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Updated: 10 मार्च, 2019 04:31 PM
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लोकसभा इलेक्शन 2019 की धोषणा होने में अब कुछ ही देर रह गई है. भाजपा और नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस और राहुल गांधी तक सभी तैयार हैं. अखिलेश यादव, मायावती, ममता बनर्जी, कुमारास्वामी, रजनीकांत और कमल हसन जैसे लोग तो पहले से ही तैयार बैठे हैं. जैसे ही इलेक्शन कमीशन चुनाव तारीखों की घोषणा करेगा वैसे ही कोड ऑफ कंडक्ट यानी आचार संहिता लागू हो जाएगी. इसका मतलब है कि इलेक्शन के होने तक राजनीतिक दल क्या कर सकते हैं और क्या नहीं इसपर इलेक्शन कमीशन द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों को देखना होगा. अन्य चीज़ों के साथ-साथ ये दिशा निर्देश कहते हैं कि सरकार कोई भी नई नीति नहीं लागू कर सकती.

इलेक्शन कमीशन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में न सिर्फ लोकसभा चुनाव 2019 की तारीख बताई जाएगी बल्कि आंध्रप्रदेश, सिक्किम, अरुणांचल प्रदेश और उड़ीसा के विधानसभा चुनावों की तारीख भी बताई जा सकती है. चीफ इलेक्शन कमिशनर सुनील अरोड़ा इस लोकसभा चुनाव के बारे में जानकारी देंगे. 543 निर्वाचन क्षेत्रों और 10 लाख मतदाता केंद्रों के साथ लोकसभा इलेक्शन 2019 काफी बड़ा इलेक्शन साबित होगा. 

जो हालात चल रहे हैं उससे तो शायद चुनावी आचार संहिता का इंतजार पाकिस्तान भी कर रहा है. इसके कई कारण हैं, जैसे सरकार कोई बहुत बड़ा फैसला दुश्मन देश के खिलाफ नहीं ले पाएगी. पाकिस्‍तानी मीडिया पर बात हो रही है कि चुनाव की घोषणा के साथ ही देश का प्रशासन चुनाव आयोग के पास चला जाता है. जिससे प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्‍तान के खिलाफ कुछ करने का अधिकार खो देंगे.

 

क्या है आचार संहिता?

इलेक्शन कमीशन की आचार संहिता ये तय करती है कि राजनीतिक पार्टियां क्या करेंगी और क्या नहीं. चुनावों के आधार पर नेताओं के आचार-विचार पर भी पैनी नजर होती है. आचार संहिता में चुनाव के भाषण, घोषणापत्र, रैलियां, चुनाव का दिन, चुनाव के केंद्र आदि से लेकर मानव व्यवहार (नेताओं का) तक सभी से जुड़े नियम होते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि सुरक्षित और सफल इलेक्शन करवाए जा सकें.

चुनाव आयोग, आचार संहिता, लोकसभा चुनाव 2019आचार संहिता के लागू होने के बाद से ही चुनाव प्रचार का तरीका बदल जाएगा.

कब से लागू होना शुरू हुआ ये कोड ऑफ कंडक्ट?

प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो की वेबसाइट के अनुसार सबसे पहला कोड ऑफ कंडक्ट 1960 के दशक में लागू किया गया था और ये केरल में होने वाले चुनावों में लागू हुआ था. इसके बाद 1962 में आम चुनावों में भी इसी तरह के नियमों का पालन किया गया. अक्टूबर 1979 में चुनाव आयोग ने एक सेक्शन लागू किया ताकि सत्ताधीन पार्टी चुनावों के पहले अनैतिक फायदा न उठा सके.

आचार संहिता इलेक्शन की तारीख की घोषणा के साथ ही लागू हो जाती है और जब तक चुनाव के नतीजे घोषित नहीं हो जाते तब तक लागू रहती है. यानी आज चुनावों की घोषणा के साथ ही आचार संहिता लागू हो जाएगी.

क्या प्रतिबंध लगेंगे आचार संहिता के लागू होते ही?

आचार संहिता में 8 प्रावधान होते हैं. इसमें सामान्य आचरण, मीटिंग, रैलियां, चुनाव के दिन, मतदान केंद्र, पर्यवेक्षक, सत्ताधीन पार्टी के लिए कुछ नियम और चुनाव के घोषणापत्र संबंधित कुछ नियम होते हैं.

जैसे ही आचार संहिता लागू होती है वैसे ही सत्ताधीन पार्टी चाहें केंद्र की हो या राज्य की उसे ये ध्यान रखना होता है कि चुनाव प्रचार में किसी भी सरकारी और आधिकारिक पोजीशन का इस्तेमाल न किया जाए. यानी कोई भी पॉलिसी, कोई भी स्कीम, कोई भी प्रोजेक्ट आदि इलेक्शन की तारीखों की घोषणा के बाद न ही लागू किया जाएगा न ही उसकी घोषणा की जाएगी.

