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Updated: 12 मार्च, 2019 02:24 PM
प्रशांत पांडेय
प्रशांत पांडेय
  @prashantrashmip
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आम चुनाव 2019 में बिहार के बेगूसराय लोक सभा सीट पर देश भर की नजरें टिकी हुई हैं. पहले कभी यह सीट इस कदर सुर्खियों में नहीं रही. वजह ये है कि सीपीआई ने जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के लिए छह महीने पहले से ही इस सीट पर दावेदारी ठोक रखी है. कन्हैया कुमार तभी से क्षेत्र में सक्रिय भी हैं, लेकिन पेंच फंसा हुआ है राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के रूख के कारण. चर्चा है कि बिहार में एनडीए के खिलाफ जो महागठबंधन तैयार हो रहा है, उसमें कांग्रेस और आरजेडी के अलावा सीपीआई भी होगी. लेकिन सीपीआई युवा वर्ग में खासी अपील रखनेवाले कन्हैया कुमार के नाम पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है. ऐसे में अगर उसके रूख के सामने आरजेडी ने घुटने टेके, तो बेगूसराय सीट पर महागठबंधन की तरफ से कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी पक्की है. क्योंकि कांग्रेस को उनके नाम पर कोई विशेष आपत्ति नहीं है.

एनडीए खासकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के अंदर महागठबंधन में पक रही इस खिचड़ी पर पैनी नजर रखी जा रही है. हालांकि कन्हैया कुमार के ऊपर देशद्रोह का संगीन आरोप है, जिसके लिए दिल्ली पुलिस उनके खिलाफ चार्जशीट भी तैयार कर चुकी है. लेकिन फिर भी एनडीए के खेमे में उन्हें गंभीर चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है. भीतर ही भीतर एनडीए के सभी नेता इस बात को लेकर आशंकित हैं कि बेगूसराय की भूमिहार बहुल सीट पर भूमिहार होने के कारण कन्हैया कुमार भारी पड़ सकते हैं.

kanahiya kum,arबेगूसराय सीट पर महागठबंधन की तरफ से कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी पक्की है

अब करीब-करीब यह तय है कि बेगूसराय सीट बीजेपी के खाते में जा रही है. ऐसे में कन्हैया कुमार को चुनौती देने के लिए कई नामों की चर्चा जोरों पर है.

इनमें सबसे पहला नाम है, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का. पिछली बार उन्होंने नवादा लोक सभा सीट से चुनाव जीता था और कयास है कि इस बार उन्हें बेगूसराय सीट पर शिफ्ट किया जा सकता है. अपनी बड़ी राजनीतिक हैसियत के बावजूद गिरिराज सिंह के साथ दो बड़ी समस्याएं हैं. एक तो उनके नाम की चर्चा शुरू होते ही उनके खिलाफ बाहरी व्यक्ति का कैंपेन जोर पकड़ चुका है. दूसरा कि अक्सर वो अपने विवादित बयानों की वजह से ना सिर्फ पार्टी को बल्कि खुद को भी मुसीबत में डाल लेते हैं. हाल ही में गिरिराज सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पटना रैली से पहले बयान दिया कि जो भी तीन मार्च को पटना के गांधी मैदान की संकल्प रैली में नहीं आएगा, वो देशद्रोही होगा, लेकिन बाद में अस्वस्थ होने की बात कहकर वो खुद ही इस रैली में नहीं गए, जिसके बाद विपक्ष ने कटाक्ष में उन्हें देशद्रोही कहना शुरू कर दिया. पिछले लोक सभा चुनाव में भी उन्होंने कहा था कि 'जो लोग नरेंद्र मोदी को रोकना चाहते हैं, आने वाले दिनों में उनके लिए भारत में कोई जगह नहीं होगी. उनके लिए बस पाकिस्तान में जगह बचेगी.'

बीजेपी की तरफ से दूसरा नाम विधान पार्षद रजनीश कुमार का उभरा है. वो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की टीम में राष्ट्रीय सचिव का ओहदा भी रखते हैं. रजनीश कुमार लंबे अर्से से लोक सभा सीट के लिए अपनी दावेदारी ठोके हुए हैं. लेकिन उनके साथ भी मुख्य रूप से दो समस्याएं हैं. एक तो बेगूसराय बीजेपी के अंदर उनका घोर विरोध है. दूसरे कई मुकदमें और विवाद भी उनसे जुड़े हुए हैं. जिनकी वजह से विपक्षी उम्मीदवार को उनके खिलाफ बल मिल सकता है.

तीसरा नाम आ रहा है देश के जाने-माने लेखक और पत्रकार अभिरंजन कुमार का, जो बिहार के बेगूसराय जिले से ही हैं. अभिरंजन कुमार की छवि एक ओजस्वी, तर्कवादी और बेदाग व्यक्ति की है. बीएचयू और आईआईएमसी, जेएनयू कैंपस से पढ़े हैं और हमेशा टॉपर रहे हैं. बिहार में एक निजी चैनल का संपादकीय प्रमुख रहते हुए उन्होंने अपनी जुझारू और जन पक्षधर पत्रकारिता से काफी लोकप्रियता हासिल की. बेगूसराय में साफ-सुथरी राजनीति की चाह रखने वाले लोग बड़ी संख्या में उनके नाम का समर्थन कर रहे हैं. यहां तक कि बेगूसराय का पितामह कहे जानेवाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के परिवार के लोग भी उनके नाम के समर्थन में उतर आए हैं. दिनकर जी के पोते अरविंद कुमार सिंह के मुताबिक, मौजूदा राजनीतिक माहौल में अभिरंजन कुमार ही वो नाम हैं, जो ना सिर्फ बेगूसराय, बल्कि दिनकर जी की साहित्यिक और राजनीतिक विरासत का भी प्रतिनिधित्व करने का माद्दा रखते हैं. लेकिन अभिरंजन कुमार के साथ भी एक बड़ी समस्या है कि वो गैर-राजनीतिक व्यक्ति हैं और औपचारिक रूप से राजनीति में अभी उनका पदार्पण भी नहीं हुआ है. कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि आज की साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति में अभिरंजन कुमार जैसे साफ-सुथरे लोग कितने कामयाब हो सकते हैं?

इन प्रमुख नामों के अलावा गंगा डेयरी के मालिक सर्वेश कुमार और बेगूसराय के महापौर उपेंद्र सिंह के नाम भी चर्चा में हैं. चूंकि लोक सभा चुनाव की तारीखें आ चुकी हैं, इसलिए अब रहस्य से पर्दा उठने में अधिक दिन नहीं हैं. लेकिन इतना तो तय है कि कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी के चलते एनडीए और बीजेपी के माथे पर बल पड़ा हुआ है और उनकी काट के लिए निश्चित तौर पर उसे एक ऐसा उम्मीदवार पेश करना होगा, जो न सिर्फ युवा और बेदाग हो, बल्कि बौद्धिकता और वाकपटुता के मामले में भी उनपर भारी पड़े.     

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लेखक

प्रशांत पांडेय प्रशांत पांडेय @prashantrashmip

लेखक पत्रकार हैं

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