल तक से मिल रही थी, उधर नायडू भी कभी ममता से मिलते थे तो कभी राहुल से, सोनिया से, शरद पवार से तो कभी लखनऊ पहुंच कर माया-अखिलेश से भी बात कर रहे थे. स्टालिन राहुल को प्रधानमंत्री देखना चाहते थे, केसीआर फेडरल फ्रंट का प्रधानमंत्री बनाने में लगे थे तो अखिलेश यूपी से प्रधानमंत्री बनाने की एकतरफा घोषणा करने में लगे थे. न कोई सुर, न कोई लय, न कहीं तालमेल, न कोई दिशा और एजेंडा सिर्फ एक, “मोदी हटाओ”, बाकी बातें बाद में. इस नकारात्मक सोच और कैंपेन ने इन्हें नुकसान ही पहुंचाया. परिणाम के आंकड़े बताते हैं कि इस नेगेटिव कैंपेन ने बीजेपी को लाभ ज्यादा मिला और एकतरफा वोटिंग की वजह से करीब 17 राज्यों में बीजेपी के 50 फीसदी से लेकर 69 फीसदी तक वोट मिले. शहरों की पार्टी कही जाने वाली बीजेपी को पूरे देश के ग्रामीण इलाकों के 46 फीसदी वोट मिले. बीजेपी का अपना वोट 31 फीसदी से बढ़कर 37 फीसदी तक पहुंच गया.

जाहिर है आने वाले दिनों में इस ऐतिहासिक चुनाव की अलग-अलग तरीके से समीक्षा होगी. समीक्षक-नेता फिर से कमर कस तैयार होंगे. अब जबकि स्पष्ट हो गया कि राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे को राहुल जी के परिवार ने और उनके परिवार के शुभचिंतकों ने ठुकरा दी है, औऱ वही अध्यक्ष बने रहेंगे, दूसरी तरफ, नरेंद्र मोदी को भी सरकार बनाने का आधिकारिक निमंत्रण मिल चुका है, तो मोदी ने शनिवार को संसद के सेंट्रल हाल में जो लकीर राजनीतिक दलों के लिए और सांसदों के लिए खींची है, उसे हर दल, उनके नेता और दिल्ली में बैठे समीक्षक गंभीरता से लेंगे. अन्यथा बार-बार उन्हें झटके लगेंगे, निराश-हताश होना पड़ेगा, क्योंकि देश ने तो अपनी राह पकड़ ली है.

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लेखक

स्नेहांशु शेखर स्नेहांशु शेखर @snehanshu.shekhar

लेखक आजतक में डिप्टी एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं

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