इसी के साथ, किसी सरकारी मीडिया, विज्ञापन आदि को भी नहीं दिया जाएगा. पब्लिक के खर्च पर चुनाव प्रचार नहीं होगा.

आचार संहिता के अनुसार किसी भी मंत्री को आधिकारिक सरकारी दौरे के वक्त चुनाव प्रचार करने की आजादी नहीं है. वो दौरे पर सिर्फ काम करने जाएंगे. इसी के साथ, किसी सरकारी मशीन का इस्तेमाल भी चुनाव प्रचार में नहीं होगा. सत्ताधीन पार्टी सरकारी काफिले का इस्तेमाल भी चुनाव प्रचार में नहीं कर सकती. उसे ये ध्यान रखना होगा कि चुनाव प्रचार के लिए मैदान, हेलिपैड आदि विपक्षी पार्टियों को भी उसी तरह से दिए जाएं जिस तरह से सत्ताधीन पार्टी को दिए जा रहे हैं.

सरकारी खर्च पर किसी भी तरह का विज्ञापन देना अवमानना मानी जाएगी. सत्ताधीन पार्टी किसी भी तरह की नियुक्तियां ऐसे नहीं कर सकती है जिससे वोटरों को रिझाया जा सके. ट्रांसफर आदि भी रुक जाते हैं.

राजनीतिक पार्टियां, नेताओं को अगर भाषण में कुछ कहना है तो उनके काम के आधार पर कहना होता है किसी भी तरह की धर्म और जाति को लेकर की गई टिप्पणी भी आचार संहिता के खिलाफ हो जाती है. मंदिर, मस्जिद, चर्च या कोई भी धार्मिक जगह इलेक्शन के प्रचार के लिए नहीं इस्तेमाल की जा सकती है.

रिश्वत देना, मतदाताओं को डराना या किसी तरह का प्रलोभन देना भी वर्जित है. मतदान के दिन से 48 घंटों पहले किसी सार्वजनिक बैठक का आयोजन भी नहीं होता है. 48 घंटों का ये समय इलेक्शन साइलेंस कहलाता है. शायद ये इसलिए क्योंकि इलेक्शन के समय वोटरों को एक ऐसा वातावरण मिले जिससे वो किसी भी तरह से वोट करते समय परेशान न हों.

क्या कोड ऑफ कंडक्ट कानूनी दस्तावेज है?

इसका जवाब सुनकर शायद आपको थोड़ा अजीब लगे, लेकिन जवाब है नहीं. आचार संहिता इलेक्शन कमीशन की तरफ से एक मुहिम के तौर पर शुरू की गई थी ताकि निक्षपक्ष चुनाव करवाए जा सकें. ये सभी राजनीतिक पार्टियों ने माना भी था. इसका कोई भी वैधानिक समर्थन नहीं है. अगर कोई नेता आचार संहिता का उलंघन करता है तो उसके खिलाफ कोई भी कानूनी कदम नहीं उठाया जा सकता है.

इलेक्शन कमीशन नेता को नोटिस दे सकता है या पार्टी को नोटिस दिया जा सकता है कि आचार संहिता का उलंघन हुआ है. एक बार नोटिस जारी हो गया तो पार्टी या उस नेता को आधिकारिक तौर पर लिखित में अपनी सफाई देनी होती है. या तो इसमें उसे गलती माननी होगी, या फिर आरोप को खारिज करना होगा. अगर कोई आरोप सिद्ध हो जाता है तो सिर्फ इलेक्शन कमीशन की तरफ से एक लिखित निंदा पत्र जारी होगा.

इससे पहले कितनी बार हुआ है आचार संहिता का उलंघन?

2017 गुजरात चुनावों के दौरान दोनों पार्टियों भाजपा और कांग्रेस ने एक दूसरे पर आचार संहिता के उलंघन का आरोप लगाया था. भाजपा ने इलेक्शन साइलेंस के 48 घंटे के अंदर राहुल गांधी के एक इंटरव्यू का जिक्र किया था और कांग्रेस पार्टी ने भाजपा के रोडशो को निशाना बनाया था जिसमें वोट देने के बाद प्रधानमंत्री शरीक हुए थे.

गोवा इलेक्शन के दौरान इलेक्शन कमीशन ने अरविंद केजरीवाल को कहा था कि वो आचार संहिता का उलंघन कर रहे हैं. उस समय केजरीवाल ने अपने भाषण में कहा था कि वोटर भले ही कांग्रेस और भाजपा से पैसे ले लें, लेकिन वोट आप को ही करें.

इलेक्शन कमीशन का आचार संहिता को लेकर कड़ा रुख एक बार देखने को मिला था जब चुनाव आयोग ने अमित शाह और आजम खान को 2014 लोकसभा चुनावों के समय प्रचार करने से रोक दिया था. कमिशन ने आर्टिकल 324 के हिसाब से अपनी ताकत का इस्तेमाल किया था और तब तक ये बैन लागू था जब तक दोनों ही नेताओं ने अपनी गलती मान नहीं ली थी और आचार संहिता के हिसाब से काम करने को राजी नहीं हो गए थे.

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